Abhay Tripathi
बनारस, उत्तर प्रदेश

- अभय त्रिपाठी
बाबू हमार बियाह कईऽले
हमार अज्ञान मिटावे खातिर बाबू हमार बियाह कईऽले,
ज्ञान के चक्षु खुलते भईया हमरा लाइफ से बाहर गईऽले.
माई के सेवा हम कईऽलीं अऊऽर बाबू के गोड़ दबवलीं,
कबहुँ न ऊँचा बोली बोललीं ईऽ सब हम अज्ञान में कइऽलीं.
हमरा ज्ञान बढ़ावे खातिर बाबू एक प्रयोजन कईऽले,
सबकर राय मंत्रणा ले के हमरा खातिर लऽईकी देखले.
हमार अज्ञान मिटावे खातिर बाबू हमार बियाह कईऽले.
पत्नी आईल सुन्दर गोरी हमके बहुत बहुत ही भाईऽल,
हमरा ज्ञान के सीमा जनले मन ही मन बहुत पछताईऽल.
लोक लाज के शरम में आके पहिले तऽ चुपचाप रह गईऽल,
ओकरा जरिये सरऊऽ फिर हमरा मन पैठ जऽमईऽले.
हमार अज्ञान मिटावे खातिर बाबू हमार बियाह कईऽले.
मेहरारु के रंग में आके हमरे ज्ञान के चक्षु खुल गईऽल,
माई बाबू गौड़ भये अऊर मेहरारु सर्वोपरि हो गईऽल.
माई के सेवा के बदले मेहरारु कऽऽ नशा छा गईऽल,
सरऊ के चक्कर में आके बाबु अपना गोड़ से गईऽले.
हमार अज्ञान मिटावे खातिर बाबू हमार बियाह कईऽले.
माई बाबू से छुट्टी खातिर जल्दी से सब बियाह कऽईले,
का रखल बा माई बाबू में पत्नी के सम्पूर्ण समझऽले.
पीछे की छोड़ आगे की सुध ले नारा ई मन में तू जमईऽले,
बिटवा कबहु न पैदा करिऽहे वरना तू भी काम से गईऽले.
हमार अज्ञान मिटावे खातिर बाबू हमार बियाह कईऽले.