महाभारत के कहानी में एगो भीष्म पितामह रहले जिनका चरित्र में दोसर दोष ना रहे सिवाय एह बात के कि ऊ सत्ता पक्ष का साथे रहले आ अपना आँखि का सोझा सबकुछ गलत होत देखत रहले. ना त ऊ ओह चरित्रहीन सत्ताधारियन के साथ छोड़ले ना कबो साँच के साथ दिहले. उनुका आँखि का सोझा द्रोपदी के चीर हरण होत रहल आ ऊ टुकुर टुकुर देखत रहले.

वइसनके एगो भीष्म पितामह फेर एह “महा” भारत का छाती पर सवार बा. सब कुछ ओकरा आँखि का सोझा, ओकरा मौन सहमति से होत रहल, देश रुपी द्रौपदी के चीर हरण होत रहल बाकिर ऊ कुछ ना कहलसि. अबहियो आपन दोष नकारत बा ऊ. ओकरो भीष्म पितामह का तरह इच्छा मृत्यु के वरदान सत्ता पक्ष का बहुमत आ महारानी के चालाकी का रुप में मिलल बा. ऊ गद्दी छोड़े के तइयार नइखे. कहले बा कि कुर्सी ना छोड़ब. जब ले मौका मिली तब ले एह पर बइठल रहब. जबले महारानी भा देश के जनता ओकरा के गरदन पकड़ि के उतार ना फेंकी. एक से बढ़ के एक घोटाला ओकरा शासन में हो रहल बा, कुछ सामने आ चुकल बा कुछ बाद में आई बाकिर ऊ कवनो गोह का तरह कुर्सी के कस के पकड़ले बा.

अब ई हमनी पर बा कि हमनी का का फैसला लेत बानी जा. एह कहला में कवनो दम नइखे कि दोसरो तरफ केहू दूध के धोवल नइखे. केहू नइखे त खोजे के पड़ी बाकिर एह मुँहदुब्बर, अपने कहना मुताबिक लाचार आ मजबूर, एगो दागी के दोसरा के दाग के जाँच करावे वाला कुर्सी पर बइठावे वाला, महारानी के कठपुतली भीष्म पितामह जबले अपना कुर्सी पर बइठल रही ओतना दिन ले देशो मजबूर आ लाचार बनल रही. कबले मजबूर रहल जाई हमनी का ?

न्याय का चोगा पहन कर है खड़ी चंगेजशाही,
तुम नहीं अब भी उठे तो फिर जमाना क्या कहेगा ?

अब रउरा पूछत होखब कि हम ओह भीष्म पितामह के नाम काहे नइखी लेत ? एहसे कि जे ओह लायक बा ओकरा पता बा कि हम केकरा बारे में कहत बानी. आ जे नइखे जानत ओकरा के बतवलो से कवनो फायदा नइखे.

अरधो कहे त सर्वो बूझे, सर्वो कहे त बरधो बूझे !

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