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Author: Editor

हिन्दी के ‘खाता’ आ हिन्दी के ‘त्राता’ से रार पर मनुहार

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साँच उघारल जरूरी बा !

– डॉ अशोक द्विवेदी हम भोजपुरी धरती क सन्तान, ओकरे धूरि-माटी, हवा-बतास में अँखफोर भइनी। हमार बचपन आ किशोर वय ओकरे सानी-पानी आ सरेहि में गुजरल । भोजपुरी बोली-बानी से हमरा भाषा के संस्कार मिलल, हँसल-बोलल आ रोवल-गावल आइल। ऊ समझ आ दीठि मिलल, जवना से हम अपना गँवई लोक का साथे, देशो के इतिहास भूगोल समझनी, आनो के आपन मननी । संग-साथ का सामूहिक उतजोग से पारस्परिकता के भाव जगल। जीवन-संस्कृति के लूर-सहूर सिखनी हमरा एह व्यक्तित्व का निर्मान में पहिल भूमिका भलहीं हमरा माई-बाप, सगा-सम्बन्धी चाचा-चाची, मामा-मामी, फुआ, ईया-बाबा क रहे, बाकिर ओहू अनगिनत लोगन के रहे...

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लंकेश वध आ ओकरा प होखत चुतियापा – बतंगड़ 53

– ओ. पी. सिंह पिछला हफ्ता कर्नाटक के बैंगलुरु में एगो अंगरेजी पत्रकार गौरी लंकेश के कुछ बदमाश गोली मार के खून क डललें आ ओकरा कुछेके मिनट में शुरु हो गइल चुतिया पत्रकारन आ अउरी चुतियन के चुतियापा. आ हम का बात के बतंगड़ करीलें जे ई चुतिया के देखवले सँ. चुतिया शब्द के इस्तेमाल हम आजु जानबूझ के आ पूरा जिम्मेदारी से करत बानी. काहे कि एगो चुतिया नेता देश के पीएम के चुतियापा के रेघरियावे के कोशिश कइलन. ओकरा बाद चुतिया शब्द के लेके एगो अलगे कोहराम मच गइल. एहसे लंकेश वध से पहिले एह चुतिया...

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ना नीमन काम करे ना दरबारे ध के जाय – बतंगड़ 52

– ओ. पी. सिंह प्राइवेसी के मुद्दा एहघरी पब्लिक में बा. केहू हरान त केहू परेशान बा आपन प्राइवेसी बनवले राखे खातिर. ऊ लोग चाहत नइखे कि ओह लोग के राज खुलि जाव. कहि देब हो राजा राति वाली बतीया कहि कहि के उनुका के उघार मत करा देव केहू. आ सभले बेसी चिन्ता ओह लोग के बा जिनकर करीया कमाई, कुकरम सामने आवे के डर बा. उनुका पैन बनवावे में दिक्कत ना रहल काहे कि कई गो पैन बनवावल सहज रहुवे. दिक्कत आधार से बा. दू गो आधार बन ना सके आ सरकार जे बिया कि गरदन दबवले...

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बघवा के डर नइखे टीपटीपवा के डर बा – बतंगड़ 51

– ओ. पी. सिंह लरिकाईं में सुनल एगो कहानी याद आ गइल जब तृणमूलिया दीदीया कह बइठली के हमरा मोदी से शिकायत नइखे अमित शाह से बा. ओह कहानी के बुढ़ियो के बघवा के डर ना रहुवे टीपटीपवा के डर जरुर रहुवे. अब चूंकि हो सकेला कि नयकी पीढ़ी एह कहानी के ना सुनले होखे से संदर्भ समुझे में ओकरा दिक्कत होखो. सं संक्षेप में बता देत बानी. बुढ़िया के गाँव प एगो बाघ के नजर पड़ गइल रहे आ ऊ जब ना तब गाँव में घुस आवे आ जेही भेंटा जाव ओकरे के उठा ले जात रहुवे. ओह...

