– डॉ॰ उमेशजी ओझा नीलम के गोड़ धरती प ना पड़त रहे. खुशी के मारे एने से ओने उछलत कुदत चलत रही. एह घरी के सभ लइकी आ लइका के बड़ी इन्तजार रहेला. नीलमो आखिर उछल कुद काहे ना करस. उनकर बिआह जे ठीक भइल रहे. नीलम के मन मेंपूरा पढ़ीं…

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– डॉ॰ उमेशजी ओझा सरोज एगो कम्पनी मे काम करत रहले. अपना पत्नी आ दूगो बेटा, सबीर आ शेखर, का साथे आपन चारिगो आदमी के छोट परिवार में मस्त आ हँसी खुशी से रहत रहले. बाकिर दूनो बेटा आवारा किस्म के रहले. ओह में से उनकर बड़ बेटा बेसी चालाकपूरा पढ़ीं…

– डॉ॰ उमेशजी ओझा प्रशांत एगो ट्रेवल्स एजेन्सी के मालिक रहले. शहर में आवे वाला यात्रियन के शहर के देखे वाला जगहन प घुमावे खातिर अपना एजेन्सी से छोट गाडी उपलब्ध करावल उनकर काम रहे. प्रशांत के व्यपार बहुते चल निकलल रहे. भीआईपी लोगन मे़ उनकर बढिया जान पहचान बनपूरा पढ़ीं…

– संतोष कुमार ‘इहाँ हमरा से बड़का हीरो कवनो बा का ? हम अभिए चाहीं त निमन निमन जाने के ठीक कर दीं’ – किसुन दारु पी के अपना घर के दुअरा पर पैतरा कइले रहलन. आपन मेहरारू के हांक लगावत कहलें – ‘का रे ? संजइया के माई !पूरा पढ़ीं…

– डा॰ गोरख प्रसाद मस्ताना लोर से भरल आँख अउरी मुँह पर पसरल उदासी साफ साफ झलका देला कि कवनो परानी दुख में केतना गोताइल बा. बेयाकुल चिरई के बोली में चहचहाहट ना होला, बस बुझवइया के समझला के फेर हऽ. एही लेखा-जोखा में नीतू के उदासी के पढ़े लापूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय हमरा गाँव के बरम बाबा खाली पीपर के पेड़े ना रहले, आस्था के ठाँव रहले, श्रद्धा के भाव रहले. सामाजिक, पारिवारिक आ ग्रामीण जीवन-शैली के मिलन के छाँव रहले. समूचे टोला के पहचान रहले. मौसम कइसनको होखे, ऊ त एगो तपसी जस अपना तप से सबकेपूरा पढ़ीं…

– ‍नीमन सिंह बात १९८० के बरसात के समय के ह. हमरा खेत में धान रोपे खातिर बेड़ार में बिया उखाड़े लागल मजदूर बिया उखाड़त रहले सन. बगल में भिंडा रहे पोखरा के एक तरफ, दोसरा तरफ मुरघटिया रहे. मजदूरन में एगो मजदूर ६ फीट लमहर बाकिर सिकिया पहलवान रहे.पूरा पढ़ीं…

– संतोष कुमार माई रे, इ नान्ह जात का होला? सुरुज आपना माई से पुछलें. जाड़ा के रात खानी खाना खाये के बेरा सूरज चूल्हे भीरी बइठ के पलथी मार के आ मुड़ी गाड़ के रोटी आ भंटा के चोखा खात रहले. उनका बाल मन के इ हिरिस रहे जानेपूरा पढ़ीं…

– ‍ नीमन सिंह जब से हम होस सम्हरनी हमरा मन में इ उमंग उठल करे कि हम एह गाँवही में रहब आ एकरा बिकास खातिर कुछ करब. समय बीतत गइल आ हमरा दिल में इ उमंग दिन पर दिन जोर भइल जात रहे. बहुत समय त इ सोचही मेंपूरा पढ़ीं…

– ओमप्रकाश अमृतांशु कला-साहित्य कवनो भाषा में होखे ओकर महत्व सबसे उपर होखेला. साहित्य समाज के रास्ता देखावेला, अपना साथे लेके चलेला आ अपना संस्कृति के पहिचान करावेला. साहित्य के बाग-फुलवारी जेतने हरियर, कंचन-कचनार रही समाज ओतने पलत-बढ़त, फरत-फुलात आ टह-टह-टहकार रही. साहित्य कवनो जाति-समप्रदाय, गरीब-अमीर के थाती ना हउए.पूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय जमाना बदलऽता, एकर लछन शहर से दूर गाँवो-देहात में लउकऽता. अब ठेंपों छाप लोग के बात-व्यवहार में जमाना के नवका रूप झलकेला. सुन्नर बाबा ढेर पढ़ले ना रहले, बाकीर ऊ करीकी अक्षर के भँइस ना समुझस. पतरा-पोथी के अक्षर-खेल बुझाऽ जाव. सतनारायन भगवान के कथा ईयादपूरा पढ़ीं…