– डॉ. हरेश्वर राय हमार सान ह हमार पहचान ह भोजपुरी, हमार मतारी ह हमार जान ह भोजपुरी। इहे ह खेत, इहे खरिहान ह इहे ह सोखा, इहे सिवान ह, हमार सुरुज ह हमार चान ह भोजपुरी। बचपन बुढ़ापा ह, इहे जवानी चूल्हा के आगि ह, अदहन के पानी, हमारपूरा पढ़ीं…

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– तारकेश्वर राय जोगीरा सा रा रा रा … राब गुर त भेटाते नइखे, महंग भइल चाउर ।। बी.पी.एल. के कारड लेके, झनकऽ का करबऽ आउर ।। जोगीरा सा रा रा रा … का करबऽ भोपाल जाके, कइसे तोड़बऽ मायाजाल के ।। रंग अबीर ढोल आ चंग बा, होली कपूरा पढ़ीं…

– तारकेश्वर राय देख ए बाबू, सुनऽ ए भाई देशवा हमार जरऽता । कहीं बस, कहीं कार, केहू खुनसे में बरऽता ।। सद्बुद्धि छोड़ छाड़ के, मनई धावऽता । कइसे कहीं ए भइया, कि फगुवा आवऽता कुछ खुरचलियन के फितरत देखीं । समाज के टुकड़न में, बटत छीटात देखीं ।।पूरा पढ़ीं…

– तारकेश्वर राय पुरनकी पतईया, फेड़वा गिरावे । जइसे गिरहथ, कवनो खेतवा निरावे ।। नइकी पतइया बदे, जगहा बनावे । जाए के बा एक दिन, इहे समझावे ।। चइती फसलिया, बा गदराइल । लागत फगुनवां, बा नियराइल ।। सरसो पियरकी से, खेतवा रंगाइल । अमवाँ मउराइल, महुवा मोजराइल ।। चारुपूरा पढ़ीं…

गीतकार- लाल बिहारी लाल स्त्री स्वर- सांवरिया आ जइतऽ एक बार अंखियाँ कब से राह निहारे, नैना तरसे हमार सांवरिया आ जइतऽ एक बार…. पानी बिन मछरी के जइसे, तड़पी रोज पिया तोहरे याद मे बेसुध होके, भटकी रोज पिया दिने-दिन प्यास बढ़त बा, लागे ना जीया हमार सांवरिया आपूरा पढ़ीं…

– शिलीमुख जेकरा पर बा तोहके नाज ओकरे से बा बिगरत काज ! अँइचा के ऊजर ना लउके आन्हर के सूघर ना लउके सब बाउर, नीमन कुछ नाहीं ओकरा के बस गद्दी चाहीं जाति-बरग में भेद बढ़ा के सुबिधा-शक्ति-अफीम चटा के जतना चाही लूटी खाई खुरचुन के परसाद खियाई। पुहुतपूरा पढ़ीं…

– अशोक द्विवेदी लोकभाषा भोजपुरी में अभिव्यक्ति के पुरनका रूप, अउर भाषा सब नियर भले वाचिक (कहे-सुने वाला) रहे बाकिर जब ए भाषा में लिखे-पढ़े का साथ साहित्यो रचाये लागल तब एह भाषा के साहित्य पढ़े वालन क संख्या ओह हिसाब से ना बढ़ल, जवना हिसाब से एकर बोले-बतियावे वालनपूरा पढ़ीं…

– आचार्य विद्यानिवास मिश्र भोजपुरी में लिखे के मन बहुते बनवलीं त एकाध कविता लिखलीं, एसे अधिक ना लिखि पवलीं। कान सोचीलें त लागेला जे का लिखीं, लिखले में कुछ रखलो बा! आ फेरो कइसे लिखीं? मन से न लिखल जाला! आ मन-मानिक होखो चाहे ना होखो-हेरइले रहेला, बेमन सेपूरा पढ़ीं…

– डॉ. कमल किशोर सिंह सुन्दर सरोबर हो कि कौनो पंक दल-दल , पता केकरा बा कि कहँवा खिली एगो कमल शतदल। कठिन बा ई कहल केकर कहँवा होई प्रसुति घर। रोडसाइड, बाथरुम भा साफ़ सुथरा हॉस्पिटल, झोपड़ी झाड़ी महल , कारावास आकि अस्तबल हमेसा ई असंभव बा कहल किपूरा पढ़ीं…

– डॉ. कमल किशोर सिंह (1) पाला साल बीतते फेरु से पडे़ लागल जाड़ा. लागेला हमरा के मारी देलस पाला. मन घास पात अस मऊरा कठुआ जाला रूई आ धुईं से ना मन गरमाला. देखते ही बहरी देह बऱफ बन जाला. कहाँ जाई , का करीं, कुछो ना बुझाला .पूरा पढ़ीं…

भोजपुरी साहित्यकार विनोद द्विवेदी के लिखल छोट छोट कहानियन के संग्रह “कहनी-अनकहनी” प्रकाशित हो गइल बा. एह संग्रह के बारे में प्रकाशक के कहनाम एहिजा दीहल जा रहल बा – लघुकथा कहानी के ऊ लघु-विन्यास ह, जवना में जिनिगी के कवनो खास पल, कवनो घटना, क्रिया-व्यापार भा संवेदन-सूत रहेला. कथापूरा पढ़ीं…