– अभय कृष्ण त्रिपाठी “विष्णु” श्रद्धालु कभी परेशान ना होले, परेशानी उनकर बा जे यात्रा अउरी तीर्थयात्रा दुनो के लाभ लेबे चाहत बा. ठीक इहे जुमला आज भोजपुरियो खातिर कहा सकत बा कि जेकरा भोजपुरी में जिए मरे के बा ओकरा खातिर 8 वीं के बैशाखी कवनो काम के ना.पूरा पढ़ीं…

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हर साल ईद का मौका पर आपन फिलिम रिलीज करे खातिर इस्लामी सभ्यता आ संस्कृति वाला बालीवुड में बेचैनी रहेला आ एकरा के बहुते खास मानल जाला. देखादेखी भोजपुरिओ सिनेमा में ईद के महत्व बढ़त गइल बा आ अब एहिजो ईद का मौका पर रिलीज छठ आ फगुआ का मौकापूरा पढ़ीं…

– ओम प्रकाश सिंह अब एहिजा एह कहाउत के संबंध मियाँ लोग से नइखे. मियाँ के मतलब पतिदेव से, आदमी से बा. मियाँ आ बेगम के इस्तेमाल हमेशा से मरद मेहरारू खातिर होखत आइल बा आ एकरा के सेकूलर कमुनल के नजर से देखला के कवनो जरूरत नइखे. अतना सफाईपूरा पढ़ीं…

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना के कार्यकारिणी के बइठक पिछला हफ्ता 5 जुलाई का दिने बेली रोड, जगदेव पथ, पटना में भइल. एह मौका पर जमशेदपुर के चर्चित कवि अउर साहित्यकार गंगा प्रसाद अरुण के सम्पादन में प्रकाशित भइल भोजपुरी साहित्य पत्रिका “लकीर” के तिसरका अंक के लोकार्पण सम्मेलनपूरा पढ़ीं…

– अभय कृष्ण त्रिपाठी “विष्णु” जमाना लाख बुरा चाहे त का होला, उहे होला जे मंजूरे खुदा होला. निकलल बानी सर कफ़न बांध के याद रखीह, मिट जाई हर रावन बस लक्ष के धियान धरीह, बा सेवा के इरादा त बोली के दरकिनार करीह, मरला बिना स्वर्ग नइखे ई मंत्रपूरा पढ़ीं…

– ओम प्रकाश सिंह साल 1975 भा 1976 रहुवे जब पहिला बेर हमरा एगो भोजपुरी के खण्डकाव्य रमबोला के जानकारी एगो दोस्त से मिलल. ऊ हमरा के ओह काव्य के एगो अंश भेजले रहुवन जवना के हम आपन एगो पत्रिका भोजपुरिहा के पहिलका अंक में शामिल कइले रहीं. वइसे तपूरा पढ़ीं…

मशहूर भोजपुरी राइटर आ टीवी पत्रकार मनोज भावुक भोजपुरी के सबले लोकप्रिय चैनल ‘महुआ प्लस’ के क्रिएटिव कंसल्टेंट बनावल गइल बाड़ें. लोग कहेला कि टेलीविजन पत्रकारिता में प्रतिभावान लोग नइखे बाकिर कुछ टेलीविजन पत्रकार लगातार एह भरम के तूड़त रहेलें. एहीमें मनोजो भावुक शामिल बाड़न. चैनलन में रहतो ऊ दुनियापूरा पढ़ीं…

– रासबिहारी गिरी नमस्कार ! एगो कहानी हमरा मन में बहुत दिन से घुमत रहुए. कहानी वोह समय के ह जब हम बहुत छोट रहनी, आ हम आपन बाबूजी आउर माई से सुनत रहनी. जब हम फिलिम में काम करे लगनी त ई कहानी हमके परेशान करे लागल. हमरा गावपूरा पढ़ीं…

<h3>- अभय कृष्ण त्रिपाठी “विष्णु”</h3> कबो ई सवाल हमरा मन में बारी-बारी घुमे बाकि काल पुरान मित्र डॉक्टर ओमप्रकाश जी के सन्देश से फिर से ताजा हो गइल. सवाल जेतना आसान बा जवाब ओतना आसान नइखे काहे से कारन खोजे में सबसे ज्यादा भोजपुरिये के करेजा छलनी होई. कुछ खासपूरा पढ़ीं…

– कमलाकर त्रिपाठी बाँके बिहारी घर से दुई-तीन कोस चलल होइहँ कि ओनकर माई चिल्लइलिन, ”रोका हो गड़िवान, दुलहिन क साँस उल्टा होय गइल.“ बाँके लपक के लढ़िया के धूरा पर गोड़ राखि के ओहार हटाय के तकलन – ”का भइल रे?“ ”होई का ए बाबू, अब अस्पताल गइले कापूरा पढ़ीं…

हे प्रचारक बन्धु, रउरा अपना गाहकन के सिनेमा आ कृति के प्रचार कइल आपन पेशा बनवले बानी जवन स्वागत जोग बा. बाकिर का कबो सोचले बानी कि भोजपुरी स‌िनेमा में आवत गिरावट के थोड़ बहुत जिम्मेदारी राउरो बनत बा. अउरी भाषा के सिनेमा इंडस्ट्री में प्रचारक लोग बा ओह लोगपूरा पढ़ीं…