– पाण्डेय हरिराम

सरकार घोटाला के जांच करे खातिर विपक्ष का मांग पर संयुक्त संसदीय समिति (जे पी सी) बनावल सकार लिहले बिया आ एकरा खातिर स्पीकर से गोहारो कर दिहले बिया. भ्रष्टाचार मेटावे में अकरा से कतना आ का फायदा होई अउर कतना हिस्सा राजनीति का शोर में भुला जाई ई त समये बताई बाकिर अतना त महसूस होखते बा कि भ्रष्टाचार एगो मुद्दा बा आ ओकरा के अइसहीं ना छोड़ दिहल चाहीं. अगर अपना देश में भ्रष्टाचार का खिलाफ कवनो मुहिम शुरू होत बा त ओकरा के एह आधार पर खारिज कर दिहल बुद्धिमानी ना होई कि अब भ्रष्टाचार कवनो मुद्दा नइखे रहि गइल. ई बात हम एहसे कहत बानि कि कई लोग बतियावे में बतावल कि भ्रष्टाचार पर अब सिर्फ उहे लोग कह-सुन रहल बा जिनका लगे कवनो काम-धंधा नइखे. एह साथियन के कहना बा कि जेकरा जहां जवना सीमा तक मौका मिलत बा ऊ भ्रष्टाचार के फायदा उठा रहल बा.. जे अउर कुछ ना कर पावे ऊ वोट के सौदा कर लेत बा.अहसे अब भ्रष्टाचार आम लोग का नजर में कवनो मुद्दा नइखे. साँच बा कि एक का बाद एक कई चुनाव एह सच्चाई के रेघरिया दिहले बा कि भ्रष्टाचार अब कवनो चुनावी मुद्दा ना बने. लेकिन, हमन के इहो ना भूलाएल चाहीं कि चुनावे सब कुछ ना होला. चुनाव में अगर भ्रष्टाचार मुद्दा नइखे बनत त ओकर एगो कारण इहो बा कि पक्ष-विपक्ष सब ओकरा में एके जइसन बाड़े. त ओह मुद्दा पर आखिर वोटर केकरा खिलाफ केकरा के समर्थन देव ? लिहाजा ऊ उदासीन हो जाला.

एहिजा एक बात पर गौर करीं. भ्रष्टाचार सिर्फ नैतिकता के मसला ना ह, भ्रष्टाचार के मतलब अवसरो होला. कुछ अपवाद छोड़ दीं त जे जहां जवना सीमा तक भ्रष्टाचार के फायदा उठा सकऽता, उठा रहल बा. लेकिन इहो बात ध्यान देबे लायक बा कि के कतना फायदा उठा पा रहल बा ? एकर मतलब ई ना होला कि आम वोटर भ्रष्टाचार के बर्दाश्त करत रही जवना का चलते ओकरा वृद्धा पेंशन से लेके बीपीएल कार्ड तक, हर चीज ला तरसत रहे के पड़ता ?

बहरहाल, भ्रष्टाचार चुनावी मुद्दा भले मत होखे, बाकिर एगो मुद्दा ना आ बड़हन मसला बा. ई अइसन मुद्दा बा जवन कि हालात मुआफिक मिले त दौलत अउर ताकत का नशा में चूर लोगन के रातोंरात सड़क पर लिआ पटके. लेकिन सवाल ई बा कि जे लोग भ्रष्टाचार का खिलाफ अभियान चलावे के बात करत बा का ऊ लोग आम आदमी के उम्मीदन के समुझत बा ? अफसोस, नईखे समुझत.

अगर समुझत रहीत त भ्रष्टाचार जइसन मुद्दे के महज कवनो बिल (लोकपाल बिल) भा कवनो कमिटी के गठन से ना जोड़ दीत. बेशक, सीबीआई अउर पुलिस से लोग के भरोसा हट चुकल बा. सवाल उठत बा कि केहू करबो का करे ? जनता अउर विपक्षी दल कवन कानून बनवइहें ? ऊ कानून कतना ताकतवर होखी ? प्रधानमंत्री से बेसी त नाहिये हो सके. आ जब एगो ईमानदार प्रधानमंत्री भ्रष्ट तंत्र का सामने अतना लाचार हो सकऽता त भला कवनो पदाधिकारी के का बेंवत ?

कहे वाला कहेले कि कइसे एगो शेषन पूरा चुनाव तंत्र के कस दिहले रहे. बाकिर शेषन आपन पूरा ताकत लगाइयो के चुनाव में नीमन प्रत्याशियन के ना उतार पवले रहन. ना ओह लोग के जिता पवले. आ इहो सवाल बा कि चुनाव आयुक्त बने से पहिले शेषन ने एही नौकरशाही में पूरा जिनिगी बितवले रहले. माने कि उनुका रहते, उनुका देखते में ई तंत्र मौजूदा हालात में पहुंचल रहुवे. सौ बातन के एक बाति कि जब तंत्रे सड़ चुकल बा त तंत्र में पलाए वाला कवनो एगो अधिकारी ओकरा के ठीक ना कर सके. ऊ पूरा ताकत लगाके अपनही के ठीक राखि लेव त इहे बहुत बड़ बातिय होई.

तंत्र क सिर्फ जन ठीक कर सकेला. एहसे जब हम जन का शरण में जाईले त ओकरा ले पूरा तंत्र के ठीक करे के काम सँउपल चाही. एगो कमिटी, एगो बिल, एगो कानून भा एगो सरकार के बदले के जिम्मा देके हमनी का ओकरा के मौजूदा तंत्र के ओही खूंटा से बान्ह दीहिलें जवना से मुक्त होखे के हसरत लेके ऊ आपन बिखरल ताकत बिटोरत रहेला. जन जब चाह ले त तंत्र के बदल देव. एकर मिसाल ट्यूनीशिया में मिलल. एगो शिक्षित बेरोजगार युवक (जेकर ठेला पुलिस तूड़ दिहले रहुवे) के खुदकुशी विरोध के ऊ आंधी पैदा कर दिहलसि कि ओहिजा के राष्ट्रपति के देश छोड़के भागे पड़ल. देखते-देखत मिस्र में जनविरोध के ऊ लहर उठल कि राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ठेहूना पर आ गइले. फेर हमनी का देश में अइसन काहे ना हो सके ?


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी. अँजोरिया के नीति हमेशा से रहल बा कि दोसरा भाषा में लिखल सामग्री के भोजपुरी अनुवाद समय समय पर पाठकन के परोसल जाव आ ओहि नीति का तहत इहो लेख दिहल जा रहल बा.अनुवाद के अशुद्धि खातिर अँजोरिये जिम्मेवार होखी.

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