(रामझरोखा से)

– डा॰अशोक द्विवेदी


अइसे त देस जगले रहेला बकि जगलो में सूलत लेखा लागेला. एक से एक बड़, भयानक आ अमानवी दुर्घटना-घटना घटत रहेला आ ओकरा दिल-दिमाग प चिचिरी ना खींचि पावेला. अइसना में देस के सूतल, निनियाइल आ महँटियावत “सिस्टम” बस खाना पूर्ति करत रहेला. एह तरह से देस जागल रहेला.

कुछ दिन पहिले देस के राजधानी में एगो चलती बस में एगो लइकी का साथ सामूहिक बलात्कार आ दरिंदगी के खेल घंटन होत रहे आ ई समाज, राज आ ओकर सिस्टम अइसने खाना-पूर्ति करत रहे. असुरक्षा आ पुलिसया रंग-ढंग से आजिज लोग सड़क पर आ गइल. आ का गइल बढ़िआइ गइल. सूतल नेता जाग गइलन सऽ, हजारन हजार लोगन के, अपना घर का छरदेवाल ले चहुँपत देखि के सरकारो जाग गइल. अंगरेजी राज वाला पुलिसिया दमन से बात बनहीं के ना रहे, से ना बनल. आखिरकार आवे वाला खतरा भाँपि के प्रधानमंत्री आ उनकर मंत्रीमंडलो के जागे के परल. एही बीच एगो झपकी आ गइल त रेल किराया बढ़ि गइल.

एघरि पड़ोसियन से मेल मोहब्बत बढ़ावे के चलन बा. हमरो देस एह मामिला में आगा बा. बिना एह सच्चाई के जनले-बुझले कि खतरनाक आ लथेर पड़ोसी कबो बाज ना आई. ओहू में अइसन पड़ोसी जवना के “नीयते” खराब बा. दूध के जरल, माठा के फूंकि के पियेला बाकिर हमहन के देस पड़ोसी के सइ-सइ घात के भुला गइल. सरकार वीजा देबे लागल. अपना घर-अँगना ओके बोला के क्रिकेट आ हॉकी खेले लागल. अउर ना त अउर नाचहूँ-गावे लागल. केहू के बरिजला-धिरवला के असर ना त सरकार पर पड़ल, ना ओह चैनलन पर पड़ल, जवन कलाकार-संगीतकार का नाँव परं मजमा लगा के माल काटत रहलन स.

पाकिस्तान जइसन मुलुक आतंकवादियन के पनाहगार मानल जाला. ऊ भारत जइसन अनुपम-विचित्र धरम-संस्कृतियन के ढुलमुल लोकतंत्र वाला देस के बाँटही-बिलवावे में आपन पूरा जोर लगावे के मीका ताड़त रहेला. ऊ करगिल लेखा, फेर एहू बेर घुसपैठ करावे लागल. सीमा पर “सीज फायर” तूरि के फेर एहू बेर घात लगा के दू गो जवानन के मुआ दिहलस. जुनून, बर्बरता में मुवल शरीर के दुर्दसा कइलस. मूड़ियो काटि के ले गइल. लड़ाई-झगड़ा आम बात बा, बाकि अइसन छल, अइसन हैवानियत?

तमाम राजनीतिक बयानबाजी से लागल कि सरकार जागल बिया, लोग जागल बा, मीडिया जागल बा, न्यायालय जागल बा. बाकिर एगो सवाल ई उठल कि देस के संवेदना जागल कि ना? बयान दे के पल्ला झारल, कर्तव्य के इतिश्री समझ लिहल होई. देस के आधी आबादी औरतन के बा आ लइकिन-मेहरारूवन पर अत्याचार-बलात्कार बदस्तूर जारी बा. अइसहीं देस के सीमा पर जान लड़ावे वाला — आ आतंकवाद आ नक्सलवारदात में मारल जाएवाला — जवानन का दिसाईं संवेदना, सम्मान आ अभिमान के मुद्दा बा. जवान के मौत भइला का बाद, बिना मूड़ी के ओकर शव जब गाँव पहुँचल त ओकर घर त घर, पूरा गाँव-जवार हिलि गइल. सेना के जवान ओकर किरिया-कर्म में हाजिर हो के, सम्मान आ ढाढस दे के चल गइलन. ओघरी ओकरा परिवार के ढाढस, भरोसा आ सम्मान देबे ला प्रदेस भा देस के कवनो बड़हन मंत्री, नेता भा सरकारी नुमाइंदा ना पहुँचल त शहीद हेमराज के मेहरारू, महतारी़ आ गाँव अनशन पर बइठि गइल. दू दिन बाद एगो मंत्री के बयान आइल कि ऊ त देस खातिर मुवल बा, त एम्में भूख हड़ताल कइला के कवन जरूरत? शहीद परिवार अउर दुखी आ अपमानित महसूस कइलस.

