– पाण्डेय हरिराम

कोलकाता के इंदिरा भवन के नाम बदलला से शुरू भइल पश्चिम बंगाल में कांग्रेस आ तृणमूल कांग्रेस का बीच के बढ़त तनाव के असर अब दिल्लीओ में लउके लागल बा. हालांकि अइसनका पहिला बेर नइखे भइल. कांग्रेस के नीचा देखावे आ राज्य में ओकरा के अप्रासंगिक बना देबे के कोशिश त तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी शुरूवे से करत आइल बाड़ी. पहिले के घटनन के अगर नजरअंदाजो कर दिहल जाव तबहियो चुनाव में सीटन के बंटवारा लेके हुज्जत से बात बढ़त इंदिरा भवन ले आ चहुँपल बा आ अब दुनु पार्टी सड़कन पन मुट्ठी तानत लउकत बाड़ी स. हालांकि इंदिरा भवन के मसला कांग्रेसी पाखंड से बेसी कुछ ना कहल जाई बाकिर जवना तरह से ममता बनर्जी एकरा के उठवले बाड़ी आ जवना कवि का नाम पर नया नाम राखल चाहत बाड़ी ऊ उनुकर राजनीतिक महत्वाकांक्षा का अलावे दोसर कुछ ना ह. हालांकि ममता अब भवन के नाम ना बदले खातिर राजी हो गइल बाड़ी बाकिलर ओहमें नजरुल स्मृत्ति संग्रहालय बनावे के बात पर अबहियो अड़ल बाड़ी. हालांकि इंदिरा जी के नेमप्लेट के भीतर नजरुल के संग्रहालय राज्य में एगो खास तरह के असंगति जनमाई.

इंदिरा भवन 1972 के दिसम्बर में कांग्रेस अधिवेशन खातिर बनल रहे. ओहिजा इंदिरा गाँधी ठहरल रही बाकिर बाद में कांग्रेस के सरकार ना रहल त ई भवन माकपा मुख्यमंत्री ज्योति बसु के आवास बन गइल. कांग्रेस के ऊ अधिवेशन पाकिस्तान पर विजय आ बंग्लादेश बनला के भावोन्माद का परछाईं मे भइल रहे आ चालीस साल बाद ओह भवन के लेके बंगाल में सियासत गरमाए लागल बा. पिछला मंगल का दिने राइटर्स बिल्डिंग (बंगाल के सचिवालय) के इतिहास में सबले लमहर लम्बे प्रेस कांफ्रेंस में ममता बनर्जी कांग्रेस पर सीधा आरोप लगवली कि ‘ऊ तृणमूल के राजनीतिक मात देबे खाति वामपंथियन से हाथ मिला लिहले बिया.’ ममता बनर्जी साफ कहली कि ‘ऊ कबहियो एक लफ्ज मनमोहन सिंह भा सोनिया गांधी का बारे में गलत नइखी कहले बाकिर कांग्रेस के लोग सड़क पर खड़ा होके हमरा के गरियावत बाड़े.’ ममता बनर्जी के खीसि अपना चरम पर रहुवे.

दोसरका तरफ एह अवसर के राजनीतिक दोहन करे खातिर ममता बनर्जी के प्रेस कांफ्रेंस के तुरते बाद सीपीएम नेता सूर्य कांत मिश्र उनुकर आलोचना करत कहले कि ‘दस बरीस ले ज्योति बसु ओह भवन में रहले बाकिर ऊ ओकर नाम ना बदलले. एह काम से ना त इंदिरा जी के प्रतिष्ठा मिली ना ही नजरूल के. जहां ले कांग्रेस आ माकपा के हाथ मिलवला के सवाल बा ममता जी के पार्टी के कार्यकर्ता एहौ बहाने दुनु दल के लोगन पर हमला करत बाड़े.’ साथ ही नजरुल जन्मोत्सव कमिटिओ एकर विरोध कइले बा आ कहले बा कि सरकार के ई काम इंदिरा गांधी आ नजरुल इस्लाम दुनु के बेइज्जति बा. नजरुल जन्मोत्सव कमिटि का ओर से नजरुल अकादमी के अध्यक्ष प्रो. मिरातुल नाहर कहले कि ‘एक आदमी के नाम हटाके दोसरा के नाम देबे के मतलब दुनु के बेइज्जति कइल बा.’

