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Abhay Tripathi

बनारस, उत्तर प्रदेश

- अभय त्रिपाठी

मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी


डोले फगुनऽईया जब डार पात लहरी,
मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी।
 
कुहुके कोयलिया तऽ पीरा होय गहरी,
अन्हियारे पिपरा पकड़िया जब झहरी।
फरल फुलायल सब गोयड़े कऽ रहरी,
भिनसारे महुआ से महुआ जब झहरी।
मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी।
 
संघिया के मार से प्रति नित कहरी,
मटक चले गोरी जब ताल व नहरी।
बिरहन सताये जब बसंत के प्रहरी
असुँअन छिपाये खातिर करे बरजोरी।
मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी।
 
फूलन पर भँवरा के झुण्ड आ ठहरी,
सबके घर अइलन जब परदेशी शहरी।
छलकल बिरह रस नैनन की डहरी,
शिकवा शिकायत के लागल कचहरी।
मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी।
 
डोले फगुनऽईया जब डार पात लहरी,
मीत बिना गीत लागे फागुन के जहरी।