Abhay Tripathi

बनारस, उत्तर प्रदेश

- अभय त्रिपाठी

मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह

ना कुछ कहिऽह ना कुछ बोलिऽह मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह.

सबके फिकर बा आपन आपन न्याय भईल अब सपना भईया,
गाँधी के सिद्धान्त गईल बा हिंसा ईंहा के राज भईल बा.
देख के ईऽ सब आँख ही मुदिंऽह मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह.

भारत माता रोअत बाड़ी कोख के अपना कोसत बाड़ी,
इक दुसरे के रोजी झपटल अन्याय के रथ पर भटकल.
दिल ही दिल में तू रखिऽह मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह.

अपने से दूबर के पटकल शान देखावत कभी ना अटकल,
मार काट तऽ अइसे कईऽलस इंतहान के परचा दिहलस.
करम के अपना तू रोईऽह मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह.

ना कुछ कहिऽह ना कुछ बोलिऽह मनवा तू चुपचाप ही रहिऽह.


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