– पाण्डेय हरिराम

देश के हर आदमी जवना सिस्टम में जी रहल बा ओहिजा के मूलमंत्र ह . “ई सब चलेला एहिजा”. ओह हालत में नियम-कायदा ताक पर राख दिआला. जेकरा मौका मिल जाव उहे नियम तूडल आपन अधिकार मानेला – कतहीं कम, कतहीं ज्यादा. जब ई अधिकार बिकाये लागे त नतीजा उहे होला जवन आजु देखे के मिल रहल बा. अइसन लागता कि सरकार से लेके पत्रकारिता तकले सब कुछ बिकाऊ बा.

कर्नाटक के मुद्दा पर कांग्रेसो कुछ तर्क दे रहल बिया. ओह तमाम संदेहन के जांच होखे के चाहीं बाकिर येदियुरप्पा के थैलीशाहन आ बिकाइल खबरन के शिकारो ना बने दिहल जाये के चाहीं.

आजु के भारत अफ्रीका के कवनो अइसन नवजात आ बदजात समाज के दर्शन करावता जहवाँ कवनो क्षेत्र में ईमानदारी बचले ना होखे. हाल ही के कुछ ताजा उदाहरण देखलीं – साठ से सत्तर हजार करोड़ रुपये के घोटाले का दायरा राखे वाला कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, जवना में प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियन से लेके दिल्ली सरकार तक पर शक की सुई घूमत बा. 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाला सी.ए.जी की रपट का मुताबिक एक लाख इकहत्तर हजार करोड़ रुपये के दायरे में बा. मुम्बई के आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला त कारगिल के शहीदन के स्मृति तक अपमानित कर दिहलसि.

एह घोटालन के जाँच खातिर जब समूचा विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति से जांच करावे के माँग करत बा त सरकार ओहिजा से ध्यान हटावे के कोशिश करत बिया. मानल जा सकेला कि कवनो तरह के मांग खातिर संसद के कार्यवाही रोकल संसदीय परंपरा आ संसदीय कामकाज के दायित्व के उल्लंघन होला बाकिर जब देश राजनेतवन पर भयंकर अविश्वास के अभूतपूर्व दौर से गुजरत होखो त जाँच के उचित प्रक्रिया लागू करावे खातिर सरकार पर दबाव डाले के कवनो दोसर तरीका बांचबो ना करे. सरकारी पक्ष त भ्रष्टाचार के मामिला पर विपक्षी नेता लोग के बोले तक के समय ना देव.

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी संसदीय लेखा समिति से जांच करावे के प्रस्ताव रखलें बाकिर विपक्ष एकरा के एह कारण माने के तइयार ना भइल काहे कि एह समिति के अधिकार क्षेत्र अउर दायरा बहुते सीमित बा.

हमनी का अपना लोकतंत्र के शान के गौरव- गान करीलें जवन सहियो बा. बाकिर ई कइसन लोकतंत्र ह जवन एक ओर त 9 से 10 प्रतिशत विकास दर के ऊंचाई छूवेला आ दोसरा ओरि 40 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे 20 रुपये प्रतिदिन से कम पर गुजारा करेला. एक ओर चुनाव सुधार आ राजनीतिक शुचिता पर सेमिनार होखेला त दोसरा ओरि जनता के धन लूटके स्विस बैंकन में सत्तर लाख करोड़ करिया कमाई के करिया धन जमा करे वाला भारत के नेता आ उद्योगपति होलें. जवन संसद ओह लोगन के बचावे जे देश का माटी से दगाबाजी करत संविधान आ जनता के मजाक उड़ावेलें ओह संसद के निरर्थक आ नाकामयाबे कहल जाई.

बाकिर अब एह बातन पर देश के रियेक्शन वइसन नइखे रहि गइल जवन पहिले कबो रहत रहे. कहे के होखी कि वक्त का साथ हमनी का “सयान” हो गइल बानी जा आ अब घपला-घोटाला हमनी के ओतना परेशान ना करे जतना दसेक साल पहिले करत रहुवे. ई सयानापन, ई अनदेखी बहुते कुछ कहऽता. एक त ई कि कवनो सोसायटी एक-जइसन कहानी रोज रोज सुनत ऊबिया जाले. दोसर ई कि नयका उभरत शहरी मिडिल क्लास के सियासी ड्रामा अब ओतना ना भावे. ऊ अपना करियर, इनवेस्टमेंट, आ एंटरटेनमेंट के बदहवासी में भुलाइल बा. तिसरका ई कि करप्शन अब बड़ बात एह चलते ना रहल कि हमनी का एकरा के लाइफस्टाइल मान लिहले बानी जा.

रउरा कहब, एहमें नया का बा ? ई बात त अरसा से कहल जा रहल बा. एहमें नया बा मंजूरी के ऊ सीमा, जवन पहिले कबहियो ना रहल. आजु के फिलिम रउरा देखते होखब. एहमें चरित्र कवनो मुद्दा रहिये नइखे गइल. जबकि अबही हाल तकले कॉमेडीओ में चोर के सुधरल पड़त रहे, बेईमान सही राह पर आ जात रहे, आ गलत तरीका से मिलल दौलत क्लाइमेक्स में खुद-ब-खुदे छिना जात रहे. करप्शन के कवनो सोसायटी में एह तरह के मंजूरी मिल जाव, जइसन हमनी किहाँ मिल गइल बा, त का होला ? अउरी बेसी करप्शन, बेहिसाब करप्शन, जवना के रोकल मुमकिन ना रहि जाव!


p>पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी. अँजोरिया के नीति हमेशा से रहल बा कि दोसरा भाषा में लिखल सामग्री के भोजपुरी अनुवाद समय समय पर पाठकन के परोसल जाव आ ओहि नीति का तहत इहो लेख दिहल जा रहल बा.अनुवाद के अशुद्धि खातिर अँजोरिये जिम्मेवार होखी.

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