जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र में भइल परिचर्चा आ काव्यपाठ

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“‘पाती’ पत्रिका भोजपुरी रचनाशीलता के आंदोलन के क्रांति-पताका हऽ. ‘पाती’ माने, नयकी पीढ़ी के नाँवे सांस्कृतिक चिट्ठी. एगो चुपचाप चले वाला सांस्कृतिक आंदोलन हवे ‘पाती’, जवना के अशोक द्विवेदी अपना संसाधन से चुपचाप चला रहल बाड़े.” ई उद्गार सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रो॰ केदारनाथ सिंह (प्रो॰ एमरिटस, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान) के रहे.

जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र में ‘पाती’ के यशस्वी संपादक, कवि अशोक द्विवेदी के हालहीं प्रकाशित कविता-संकलन “कुछ आग कुछ राग” के विमोचन आ परिचर्चा गोष्ठी के अध्यक्षता करत प्रो॰ केदारनाथ सिंह कहलें कि “भोजपुरी भाषा आ साहित्य खातिर ‘पाती’ के मूक आंदोलन इयाद कइल जाई. अशोक द्विवेदी के रचनात्मकता आ संपादन दूनों सराहनीय बा.”

KedarNathSinghअशोक द्विवेदी के पुस्तक विमोचन आ काव्य-पाठ का बाद प्रोफेसर केदारनाथ सिंह जी आगा कहले कि भोजपुरी लयात्मक (लिरिकल) भाषा हऽ एही से गीत का अनुकूल बिया. टैगोर के ‘गीतांजलि’ के बहुत अनुवाद भइल, भोजपुरी में ‘बँगला’ लेखा संगीतात्मकता बा एसे ओकर अनुवाद सराहल गइल. हिन्दी में तनी खड़खड़ाहट बा! खड़ी बोली से बनला का कारन, खड़खड़ाले.”

“अशोक द्विवेदी के ‘फूटल किरिन हजार’ हम पहिले देखले रहनी. “कुछ आग कुछ राग” में अगीत, गीत, सॅटायर, फ्री-वर्स, गजल हर तरह क कविता बा; एहसे ई एगो मुकम्मल संग्रह बा भोजपुरी कविता के. खाँटी भोजपुरी के रंग देखे के होखे त अशोक द्विवेदी के कविता पढ़े के चाहीं. बहुत अइसन शब्द जवन हमनी के भुलाइल जाता, अशोक जी ओह शब्दन के अर्थ देके, पुरान शब्दन के नया जीवन दे देले बाड़े. व्यंग्य इनका कविताई के धार देत बा.”

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संग्रह के दू गो कविता ‘गाँव के कहानी’ आ ‘साँप’ का चर्चा का बाद ‘गजल’ प चर्चा करत केदारनाथ जी आगा कहलें कि भाषा अपना प्रकृति का मोताबिक ‘विधा’ के बदल लेले. अरबी फारसी से चल के ‘गजल’, उर्दू में आ हिन्दी में जइसे बदलल, ओसहीं भोजपुरी प्रकृति में ओकर रंग आ ‘टोन’ बदलल. अशोक द्विवेदी ए विधा के भोजपुरी जबान में ढाल देले बाड़े. अइसन चुटीला शेर से भरल गजल भोजपुरी में कम लिखाइल बा. एह संग्रह में भोजपुरी भाषा के बनाव, बचाव आ सँवार सब एक साथ मौजूद बा.”

कार्यक्रम के शुरूआत डा राम चन्द्र के स्वागत भाषण आ विषय-प्रवर्त्तन से भइल. अशोक द्विवेदी क परिचय देत ऊ कहलन कि इहाँ के कविता गाँव प्रकृति, समय आ समाज से जुड़त अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घटित बदलाव के रेघरियावत बिया.

delhi1सी. आर. सी. ए. एस. के अध्यक्ष प्रो॰ संजय पाण्डेय जी भोजपुरी के आपन मातृभाषा बतावत आ अपना माटी-अँगना-ओसारे से लेके वैश्विक संदर्भ से जोरत कहलें कि ई भाषा दिल के करीब बा एही से बात बतकही में हिन्दी ले ढेर हम सुभाविके एके बोलेनी. अशोक द्विवेदी के “कुछ आग कुछ राग” पढ़ि के अपना माटी, माई आ संस्कृति से जुड़े के मौका मिलल. अशोक द्विवेदी के कविता कई गो भुलाइल भोर पड़ गइल स्मृतियन के फेर जिन्दा क दिहलस. राजनीति आ समाजिक व्यवस्था के गहिर समझ इनका कविता में झलकत मिलल, एह रचनन में वैश्विक परिदृश्य के ताप महसूस कइल जा सकत बा. किताब में नया बदलाव आ ‘अवमूल्यन’ के प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति भइल बा.

