– ओमप्रकाश अमृतांशु रंगमंच पर किसिम-किसिम के रंग के भाव मंचित होखेला. ऊहे भाव दर्शक लोगन के मन आ दिल पे राज करेला. कुछ देर खातिर सभागार में बइठल लोग भुला जाला कि हम जवन देखत बानी तवन हकीकत ना, एगो काल्पनिक दृश्य हऊए. मंच अभिनेता लोगन से भरल बा.पूरा पढ़ीं…

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– डा॰ अशोक द्विवेदी फजीर होते, भीम आश्रम से निकलि के सीधे जलाशय का ओर चल दिहलन. माता के प्रातः दरसन आ परनाम का बाद, उनसे कुछ सलाह निर्देश मिलल. माता कहली, ”हम चाहत बानीं कि तूँ हिडिमा का सँगे अधिका से अधिका समय बितावऽ! ओकरा भाई हिडिम का नापूरा पढ़ीं…

– गंगा प्रसाद अरुण संता, जाने कइसन महभारत फेर आइल बाटे चकराबिहू रचाइल बाटे ना! केकर कइसे गोड़ कबारीं केकरा के कइसे हम जारीं डेगे-डेग इहाँ पर लाखा-घर सिरजाइल बाटे चकराबिहू रचाइल बाटे ना! अनकर अस्तर-सस्तर बोले बीचे धरम-जूझ मन डोले जोधा बर्हमफाँस में एकइस के अझुराइल बाटे चकराबिहू रचाइलपूरा पढ़ीं…

बिहार भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष रहल डा॰ रविकान्त दुबे के शनिचर देर रात निधन हो गइल. अतवार का दिने उनकर अंतिम संस्कार बक्सर घाट पर कइल गइल. डा॰ रविकान्त दुबे के किडनी खराब हो गइला का चलते खराब भइल तबियत के इलाज पटना के एगो निजी अस्पताल में चलत रहुवे.पूरा पढ़ीं…

– विजय मिश्र लइका हनेला जवाब, अब सयान हो गइल बहू अइली घरे, अलगा चुहान हो गइल. पहिला रिस्ता टूटल जाता, नवका रोज धराता ननिअउरा त याद ना आवे, बढ़ल सढ़ुआ नाता. माई बाबू काटे, ससुररिया परान हो गइल बहू अइली घरे, अलगा चुहान हो गइल. टूटहा भंगहा गउवाँ घरवापूरा पढ़ीं…

शनिचर 14 फरवरी का दिने बलिया का यारपुर बेदुआ मुहल्ला में शशि प्रेमदेव जी का घर पर विश्व भोजपुरी सम्मेलन के बलिया ईकाई का तरफ से एगो वासन्ती काव्य गोष्ठी के आयोजन कइल गइल. गोष्ठी के शुरुआत शिवजी पाण्डेय ‘रसराज’ के वाणी वन्दना से भइल. एह आयोजन में भोजपुरी पत्रिकापूरा पढ़ीं…

– डा॰ शत्रुघ्न पाण्डेय, बाबूजी के हम रहुईं आँखि के पुतरिया राखसु करेजवा में मोर महतरिया आवते ससुरवा अघोरनी रे, सासु कहे कुलबोरनी. हवे मतवाली ह कुलछनी मतहिया सासुजी कहेली खेलवाड़ी ह भुतहिया परल कपार बिया चोरनी रे, सासु कहे कुलबोरनी. गारिए के मुँहे भिनुसहरे जगावेली उठि सुति हमरा केपूरा पढ़ीं…

(शनिचर, 14 फरवरी के खबर) भोजपुरिया जगत खातिर एगो बढ़िया सुविधा देत भोजपुरी के आनलाइन न्यूज साइट टटकाखबर डाॅट काॅम पर अब खबर पढ़ियो के सुनावल जात बा. संजोग से ई सुविधा विश्व रेडियो दिवस, 13 फरवरी, का दिनही शुरु भइल बा. बिना कवनो बड़हन तामझाम के एह भोजपुरी खबरपूरा पढ़ीं…

– डा॰ अशोक द्विवेदी अइसे त प्रकृति के एक से बढ़ि के एक अछूता, अनदेखा मनोहारी रूप ओह विशाल बनक्षेत्र में रहे बाकिर कई गो मुग्ध करे वाला जगह, हिडिमा घूमत-फिरत देखले-जनले रहे. सबेरे माता जब ओके भीम का सँग खुला आहार-बिहार आ सँगे रमण करे के सुतंत्र कइली तपूरा पढ़ीं…

– डॉ॰ उमेशजी ओझा छुटी के दिन रहे. हम सुरेश का घरे छुट्टी मनावे गइनी त हमरा के देखते सुरेश कहलन, ‘अहो भाग्य कि रउआ पधरनी हमरा दुआर प.’ ‘अरे का बोलऽतानी. बहुत पहिले से सोचले रही कि अतवार का दिने रउआ घरे के चाय पीए के बा. एह सेपूरा पढ़ीं…