Abhay Tripathi
बनारस, उत्तर प्रदेश

- अभय त्रिपाठी
कइसन-कइसन जिनगी
का का कहीं कइसे चुप रहीं हम हर कदम पर सवाल करेला जिनगी,
जिनगी खुद एक सवाल बन गईल देख के कइसन कइसन जिनगी।।
माई के दूध खातिर बचवन लोग के अफनात जिनगी,
दस रूपया खातिर सौ रुपया के गोली खात जिनगी।
हर मौके पर लाचारन के लूऽटत खसोटत जिनगी,
पापी पेट खातिर आपन जिसम लुटावत जिनगी।
जिनगी खुद एक सवाल.....।।
जिनगी के खेला में दुसरा के जिनगी लुटावट जिनगी,
माई-बाबू के सेवा के बदला कुकुरन के घुमावत जिनगी।
सन्यास लेहला के बाद भी विलासिता से भरपूर जिनगी,
जवन चीज आपन ना बा ओ खातिर खून बहावत जिनगी।
जिनगी खुद एक सवाल.....।।
रिश्तन के टूटत सिमेन्ट से आपन गृहस्थी बसावत जिनगी,
नेतावन के मतलब परस्ती से जनता के बेहाल भईल जिनगी।
दुसरा के माल पर राजा बने कऽ ख्वाव देखत भईल जिनगी,
जवन डाल पर इंसान बऽईठल बा ओही डाल के काटत जिनगी।
जिनगी खुद एक सवाल.....।।
का का कहीं कइसे चुप रहीं हम हर कदम पर सवाल करेला जिनगी,
जिनगी खुद एक सवाल बन गईल देख के कइसन कइसन जिनगी।।