– डा॰ अशोक द्विवेदी ‘लोक’ के बतिये निराली बा, आदर-निरादर, उपेक्षा-तिरस्कार सब के व्यक्त करे क ‘टोन’ आ तरीका अलगा बा. हम काल्हु अपना एगो मित्र किहाँ गइल रहलीं, उहाँ दुइये दिन पहिले उनकर माई उनका गाँव आरा (बिहार) से आइल रहुवी. पलग्गी आ हाल चाल का बाद अनासो हमरापूरा पढ़ीं…

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– रामरक्षा मिश्र विमल शहर में घीव के दीया बराता रोज कुछ दिन से सपन के धान आ गेहूँ बोआता रोज कुछ दिन से जहाँ सूई ढुकल ना खूब हुमचल लोग बरिसन ले उहाँ जबरन ढुकावल फार जाता रोज कुछ दिन से छिहत्तर बेर जुठियवलसि बकरिया पोखरा के जल गतेपूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी नेह-छोह रस-पागल बोली उड़ल गाँव के हँसी-ठिठोली. घर- घर मंगल बाँटे वाली कहाँ गइल चिरइन के बोली. सुधियन में अजिया उभरेली जतने मयगर, ओतने भोली. दइब क लीला-दीठि निराली दुख- सुख खेलें आँख मिचोली. हिलल पात, पीपर-मन डोलल पुरुवा रुकल त, पछुवा डोली. आपन-आपन महता बाटेपूरा पढ़ीं…

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी आजु हमरा के नियरा बईठा के बाबूजी बहुते कुछ समुझवनी ह । दुनियाँ – समाज के रहन सभ हमरा के विस्तार मे बतवनी ह ॥ बाबूजी बहुते कुछ…. राजनीति के रहतब-करतब एने-ओने के ताक-झाँक बोली-ठिठोली के मतलबो आ नीक-निहोरा क आईना देखवनी ह ॥ बाबूजी बहुतेपूरा पढ़ीं…

– देवेन्द्र आर्य आजादी क बाद शायद ई पहिला बेर भइल बा कि मिलल पुरस्कार लवटावे वालन के लाईन लागल जात बा. अलग अलग भाषा, प्रदेश आ विचारधारा के लिखनिहार लोग के साहित्य अकादमी से मिलल सम्मान एलानिया वापस करे के निहुरी राजनीति पाक-साफ लउके वाला लोग के चिन्ता मेंपूरा पढ़ीं…

  – डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल 1. मन इ जब जब उदास होखेला तोहरे   आस-पास   होखेला   घर धुँआइल बा आँख लहरेला जब भी बुधुआ किताब खोलेला   तोहरा के भुला सकबि कइसे आजुओ मन लुका के रो लेला   चोर भइलीं भलाई ला जेकरा ऊहे हमरा के चोर बोलेलापूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी कुछ नया कुछ पुरान घाव रही तहरा खातिर नया चुनाव रही । रेवड़ी चीन्हि के , बँटात रही आँख में जबले भेद-भाव रही । अन्न- धन से भरी कहीं कोठिला छोट मनई बदे अभाव रही । भाव हर चीज के रही बेभाव जबले हमनी के ईपूरा पढ़ीं…

– शिलिमुख आम आदमी का नाँव प’ सत्ता पावे वाली पारटी के मुखिया, आम आदिमी क भला करसु भा ना करसु बाकि आम आदमी का टेक्स से कमाइल पइसा से आम मनई का संवेदना-सद्भाव क राजनीतिकरन त कइये देले बाड़न. शेखी बघारे आ आत्म प्रचार में त ऊ पहिलहीं सेपूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी दउर- दउर थाकल जिनगानी कतना आग बुतावे पानी ! बरिसन से सपना सपने बा ; छछनत बचपन बूढ़ जवानी । हरियर धान सोनहुली बाली, रउरे देखलीं , हम का जानी ? कबहूँ -कबहूँ क्षुधा जुड़ाला जहिया सबहर जरे चुहानी । पूत -पतोह बसल परदेसे – उचटलपूरा पढ़ीं…