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लोकजीवन के ‘बढ़नी’ आ ‘बढ़ावन’

October 29, 2015 Editor 0

– डा॰ अशोक द्विवेदी ‘लोक’ के बतिये निराली बा, आदर-निरादर, उपेक्षा-तिरस्कार सब के व्यक्त करे क ‘टोन’ आ तरीका अलगा बा. हम काल्हु अपना एगो […]

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गज़ल

October 27, 2015 Editor 0

– डा0 अशोक द्विवेदी नेह-छोह रस-पागल बोली उड़ल गाँव के हँसी-ठिठोली. घर- घर मंगल बाँटे वाली कहाँ गइल चिरइन के बोली. सुधियन में अजिया उभरेली […]

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गज़ल

October 10, 2015 Editor 0

– डा0 अशोक द्विवेदी कुछ नया कुछ पुरान घाव रही तहरा खातिर नया चुनाव रही । रेवड़ी चीन्हि के , बँटात रही आँख में जबले […]

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गजल

October 2, 2015 Editor 0

– डा0 अशोक द्विवेदी दउर- दउर थाकल जिनगानी कतना आग बुतावे पानी ! बरिसन से सपना सपने बा ; छछनत बचपन बूढ़ जवानी । हरियर […]