– पाण्डेय हरिराम

पिछला महीना भर से देश के सियासी माहौल खदक रहल बा. कबो हजारे के अनशन के पाछा हजारों नारा त कबो बाबा रामदेव के आंदोलन रोके खातिर आवभगत से लेकर बल प्रयोग तकले. संगही संगे गांधी जी का समाधि पर ठुमका आ जिला जिला में नारेबाजी. सभकर निशाना पर संप्रग सरकार, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अउर संप्रग के अध्यक्षा सोनिया गांधी बाड़ी. आ एह काम में सबले आगा बिया भारतीय जनता पार्टी. लेफ्टो वाला कहीं कहीं जोर लगावत नजर आवत बाड़े. वइसे ई सही बा कि घोटालन का चलते केंद्र सरकार के विश्वसनीयता पर ढेरे चोट लागल बा. विपक्ष जनता के ई बतावे में लागल बा कि मौजूदा सरकार एकदमे नाकारा बिया. एकरा के बदल देबे के चाहीं. ऊ सरकार में अतना खोट गिनावत बा कि यदि वश चले तो जनता अबहिये ओकरा के बदल देव. बाकिर विपक्ष के शोरशराबा में लोग ई पूछल भुला जात बा. भा एकरा के अइसे कहीं कि तेजी से उफनात आरोपन का बाढ़ में जनता के ई पूछे के मौके नइखे मिलत कि “विपक्ष के हाल का बा ? अगर ई लोग सत्ता में आ जाव त प्रधानमंत्री के होखी ?”

सबले बड़ विपक्षी दल होखला का नाते ई भाजपा के जिम्मेदारी बनत बा कि ऊ यूपीए सरकार के स्वाभाविक विकल्प परोसे. लेकिन भाजपा अबहियो अपना ला नयका पीढ़ी के नेता खोजे में अझूराइल बिया. शायद इहे कारण बा कि लालकृष्ण आडवाणी अबहियो भाजपा संसदीय दल के अध्यक्ष बनल बाड़े, जबकि साल 2009 का लोकसभा चुनाव में मिलल हार का बाद ऊ सक्रिय राजनीति से संन्यास लेबे के इशारा कइले रहले. एह नवंबर में आडवाणी 84 बरीस के हो जइहें आ आम चुनाव अबहियो तीन साल दूर बा ! केरल चुनाव में वीएस अच्युतानंद के उल्लेखनीय प्रदर्शन भलही बूढ़वा नेता लोग के आस जगा दिहले होखे, लेकिन अइसनका कामयाबी लोकसभा चुनावो में दोहरावल जा सकले ई तय नइखे. राजनीतिक वापसी खातिर आडवाणी के संजीदा प्रयासन का बावजूद अयोध्या मामिला के परछाईं उनुकर सर्वमान्यता के हमेशा चुनौती देत रही. लेकिन अगर आडवाणी ना त दोसर के ? कैडर आधारित संगठन का रूप में आरएसएस संगठित नेतृत्व के धारणा पर जोर देत रह गइल आ अपना के राजनीतिक वंशवाद आ मतवाद के परिपाटी से दूर बनवले रखलसि.

लेकिन समय का साथ संघो के बाजपेयी के लार्जर दैन लाइफ छवि सकारे खातिर मजबूर होखे के पड़ल. अब जब आडवाणी-बाजपेयी युग समाप्त हो चुकल बा त संघो अपना एह पुरान आस्था का ओर लवटि गइल बा कि संगठन व्यक्ति से ऊपर होखेला. अब नितिन गडकरी जइसन ‘लो प्रोफाइल’ आदमी के भाजपा अध्यक्ष बनावल संघ नेतृत्व का तरफ से भाजपा के ई संकेत रहे कि ओकर कवनो नयका नेता अपना बरोबरी वालन में पहिला नइखे बन पवले. सनेशा साफ रहे, नेता का रूप में केहू का नाम पर तबहिये विचार कइल जाई जब ऊ अहंकार आ गुटबाजी से ऊपर उठ जाई.

भाजपा खातिर दुखदायी ई रहल कि अतीत के दुश्मनी के घाव अबहियो नइखे भरल. सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे आ उमा भारती करिश्माई ‘वोट कैचर’ नेता हई, लेकिन संघ के पुरुष प्रधान परिवेश में ओहलोग के सकरना पर संदेह बा. हाल के उदाहरणो इहे बतावत बा कि भगवा भ्रातृत्व का दायरे में कवनो महिला नेता के कवना तरह के प्रतिरोधन के सामना करे के पड़ सकेला. अरुण जेटली भाजपा के शहरी, सुसंस्कृत नेता का रूप में हउवें लेकिन जे लोग आमतौर पर टीवी के एसएमएस पोल में वोट देला ऊ चुनाव में वोट डाले ना जाव. अब बचले नरेंद्र मोदी. बेशक ऊ पहिला पाँत के नेता हउवें बाकिर आजुकाल्हु कवनो पाटीं के अकेले शासन के समय नइखे रहल आ गठबंधन का सरकार में ऊ कतना फिट बइठीहें ई बतावे के जरूरत नइखे. त साल 2014 के आम चुनाव में विपक्ष का ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रही ? साफ बा कि विपक्ष के अइसन नेता चाही जेकर आपन जनाधार होखे, जे रणनीति बनावे में मास्टर होखे, जेकर छवि साफ होखे, आ सबले खास बाति ई कि ओकरा के एगो गठबंधन निर्माता का रूप में देखल जात होखे. का भाजपा का लगे कवनो अइसन नेता बा ? आंदोलनन के हवा देबे वाला विपक्ष से ई पूछल जरूरी बा.



पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखल करेनी.

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