देर आयद, दुरुस्त आयद! आखिरकार जनदबाव में नेतो जगलन स, सरकारो जग्गल. यूपी के मुख्यमंत्री जी अइलन, विपक्षी नेतो अइलन त पाछा ले केन्द्रो सरकार के मंत्री अइलन, चेक वगैरह दिहल लोग. अब सेना परमुख जनरल विक्रमो सिंह आवे वाला बाड़न. माने देस जागि गइल.

हमरा बस अतने समुझ में आइल कि ई जागल देस तब्बे बनी जब एके जगावल जाई. जगावत रहे के काम राउर बा, हमार बा, लिखे-पढ़े वाला लोगन के बा. सभ मिलि के जागत आ जगावत रहो! त जगला आ जगवला के महातम बढ़ि जाई.


डा॰ अशोक द्विवेदी भोजपुरी के, आ हिन्दिओ के, जानल मानल साहित्यकार हईं. इहाँ के लिखल अनेके किताब प्रकाशित भइल बाड़ी सँ. इहाँ के संपादन में प्रकाशित होखे वाली पत्रिका “पाती” के भोजपुरी दिसा बोध के पत्रिका कहल जाला आ ओहमें प्रकाशित होखल हर साहित्यकार के सपना होला. अँजोरिया अपना के सौभाग्यशाली मानेले कि ओकरा अइसन साहित्यकार के आशिर्वाद हमेशा से मिलत आइल बा आ आगहू मिलत रहे के पूरा भरोसा बा.

डा॰ अशोक द्विवेदी से संपर्क ला 08004375093 पर फोन कर सकीलें.

भोजपुरी में सामयिक निंबध, ब्लॉग वगैरह के कमी दूर करे ला अँजोरिया के लगातार निहोरा पर उहाँके नियमित रूप से एह स्तंभ “रामझरोखा” ला लिखे के वादा कइले बानी. मकसद बस एके बा कि भोजपुरी में हर तरह के रचना आवे के चाहीं.

भोजपुरी भाषी हर साहित्यकार से अँजोरिया के निहोरा बा कि भोजपुरी में गीत-कविता-कहानी-उपन्यासे मत लिखीं कूछ सामयिक लेखो लिखत रहीं. हो सके त आपन आपन ब्लॉग भोजपुरी में लिखल शुरू कर दीं. कूछ ना त अँजोरिया पर प्रकाशित रचने सभ पर आपन टिप्पणी करत रहीं.

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3 Comments

  1. सामयिकी प्रभावपूर्ण बा ॥ एह देश के नेता लोग अपना माटी से एतना कट गइल बा की उनका जनता के हाहाकार सुने के समय नईखे, देश के बेटी के लूट रहल इज़्ज़त उनका खातिर कवानों मतलब नईखे रखत॥ उनके के जगावे के परी, जागला के नेतृत्व देबे खातिर लामबंद होखे के परी ॥ द्वेदी जी के साधुवाद

  2. संपादक महोदयजी, अब हम स्पैम में आपन टिप्पनी गइले के काट निकाल ले ले बानी…अपनी टिप्पनी के हम कापी क ले तानी अउर अगर स्पैम में चलि जाता त तुरते ओके पेस्ट क के पोस्ट क देतानी…..इ हे आइडिया ठीक बा…स्पाम में जइहें त बार-बार..पोस्ट करबि….जय हिंद।।

  3. समसामयिक बढ़िया आलेख खातिर सादर आभार।

    हमरी खेयाल से ना सरकार न मीडिया न जनता केहू जागल नइखे…हँ बस बात एतने बा की घटना-दुर्घटना कुछ समय खातिर ए लोगन के ओंघी में बाधा डालि देता..ना त सब केहू सुतले रही…केहू जागी ना……हमरी कहले के मतलब इ बा की देस हमेसा सुतले रही अउर समय-समय पर घटना-दुर्घटना घटट रहि बस ओही से कुछ समय खातिर ए देस की ओंघी में बाधा पड़ी।।…..सरकार, मीजिया, जनता आदि एइसन बा की ए लोगन की कान पर जूँ नइखे रेंगत…अगर भूला भटक के कवनो जूँ रेंगता त इ लोग अनुअइले में ओ के मसलि दे ता लोग…देस के भला तबले ना हो सकी…जबलेक इ खुदे ना जागी…जय हिंद।।

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