(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) बीसवाँ कड़ी में भोजपुरी के दुर्दशा पर लोक कवि के दुख पढ़ले रहीं अब पढ़ीं एह उपन्यास के आखिरी कड़ी ….. अबहीं ठीक से भोर भइलो ना रहल कि लोककवि के फोन के घंटी बाजल. फोन उहे उठवलें. बाकिरपूरा पढ़ीं…

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एक दिन एगो फूल बेचे वाला आपन हजामत बनवावे सैलून गइल. हजामत का बाद पूछलसि, कतना पइसा ? हजाम जवाब दिहलसि, एको पइसा ना. एह हफ्ता हम समाजसेवा करत बानी. फूल वाला बहुत खुश भइल आ चल गइल. अगिला दिने जब हजाम आपन सैलून खोले चहुँपल त देखलस कि एगोपूरा पढ़ीं…

भोला बाबू ओह दिन एगो बारात में शामिल रहलन. महफिल जमल त केहू नाचे वाली के इशारा कर दिहल आ ऊ नाचे वाली आके भोला बाबू के सामने बइठ गइल आ आपन गाना चालू रखलसि. गाना के बोल रहे, “कह देब हो राजा रात वाली बतिया”. भोला बाबू सकपका गइलें.पूरा पढ़ीं…

भोला बाबू खीसे फनफनाइल रहलें. पुछनी कि का बात हऽ त बिफर पड़लें. कहे लगले, नीतीश त हदे कर दिहलें. अइसनो कइल जाला ? लोकतंत्र के कमजोर कर के राख दिहलें, राहुल गाँधी के बेइज्जत कर दिहलें, आ लालू से पता ना कवना जनम के दुश्मनी निकाल लिहलें. कुछ देरपूरा पढ़ीं…