Abhay Tripathi

बनारस, उत्तर प्रदेश

- अभय त्रिपाठी

इक दिनवा पछतऽईबऽऽ हो मोरे मनवा

इक दिनवा पछतऽईबऽऽ हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.

भाई बन्धु हो जइहें बेगनवा,
जरिहें अकेले तोहरो परनवा.
माटी में मिल जइबऽऽ हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.

धन दौलत और छूटी भवनवाँ,
जेहि खातिर हो गईलऽऽ बेइमनवा.
कुछुओ ना रह जाई हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.

लागी दरबार होखी तोहरो बयनवा,
का कहबऽऽ जब खाली बा खजनवा.
लोरऽवा खूब चूअइऽऽब हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.

दीनन हीनन से न राख तू गमनवा,
तोहपे लगईऽऽहैं वार तोहरे ईमनवा.
फिर पछताई के का करबऽऽ हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.

इक दिनवा पछतऽईबऽऽ हो मोरे मनवा इक दिनवा पछतऽईबऽऽ.


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