delhi-5सुप्रसिद्ध कथा लेखिका डा॰ अल्पना मिश्र (दिल्ली विश्वविद्यालय) एह नया किताब के ‘भूमिका’ के अशोक द्विवेदी का कविता के कुंजी बतावत कहली कि कवि पूरा सत्यनिष्ठा आ सहजता से कविता का बारे में आपन विचार भूमिका में स्पष्ट कइले बा. ‘मातृत्व गीत’ ‘बचपन’ जइसन कविता भोजपुरी में लिखल जा रहल बा ई देखि सुखद अचरज भइल. गाँव आ ओकरा अस्मिता के लेके कवि में बहुत चिन्ता देखे के मिलल त संस्कृति से गहिर सरोकारो लउकल. लोक संस्कृति का नाँव पर फइलत अपसंस्कृति प कवि प्रतिरोध का साथ आक्रामक बा, बाकिर व्यंग्य का साथ. “केकरा खातिर” कविता के संदर्भ में ‘अझुराइल सपना’ के रूपक के खोलत अल्पना जी कहली कि ई वर्तमान समय, आ समाज के सत्य उद्घाटित करे वाला रूपक बा. मानवी विडम्बना के कई गो मरम छूअत अभिव्यक्ति एह कवितन के पढ़त खा मिल जाई. ई किताब भोजपुरी साहित्य क अनमोल रत्न बा.

delhi-8प्रसिद्ध कवयित्री डा॰ सुमन केशरी ‘कुछ आग कुछ राग’ के रचनन में आइल सहज बिम्बन के रेखांकित करत कहली “अइसन नया आ टटका विम्ब अशोक द्विवेदी का कविता के जीवंत बनावत बा. गाँव आ गाँव के विकास के आपन विसंगति बाड़ी सन. ओह पीड़ा के अभिव्यक्ति पहिल कविता में बा. ‘मातृत्व’, ‘एकता’, केकरा खातिर’ आदि कवितन का कन्टेन्ट के चर्चा करत सुमन जी कहली कि ‘जिनिगी के दउड़’ में मानवता के ऊ अन्धा दउड़ बा. अब न ओइसन गाँव न आदमी के उ चैन. दुश्चिन्ता से भरल आदमी, विकास का बादो असहाय बा. कवि प्रभावी ढंग से एह स्थिति/अवस्था के रेखांकित कइले बा. ‘कुछ आग कुछ राग’ में कवि के ईमानदार अभिव्यक्ति के कविता बाड़ी सन. जवन कवि का भाषा के ताकत के प्रमाणित करत बाड़ी स. एह कवितन के बहाने अपना जड़ो से जुड़े के अवसर मिलत बा.

डा॰ राम चन्द्र कहलन कि ‘पाती’ के माध्यम से ऊ अपना भाषा से पहिलहीं से जुड़ल बाड़न. ‘कुछ आग कुछ राग’ आ ओकर रचना समय, समाज आ समाजिक विसंगतियन के अपना लोकस्वर में हमनी का सामने प्रस्तुत करत बाड़ी सन. डा॰ रामचन्द्र जी का आग्रह पर कवि अशोक द्विवेदी अपना कुछ फ्री-वर्स, गीत अगीत आ गजल के पाठ कइलन, ‘परंपरा-सुमिरन के कर्म गीत’, ‘कवि तूँ धरती राग लिखऽ’, ‘हकूमत गीत गावेले’, ‘मड़इया मोर’ आ ‘बस हमहीं न होइब’ कविता के पाठ का बाद धन्यवाद आ आभार संयोजक डा॰ रामचन्द्र जी प्रगट कइलें.

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एह अवसर पर समिति-कक्ष में विश्वविद्यालय के सुधी-सहृदय, भाषाविद् प्रोफेसर; शोधार्थी आ छात्र-छात्रा उपस्थित रहे लोग. डा॰ रमाशंकर श्रीवास्तव (दिल्ली विश्वविद्यालय), डा॰ सुशील कुमार तिवारी (इग्नू), प्रो॰ गोविन्द प्रसाद, डा॰ गंगा सहाय मीणा, डा॰ रमण प्रसाद सिन्हा, डा॰ आसिफ (जेएनयू), डा॰ प्रमोद कुमार तिवारी (गुजरात विश्वविद्यालय) आदि लोगन का सक्रिय सहभागिता से भोजपुरी के ई आयोजन जेएनयू परिसर में बहुत सराहल गइल.
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प्रस्तुति: सान्त्वना (जेएनयू)

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