– पाण्डेय हरिराम

अन्ना हजारे के अनशन से देश में उम्मीद जाग गइल बा आ लोग सवाल पूछे लागल बा कि साँचहू अइसन कवनो विधेयक बन जाई, ना बनल त का होई, का एहिजो अन्ना के आन्दोलन से क्रांति के आग भड़का दिहलसि त का एहीजो मिस्र, अरब भा लीबिया का तरह के आंदोलन होई ? माहौल पूरा बनल. कुछ दिल्ली के जंतर मंतर पर, कुछ एने ओने के शहरन में आ सबले बेसी टेलीविजन का परदन पर. अखबारो एह माहौल के बनावे के पूरा कोशिश कइले बाकिर जवन काम एह अभियान के शुभचिंतकन के करे के चाहत रहे से ठीक से होत ना लउकल. मुहिम के हल्ला त बहुते भइल बाकिर एकरा के बेसी मजबूत, बेसी कारगर, बेसी तर्कसंगत बनावे के कोशिश कम से कम सार्वजनिक मंचन पर त शायदे लउकल.

चूंकि अन्ना हजारे के कवनो निजी स्वार्थ ना रहल आ ऊ सार्वजनिक कल्याण का भाव ले के सभकर हित खातिर इ अनशन कइले रहलन, एहसे अतना त तय शुदा बा कि खुद अन्ना अइसनका कोशिश के समर्थने करतन. लेकिन इहे बात उनुका ओह उत्साही समर्थकन का बारे में ना कहल जा सके जे एह मुहिम के शोर मचावत मुए जिये के खोखला एलाने के सफलता के गारंटी मान लिहले रहुवन. इहो हो सकत रहे कि अइसनका कवनो कोशिश के ऊ लोग मुहिम का विरोध समुझित आ अइसनका करे वालन के विरोधी खेमे के बता दित. इहे कारण रहे कि उनुका समर्थन में कुछ हजार से बेसी लोग ना चहुँपल. देश के आबादी के नयका आंकड़ा हालही में आइल बा, एक अरब 21 करोड़ माने कि लगभग सवा अरब. एह सवा अरब लोगन में कुछ हजारो लोग जंतर मंतर भा इंडिया गेट पर इकट्ठा ना हो पावल. मिस्र का आबादी से तुलना करके देखीं, ओहिजा के कुल आबादी आठो करोड़ से कम बा. माने कि अपना आंध्रो प्रदेश से कम. बाकिर ओहिजा तहरीर चौक पर एकबारगी लाखों-लाखों लोग इकट्ठा हो जात रहे. ओह लोग के बिटोर करे में कवनो नेता के जरूरत ना पड़ल. ऊ लोग अपने से आइल काहे कि ओह लोग के लागल कि बदलाव ओह लोग के आपन जरुरत बा. भारत के जनता खातिर अन्ना के आमरण अनशन पर बइठे के पड़ल तबो इकट्ठा भइल कुछ हजार लोग. दिल्लीए में एक करोड़ से बेसी लोग रहेला आ जवन बिटोर भइल तवन बहुत ज्यादा ना रहल. त का अबहियों लोग भ्रष्टाचार के आपन मुद्दा नइखे मानत ? एकर एगो पुख्ता कारणो बा. ई कारण हमनी के समाज के बा. हमनी के धार्मिक आ सामाजिक व्यवस्था में कबो एह तरह के कवनो आचार संहिता रहबे ना कइल जहवाँ भ्रष्टाचार के गलत बतावल गइल होखे. जबले इंसान अपने विवेक से ई फैसला नइखे लेत कि का सही बा आ का गलत तबले ई रुकियो ना सके. हमनी के रोजमर्रा का जिंदगी में छोट-छोट जरूरतन खातिर कइल गइल भ्रष्टाचार हमनी के आदत बन गइल बा. जबले हमनी का एकरा के आदत के रूप में ना देख के भ्रष्टाचार का रूप में ना देखब तबले एहसे बाहरो ना निकल सकीं.

जबकि देश में अधिकतर लोग एह बाति से सहमत बा कि देश में भ्रष्टाचार बर्दाश्त का बहरी जा चुकल बा, सब कहत बा कि नौकरशाहन से लेके राजनेता तक आ इहाँ तक कि न्यायाधीशो भ्रष्टाचार में लपटाइल बाड़े. सभे हामी भरत बा कि एह राजनेतवन के देश के चिंता नइखे.

भ्रष्टाचार के आंकड़ा में अब अतना सुन्ना लागे लागल बा जतना के सपनो एह देश के आम आदमी के ना आवे. आ ओही देश में जनता इंतजार करत बिया कि एकरा से निबटे के काम दोसर केहू करी. अन्ना एगो लहर जरूर उठा दिहले बाड़न. भारत के बड़का वर्ग त वइसहू घर से बाहर ना निकले. अधिकतर ऊ वोटो ना देव. गरीब तबका अतना गरीब बा कि ऊ अपना रोजी- रोटी के जुगाड़ एको दिन खातिर ना छोड़ सके. बचल मँझिला वर्ग. भारत के सबले बड़का वर्ग. आ ई धीरे-धीरे अतना तटस्थ हो गइल बा कि डर लागे लागल बा. अलग बाति बा कि सरकार अपने मजबूरी का चलते लोकपाल विधेयक तइयार करे का बारे में अन्ना हजारे के मांग मान लिहलसि.

अब जब अन्ना हजारे के अनशन खत्म हो गइल बा पता ना एह सवा अरब बेचारन के का होई. काहे कि डर बा कि ई अभियान अपना भीतरी कमजोरियन का चलते नाकामयाब मत हो जाव. एह आंदोलन के सबले बड़का ताकत अगर अन्ना के निष्पक्ष आ ईमानदार छवि बावे त एकर सबले बड़का कमजोरी एकर अराजनीतिक चरित्र बा. ध्यान दीं कि राजनीति के मतलब कवनो खास दल से जुड़ावे ना होला. अगर ई आंदोलन मौजूदा सगरी राजनीतिक दलन के खारिज करत बा आ अपना के ओह दलन से अलगा राखत बा त ई बहुते बढ़िया बात होई. लेकिन, अगर ई राजनीतिए के अपना अपना एजेंडे से बाहर राखत बा त एकर मतलब इहे बा कि ई जाने-अनजाने खुद के आ जनतो के भुलावे में रखले बा. इहे एह आंदोलन के सबले कमजोर पक्ष बा आ एही वजह से एकर असफल हो गइल लगभग तय बा.



पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी.

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