भोजपुरी के मान्यता के राह देखत एगो अउर बरीस बीत गइल बाकिर कतहूं कवनो संकेत नइखे लउकत. साफ लउकत बा कि सरकार एहसे उदासीन बिया. बाकिर उमीद के दीया अबहीं जरऽता आ आवे वाला दिन में ई सुने के ना मिली कि भोजपुरिया लोग कवनो दोसरा समाज से कवनो मायनेपूरा पढ़ीं…

Advertisements

– डा॰ अशोक द्विवेदी स्नान-पूजा का बाद जब कुन्ती अनमनाइल मन से कुछ सोचत रहली बेटा भीम का सँगे बाहर एगो फेंड़ का नीचे हँसी-ठहाका में रहलन स. हिडिमा के पास आवत देखि कुन्ती पुछली – – ‘बेटी ए स्थान के आसपास, कहीं तहरा राज का सीमा में कवनो साधु-संत-रिसिपूरा पढ़ीं…

हमार देशवासी, 66वां गणतंत्र दिवस के पहिले के साँझ हम रउरा सभे के एह दिन के बधाई देत बानी, खास क के हमनी के सेना, अर्धसेना, अउर भितरी सुरक्षा में लागल अपना जवानन के. 26 जनवरी के दिन हमनी के देश का यादगार में एगो स्थायी जगहा राखेला काहें किपूरा पढ़ीं…

– देवेन्द्र कुमार गुलजारी लाल जी आपन संघतिया मनमौजी के संगे साप्ताहिक बाजार मंगला हाट में हफ्ता भर के जरूरी सामान के खरीदारी करे खातिर गइल रहलें. दूनो संघतिया बाजार में घूमत-फिरत आपन जरूरत के मुताबिक सर-सामान खरीदत रहलें. गुलजारी लाल जी हाट में दू गो मुरगी पसंद कइलें. मोल-भावपूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय जइसे दूध-दही ढोवे सबके सेहत के चिंता करे वाला गाँव के ग्वालिन हऽ गौरैया एक-एक फूल के चिन्हें वाला मालिन हऽ। अँचरा के खोंइछा ह विदाई के बयना हऽ अधर के मुस्कान ह लोर भरल नैना हऽ। चूडि़हारिन जस सबके घर के खबर राखेले डेहरी भरीपूरा पढ़ीं…

– जयंती पांडेय बाबा लस्टमानंद अक्सर अपना मेहरारू के केहु से परिचय करइहें त कहिहें कि ई हमार पत्नी हईं. रामचेला एकदिन पूछ बइठले – हो बाबा! तू , भउजी के धरमपत्नी काहे ना कहेलऽ? सब लोग त अपना मेहरारू के धर्मपत्नी कहेला. बाबा कहले – बाबू हो, आपन पत्नीपूरा पढ़ीं…

स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो के लिखल किताब ‘दि रेड साड़ी’ के पिछला सरकार का जमाना में कांग्रस भारत में प्रकाशित ना होखे दिहलसि. सोनिया गाँधी के जीवन के कहानी के नाटक का तरह लिखल एह बयान का बारे में लेखक के दावा बा कि किताब में लिखल सगरी बात सचाईपूरा पढ़ीं…

– डा॰ अशोक द्विवेदी एगो विशाल बटवृक्ष का नीचे पत्थर शिला खण्ड का टुकड़न से सजाइ के एगो चबूतरा बनावल रहे. वृक्ष का एकोर ओइसने पत्थर के चापट टुकड़न के सरियाइ के गोलाकार ऊँच देवाल लेखा बनावल रहे जवना का ऊपर से वटवृक्ष क डाढ़ि अपना पतइयन से छाँह कइलेपूरा पढ़ीं…

– डा॰ अशोक द्विवेदी सोझा बन के कुछुए भीतर एगो बड़का झँगाठ फेंड़ का ऊपर से दू गो आँख ओनिये टकटकी बन्हले भीम आ उनका पलिवार का एक-एक हरकत के देखत रहे. भीम के, साँझि से एह सुतला राति ले तनिको सुनगुन ना मिलल रहे कि ओह लोगन पर नजरपूरा पढ़ीं…

दिल्ली सरकार के मैथिली.भोजपुरी अकादमी 11 जनवरी का दिने दिल्‍ली के मंडी हाउस का फिक्‍की सभागार में गणतंत्र दिवस कवि सम्‍मेलन आयोजित कइलस जवना में दिल्ली आ बाहरो से आइल कवि लोग अपना कविता के पाठ कइल. उद्घाटन दिल्ली सरकार के कला संस्‍कृति एवं भाषा विभाग के सचिव का हाथेपूरा पढ़ीं…

– जयंती पांडेय सीताराम बनिया मुंहअन्हारे बाबा लस्टमानंद के दुअरा आ पहुंचले. बाबा ओह समय बैलन के सानी-पानी करे के तइयारी में रहले. हाथ में छईंटी रहे. सीताराम बनिया के देख के छईंटी धऽ के खड़ा हो गइले. सीताराम नीयरा आ के कहले, बाबा हो, तहरा के काल्हु कुछ कहिपूरा पढ़ीं…