– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल दहेज के बाइ-बाइ बिहार के एगो समाचार काफी चर्चित भइल. अब बिहार में सरकारी नौकरी खातिर चुनल गइल जुवकन के दहेज लिहला पर नौकरी से तुरंत बर्खास क दिहल जाई. एकरा के नु कहल जाला सरकार ! एह कठोर कार्यवाही के खबर पढ़िके बड़ा संतोषपूरा पढ़ीं…

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– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल बाबूजी के याद कइल अंधविश्वास हटे ? ओइसे त हर साल पितृपक्ष पर अपना तथाकथित विद्वान मित्र लोगन के टिप्पणी कहीं ना कहीं पढ़त रहींले बाकिर एह साल त मन एकदमे भन्ना गइल. लोग नवका पीढ़ी के का सिखा रहल बाड़े ? बाबूजी के यादपूरा पढ़ीं…

डायरी   – डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल   आज का पीढ़ी में भोजपुरी खातिर अनुराग देखिके बहुत नीक लागता। बाकिर, सोशल साइट पर गइला पर तब मन बहुत दुखी होला, जब लागेला कि भोजपुरी के लेके कुछ अइसन गिरोह बन गइल बाड़े सन, जेकरा भाषा में शिष्टता दूर-दूर तक नापूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल बड़की बलिहार आ नदिया के पार आजुए रामेंद्र के फोन आइल रहल हा कि बड़की बलिहार गइल रहलीं हा. नाँव सुनते ‘नदिया के पार’ फिल्म के याद आ गइल. एह सुपरहिट फिल्म के कहानी ओही गाँव के हटे. लोग कहेला कि एकदम साँच. केशव प्रसादपूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल बोले खातिर बोलल जब से नोकरी के शुरुआत भइल तबे से देखत आ रहल बानी. आजु तक एहमें कवनो कमी नइखे आइल, बढ़ंतिए भइल बा. जरूरत खातिर बोलेवाला कम मिलले. लोग बूझसु कि हमहूँ बोलींले, अइसने लोग ढेर लउकले. जब-जब जाएके परेला सेवाकालीन प्रशिक्षण शिविरपूरा पढ़ीं…

डायरी – डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल बुदबुदाई अब समय मौसम के सुगबुगाहट के पता साफ-साफ चल जाता. काल्हु तक के टेढ़ आ लरुआइल पतइयो आजु हवा का सङे घुमरी-परउआ खेले लागल बाड़ी सन. टीबी से लेके सोशल साइट तक एकही विषय छवले बा- स्त्री विमर्श. बदलाव के धमस साफ-साफ सुनापूरा पढ़ीं…

डायरी सरगो से नीमन बाटे सइँया के गाँव रे – डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल बसंत का आइल, गाँव के इयादि एक-एक क के ऊठत-बइठत आ सूतत खा तंग करे लागलि. होलरि, खातिर रहरेठा, झीली निकाले खातिर सरसो के अबटन आ मधि रतिए होलरि-होलरि के आवाज चारों ओरि से. ओही मेंपूरा पढ़ीं…

डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी प्राचार्य डॉ. संजय सिंह ‘सेंगर’ आजु स्टाफ रूम में इंस्पेक्शन के बात एक-एक क के उघरत रहे. हमरा प्राचार्य डॉ. संजय सिंह ‘सेंगर’ जी याद आ गइल रहीं आ हम भावुक हो गइल रहीं. 5 जनवरी के उहाँ से खड़े-खड़े भइल आधा घंटा केपूरा पढ़ीं…

          डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी बगसर बिसरत नइखे ए पारी के जाड़ा के छुट्टी के बहुत उत्साह रहे. बहुत दिन बाद, लगभग 30-31बरिस बाद 24 दिसंबर के भारवि जी (अरुणमोहन भारवि) से मुलाकात भइल. घंटों बतियावल आदिमी. बात ना ओराइ आ टाइम जल्दी-जल्दी बीतलपूरा पढ़ीं…

डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी रसियाव खाईं आ टन-टन काम करत रहीं आजु स्टाफ रूम में अपना गीत के एगो लाइन गुनगुनात रहीं- “ननदी का बोलिया में बने रसियाव रे. सरगो से नीमन बाटे सइँया के गाँव रे.“ साहा सर के जिग्यासा पर चर्चा शुरू हो गइल कि “रसियावपूरा पढ़ीं…

डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी   चले दीं, प्रयोग बहे दीं धार काल्हु “ये दिल माँगे मोर” पर बहस होत रहे. हम कहलीं कि भाई ‘मोर’ का जगहा ‘और’ कहलो पर त कुछ बिगड़ी ना. फेर काहें एकर ओकालत करतारे लोग. हर भाषा में लिखे-पढ़ेवाला लोग विदेशी शब्दन कापूरा पढ़ीं…