“संतोख अतने बा / कि गाँव अपना में अझुराइल / अपने में परेशान / अपने में मगन / अतने में गील / कि हिनिके उड़ा देब! / हुनके भठा देब! / उनकर मामर हेठ करब! / बहुत जल्दिये गोटी सेट करब!!” ना, ना. गलत समुझला के जरूरत नइखे. बतकुच्चन मेंपूरा पढ़ीं…

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– अभयकृष्ण त्रिपाठी बीत गइल शिवरात्रि बाबा नाही अइलऽ तू, पडल रह गइल भांग धतूरा नाही खइलऽ तू | का दिल्ली का कलकत्ता का काशी का मथुरा, तोहरा आड़ में खा रहल बा हर केहू भांग धतूरा, जहर के खाके जहर उगीलत नाही देखलऽ तू, बीत गइल शिवरात्रि बाबा……….| मानतपूरा पढ़ीं…

पिछला दस साल से भोजपुरी के वेबसाइट चलावत अपना अनुभव से इहे सिखले बानी कि भोजपुरी में वेबसाइट चलावल बहुते मुश्किल काम होला. सबसे पहिले भोजपुरी में वेबसाइट शुरू भइल रहे अँजोरिया. एकरा बाद बहुते वेबसाइट अइलीं स. कुछेक त बहुते मजगर तरीका से निकलली सँ बाकिर गँवे गँवे सभकरपूरा पढ़ीं…

पिछला कुछ महीना से फाँसी का फैसला पर गृहमंत्रालय अतना फदफदा गइल बा कि ताबड़तोड़ फाँसी सकारे के सलाह दिहले जात बा. अब एह बात पर बहुते कुछ मन करे लागल कहे सुने के. बाकिर आजु के हालात अइसन हो गइल बा कि बतियावे के आजादी भले होखे बतावे केपूरा पढ़ीं…

एह अंक में भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता का गंभीर मुद्दा पर पत्रिका संपादक कुलदीप कुमार के संपादकीय में राजनेता लोग के चेहरा के मुखौटा उतारे के कोशिश भइल बा भोजपुरियन का सभा में आ के झूठ आश्वासन दिहल आ निकलते भुला गइला के शिकायत एकदमे सही बा. प्रभाकर पांडे केपूरा पढ़ीं…

– डा॰अशोक द्विवेदी दूबि से निकहन चउँरल जगत वाला एगो इनार रहे छोटक राय का दुआर पर. ओकरा पुरुब, थोरिके दूर पर एगो घन बँसवारि रहे. तनिके दक्खिन एगो नीबि के छोट फेंड़ रहे. ओही जा ऊखि पेरे वाला कल रहे आ दू गो बड़-बड़ चूल्हि. दुनों पर करहा चढ़लपूरा पढ़ीं…

लाजे भवहि बोलसु ना, सवादे भसुर छोड़सु ना. अब एह बाति पर भड़कला के कवनो जरूरत नइखे. ई कहाउत हमार बनावल ना ह आ जमाना से चलल आवत बा. इहो बाति नइखे कि हमरा फगुनाहट लाग गइल बा. काहे कि फागुन के आहट बतावे वाला बयार अब भेंटात नइखे प्रदूषणपूरा पढ़ीं…

केहू ढुकल, केहू ढुकावल, आ केहू ढुका लागल देखत रहि गइल. ढकना, ढकनी, ढाकल, तोपल त बहुते सुनले बानी आजु ढुकले पर चरचा कर लिहल जाव. ढुकल आ घुसल दुनु के मतलब एके जस होला. धेयान दीं एके जस, एके ना. काहे कि घुसल कहला में तनी सीनाजोरी, उदण्डता केपूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय दहशत के किस्सा त दर्दनाक होइबे करी। ग़म के दौर में ख़ुशी इत्तेफाक होइबे करी।। माचिस के तिल्ली कबले खैर मनाई आपन, जरावल काम बा त खुद खाक होइबे करी।। जेकर काम होखे भरम उतारल चौराहा पर, ओकरो बदन पर कौनो पोशाक होइबे करी।। जवान बिटियापूरा पढ़ीं…

वरिष्ठ पत्रकार आ भोजपुरी के चर्चित कथाकार गिरिजाशंकर राय “गिरिजेश” भोजपुरी माटी आ बोली-बानी के संवेदनशील रचनाकार रहलन. उनका कहानियन में भोजपुरी जीवन जगत के जथारथ आ जथारथ का भीतर के साँच उद्घाटित भइल.” ई विचार बलिया के श्रीराम कालोनी में विश्व भोजपुरी सम्मेलन के बलिया इकाई का तरफ सेपूरा पढ़ीं…

मशहूर भोजपुरी साहित्यकार गिरिजाशंकर राय गिरिजेश के निधन शनिचर का दिने बनारस में हो गइल जहाँ उनुकर इलाज चलत रहुवे. छिहत्तर साल के गिरिजेश राय लमहर समय से बेमार रहलन आ इलाज खातिर उनुका के गोरखपुर से बनारस भेजल गइल रहुवे. निधन का बाद उनकर अंतिम संस्कार बनारसे का हरिश्चन्द्रपूरा पढ़ीं…