अभय त्रिपाठी

बनारस, उत्तर प्रदेश

धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी

धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी पावन गंगा के पानी
जेकरा दर्शन के तरसे जग के सगरो प्राणी प्राणी.

मूरख पंडित साधू अऊर ग्यानी राजा रंक अऊर अभिमानी,
केहु नाही बा अइसन भईया जे काशीके महिमा ना जानी.
पाप से मुक्ति पावे खातिर हर केहु आवेला काशी,
उनके बाऽ विश्वास कि जालन स्वर्ग में काशी के बाशी.
धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी पावन गंगा के पानी.

काशी के महिमा कारण ग्रहन में आला अईसन भीर,
तिल धरे भर के जगह नाऽ बाचल गंगाजी के तीर.
बुढ़ा बच्चा अऊर जवान भेद भाव के छोड़ निशान,
दौड़ लगावे अइसे जइसे मिल गइले इनके भगवान .
धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी पावन गंगा के पानी .

भीड़ भी लऽउके अइसन जइसे बाढ़ के उमड़ल पानी,
सच्ची सेवा के भावना में भूल गइल सब कुछ प्रानी.
नैया गंगाजी में दौड़ल लेके यात्री जन के पूरा भार,
जनसेवक उनके सेवा खातिर हरदम बा पूरा तैयार .
धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी पावन गंगा के पानी.

घाट घाट पर शोर मचल सुन लीं साधू संतन के बोली,
दान धरम के महिमा सुना के उनकर भर गइल झोली.
गंगा किनारे और सड़क पर लागल ड्यूटि पुलिस के भाई,
इधर से आके उधर से जा जा जनता के बा रहल समझाई .
धन्य धन्य काशी कीऽ नगरी पावन गंगा के पानी .