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जाने कवन राहे अइहें

– प्रिन्स रितुराज छन छन छनके आहट सुन के मन गचके जाने कवन राहे अइहें इहे सोच के मन खटके. आदत अइसन उनकर भइल बिना सोचे मन तरसे नशा केतना नशीला होला देख के उनके अइसन सूझे. अंग अंग के अइसन रचना लागे फुरसत में रहले राम तनिको हमनियो पर रहित धयान लिहती हजार नैना हथिया. कारी कजरा मदहोस बा कइले चाल त बा पागल बनवले हाथ के मेहदी के करामत सुनऽ सुनरता प बा चार चान लगवले. कमर कमानी पातर छितर चिकन बा चाम हो माछी बइठत बिछ्लत जाले काबू में ना होला ओकर देह हो. माई बाप...

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राजनीति के रंग आ रंग के राजनीति – बतंगड़ 50

– ओ. पी. सिंह राजनीति के रंग-ढंग रंगो मैं राजनीति ले के चल आइल बा. कहल जाला कि राजनीति के असर जिनिगी के हर पहलू प पड़ेला आ एकरा से बाचल ना जा सके. बाकिर जब ई रंगो में राजनीति देखे लागे, ओकरा के गाढ़ करे लागे त नोटिस लीहल जरुरी हो जाला. केहू माने भा मत माने, अपना देश के मूल में हिन्दू संस्कार बा जवना प बाद में आइल हमलावरन के संस्कृति संस्कारन के असर पड़त गइल. हिन्दू संस्कार भेदभाव के खिलाफ रहल बा. एह संस्कार में वसुधैव कुटुम्बकम के भावना शुरु से रहल बा. एही चलते...

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खलील खाँ बहुते दिन फाख्ता उड़ा लिहलन – बतंगड़ 49

– ओ. पी. सिंह गुजरात से राज्यसभा के तीन गो सीट ला भइल चुनाव में जइसन दाँवपेंच देखे के मिलल तइसन आजु ले देखे ला ना मिलल रहुवे. लोग त मान के चलत रहुवे कि राज्यसभा चुनाव कहहीं भर के चुनाव होला. एह में सबकुछ पहिलहीं से तय रहेला. कबो कबो एक सीट प मारामारी होखबो करेला त ओहमें बहुत सस्पेंस भा थ्रिल ना होखे. अकसरहां वइसन मौकन प कवनो धनी अपना धनबल से जीत के जोगाड़ बइठा लेबेलें. बाकिर गुजरात में अबकी जवन देखे के मिलल तवन राजनीति के बढ़िया पाठ पढ़ा गइल. बहुले लोग राज्यसभा चुनाव के...

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फहरावs तिरंगा

फहरावs फहरावs तिरंगा आसमान में फहरावs । केसरिया के अमर सनेसा शान्ति रहो सुख चैन रहो तप के धनी रहो ई धरती प्रेम मगन सब नैन रहो ईहे भाव लेके ए भईया झंडा का नियरा आवs। फहरावs फहरावs तिरंगा आसमान में फहरावs। ऊजर धप धप के सनेस बा हंस बनs ज्ञानी होखs ज्ञान तेज से चमके भारत संतोषी दानी होखs वेद वि्वेकी बनो देस ई भाव फूल तू बरसावs। फहरावsफहरावs तिरंगा आसमान में फहरावsय़ हरिहर अंचरा के सनेस बा बन – जीवन के रखवारी धानी रंग खिले धरती पर चहको महको फुलवारी हरखित मन से धजा उठावs धरती भर...

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जिबह आ झटका के राजनीति – बतंगड़ 48

– ओ. पी. सिंह समुझ में नइखे आवत कि अब एह देश के राजनीति कइसे चली. अबहीं ले देश के हिन्दूवन के आ हिन्दुत्व के राजनीति करे वाला जनसंघ-भाजपा में किलर इंस्टिंक्ट ना रहला का चलते सेकुलर गिरोह एह लोग के प्यार से जिबहत रहलें आ ई लोग ओकरा के बरदाश्त करत रहुवे. सेकुलर गिरोह के दाँवपेंच देश के अदालतो सीख लिहली सँ. छह बरीस के लड़िका सरेआम गड़ाँसा ले के बकरी जिबह कर सकेला, बाकिर जन्माष्टमी का दिने नारियल से दही हाँड़ी ना फोड़ सके. दिन में पाँच बेर लाउडस्पीकर चला के अपना लोगन के बोलावल जा सकेला...

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