– डाॅ. अशोक द्विवेदी काल्हु भोरे क निकलल रात एक बजे घरे पहुंचनी. ए साल के सावन में बलिया बनारस ढेर इयाद आइल बाकि महाराष्ट् में भीमा श॔कर ज्योतिर्लिंग के दरस परस खातिर कइल यात्रा अपना आप में अनूठा आ अविस्मरणीय रहल. पहाड़, झरना, बन से होत प्रकृति के अनुपमपूरा पढ़ीं…

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– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ मैकाले शिक्षा पद्धति से अरजल शिक्षा में अफीमो से ज्यादे नशा बा. जवना के अरजते मनई के मन-मिजाज अइसन बउराला-पगलाला कि ओकरा भारतीय सभ्यता-संस्कृति, भाषा-शिक्षा, नैतिकता-आध्यात्मिकता वगैरह सबकुछ बकवास, फाल्तु, गँवारू, पिछड़ल वगैरह लागे लागेला. सदियन-सदियन तक आपन आर्यावर्त (भारतवर्ष) विश्वगुरु रहे. ज्ञान के पहिलापूरा पढ़ीं…

मुम्बई का विले पार्ले स्थित “नवीन भाई ठक्कर सभागार” में “अभियान” संस्था का सहयोग से आयोजित ‘सबरंग फिल्म स्टार सम्मान समारोह’ आ ‘भोजपुरी पंचायत’ वार्षिकोत्सव का अवसर प डा0 अशोक द्विवेदी के चर्चित भोजपुरी उपन्यास “बनचरी” के विमोचन हिन्दी दैनिक ‘सामना’ के संपादक प्रेम शुक्ल कइलन. एह मौका पर विश्वपूरा पढ़ीं…

भोजपुरी भाषा के संवैधानिक मान्यता दिआवे खातिर मांग करत एगो भोजपुरी प्रतिनिधि मंडल पिछला दिने यूपी के राज्यपाल राम नाईक जी से मिल के उनुका के आपन मांग पत्र सँउपलसि. भोजपुरी भाषा दुनिया के अनेके देशन में इस्तेमाल होले बाकिर अपने देश में एकरा ऊ मान सम्मान नइखे मिलल जवनापूरा पढ़ीं…

– डॉ० हरीन्द्र ‘हिमकर’ सीमा के पाती, बॉंची जा एह चिठ्ठी में चीख बा। दिल्लीवालन भूल ना जाईं समाचार सब ठीक बा।। धान-पान सब सूख गइल बा खेत-मजूरा चूक गइल बा। पेट-पेट में कोन्हू नाचत हियरा-हियरा हूक गइल बा। घर में कहॉं बचल अब दाना? एक आसरा भीख बा समाचारपूरा पढ़ीं…

– ऋतुराज आजकल रोज हम अखबार पढ़ेनीं अखबार में आइल लेख दू-चार पढ़ेनीं। चोरी, हत्या, गरीबन के लूटल होखेला रोज कुछ बलात्कार पढ़ेनीं।। आजकल रोज हम अखबार पढ़ेनीं अखबार में आइल लेख दू-चार पढ़ेनीं। तेज हो रहल विकास पढ़ेनीं उठ रहल भरोसा-विश्वास पढ़ेनीं। सड़ रहल गोदामन में अनाज भूख सेपूरा पढ़ीं…

– देवेन्द्र आर्य दलित विचार का बारे में राजनीतिक सोच जतने व्यावहारिक, साफ आ मकसद वाला लउकेला, साहित्यिक सोच ओतने अझुराह, भकुआइल, ठहरल आ भेड़चाल वाला बा. अम्बेडकर से लगवले कांसीराम-मायावती तक के राजनीतिक नजरिया साफ बा कि सत्ता में दलितन के हिस्सेदारी तय करवले बिना सदियन से चलल आवतपूरा पढ़ीं…

– ‍हरिराम पाण्डेय बिहार के चुनावी घमासान तेज होखल जात बा. एह चुनाव में जीते खातिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगे एक से एक व्यूह बा. अबे हालही में ऊ जंगलराज के एगो शिगूफा छोड़ले रहलन आ अब बिहार के विकास के जाल पसारत बाड़ें. बिहार के बढ़न्ती ला पीएमपूरा पढ़ीं…

– डाॅ. अशोक द्विवेदी ‘लोक’ के बतिये निराली बा. आदर-निरादर, उपेक्षा-तिरस्कार के व्यक्त करे क टोन आ तरीका अलगा बा. हम काल्हु अपना एगो मित्र किहाँ गइल रहलीं. उहाँ दुइये दिन पहिले उनकर माई उनका उनका गाँव आरा (बिहार) से आइल रहुवी. पलग्गी आ हाल चाल का बाद अनासो हमरापूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ पश्चिम के दू शब्द “वैश्वीकरण” आ “भूमंडलीकरण” बहुते लोकलुभावन आ मनभावन बा. एकरा बाहरी रुप,रंग आ सम्मोहक ढंग पर के नइखे रीझल. एकरा साम, दाम, काम, चाम आ भेद-विच्छेद से के नइखे घावाहिल भइल. निपट अनाड़ी से लेके अगड़धत पंडित पुजारी तक सभे एकरे पीछेपूरा पढ़ीं…

– डाॅ. अशोक द्विवेदी गंगा, सरजू, सोन का पाट में फइलल खेतिहर-संस्कृति दरसल “परिवार” का नेइं पर बनल गृहस्थ संस्कृति हऽ. परिवार बना के रहे खातिर पुरुष स्त्री क गँठजोरा क के बिवाह संस्कार से बान्हल आ मर्यादित कइला का पाछा सृष्टिकारी कर्म के गति देबे क भावना रहे. घरपूरा पढ़ीं…