Month: मार्च 2015

आसिफ रोहतासवी के दू गो गजल

-आसिफ रोहतासवी (एक) फेड़न के औकात बताई कहियो अइसन आन्ही आई. घामा पर हक इनको बाटे पियराइल दुबियो हरियाई. पाँव जरे चाहे तरुवाए चलहीं से नू राह ओराई. मोल, चलवले…

पाती के “प्रेम-कथा विशेषांक” पर बतकही

अभाव आ गरीबी पहिलहूँ रहे. दुख-दलिद्दर अइसन कि रगरि के देंहि क चोंइटा छोड़ा देव. लोग आपुस में रोइ-गाइ के जिनिगी बिता लेव, बाकिर मन मइल ना होखे देव. हारल-थाकल…

जनतब, अनचिन्हार आ परिचिताह (बतकुच्चन – 184)

जनतब, अनचिन्हार आ परिचिताह. तीनो के तीनो जान-पहचान से जुड़ल शब्द आ आजु के बतकुच्चन एकनिए पर. जनतब के जगहा हिन्दी में जंतव्य ना होखे आ हिन्दी के गंतव्य का…

नवका रहन अउर चाल ढाल

– जयंती पांडेय गरमी के पसीना से तर-बर भइल रामचेला हाफत-डाफत गुरू लस्टमानंद का लगे पहुँचले. सस्टांग दंडवत कइके आशीर्वाद लेहला के बाद रामचेला कहलन, गुरू आजकाल गउवों में बदलाव…

जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र में भइल परिचर्चा आ काव्यपाठ

“‘पाती’ पत्रिका भोजपुरी रचनाशीलता के आंदोलन के क्रांति-पताका हऽ. ‘पाती’ माने, नयकी पीढ़ी के नाँवे सांस्कृतिक चिट्ठी. एगो चुपचाप चले वाला सांस्कृतिक आंदोलन हवे ‘पाती’, जवना के अशोक द्विवेदी अपना…

कवन खाना खाइल ना जाव? (बतकुच्चन – 183)

पिछला बेर दहल, दहलल, आ दलकल के चरचा पर बात रोकले रहीं आजु ओहिजे से आगा बढ़ल चाहब. बाकिर बचपन के याद आवत बा जब सियालदह लोकल में एगो किताब…

भोजपुरिका पढ़े अइनी राउर स्वागत बा. बाकिर…

भोजपुरिहा लोग अइसे चाहे जतना बतकुच्चन कर लेव बाकिर वेबसाइट पर लिखल सामग्री का बारे में कवनो तरह के टिप्पणी करे से बहुते सकुचालें. कुछ लोग त एह से महटिया…