हालांकि ई साँच बा कि ममता बनर्जी विरोध आ मौका के परवाह ना करसु बाकिर मनोवैज्ञानिक तौर पर ऊ बहुते महत्वोन्मादी हई आ अब ऊ शायदे एह मामिला में पाछा हटसु. अइसनका होखल कवनो नया बाति नइखे. खेती भा गरीबी वाला माहौल से आइल महिला राजनीतिज्ञन का साथे ई अकसर होखेला. मायावती अउर जयललिता के उदाहरण सामने बा. विख्यात समाज वैज्ञानिक हैगन के कहना ह कि ‘औरतन में वर्ग परिवर्तन, खास कर के खेतिहर भा ओही तरह के वर्ग से बहरी निकल के बड़का उँचका वर्ग का ओरि धवला का साथही ओह लोग का व्यक्तित्वो में बदलाव आ जाला आ ऊ बदलाव अधिका कर के नकारात्माक आ सृजनहीन होला.’ जहां ले ममता बनर्जी के सवाल बा ऊ लोकतांत्रिक मनसा के मानवीय स्वर दिहली बाकिर उनुकर तानाशाही आदत एह पर असर डाल सकेल. ऊ एहसे वाकिफो बाड़ी आ जबो तृणमूल कांग्रेस में लोकतांत्रिक कायदा का कमी का बारे में सवाल कइल जाला त ऊ तुरते भड़क जाली.

महज 19 सांसदन का साथे ऊ 206 सांसदन वाली मजबूत कांग्रेस के एह साल चार बेर पटकले बाड़ी आ हर बेर बहुते खास मामिलन में. ऊ बांग्लादेश में तीस्ता नदी जल बंटवारा पर बातचीत से शामिल होखे से इंकार करिके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ठोकर लगवली. ओकरा बाद खुदरा कारोबार पर अड़ल रहि गइली आ सरकार के ऊ प्रस्ताव मुल्तवी करे के पड़ल. ईंधन तेल के दाम लेके आ फेर लोकपाल के मसला पर. हर बेर कांग्रेस के अहं के ऊ ठोकर मरले बाड़ी. ऊ कांग्रेस के बखूबी समुझेली. ऊ उहे तरीका अपनावत बाड़ी जे कांग्रेस पार्टी अपना गठबन्हन के सहयोगियन खातिर अपनावेले. अगर फ्रैंक सिनात्रा के मानीं त कह सकीलें कि ‘बात मानऽ ना त रास्ता लऽ’ के तकनीक कांग्रेस अपनावेली आ अब ममतो अपनावत बाड़ी. ममता कांग्रेस से दबीहें ना, काहे कि उनुका एकर कवनो जरूरत नइखे, काहे कि उनुका पर भठियरपन के आरोप लागे के मौका ना के बरोबर बा. उनुका कवनो पोल खुल जाएके डर नइखे. उनुका लगे सीबीआई से लुकावे खातिर कवनो घोटाले नइखे. एहीसे ऊ दिल्ली के ब्लैकमेलिंग लेके चिंतित नइखी ऊ ना जानसु कि निरीह भा दब्बू कइसे होखल जाव. दिल्लीओ चुप बिया. एह सगरी प्रकरण में जवन सबले खास सियासी गुत्थी बा उ बावे कांग्रेस के माथ नेता सोनिया गांधी के चुप्पी. ममता बनर्जी के हर प्रहार खाली कांग्रेसे के अहं के ठोकर नइखे मारत बलुक प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के कमजोरो करत बा. कांग्रेस पर होखत ई चोंट एक तरह से राहुल गांधी खातिर मददगारो बा. इहे कारण बा कि कांग्रेस ममता बनर्जी के चोट से बाचे के कवनो कोशिश नइखे करत बलुक ऊ उनुका 19 सांसदन के अप्रासंगिक बना दिहल चाहत बिया.

अबही जवन हालत बा ओहमें ममता बनर्जी के लगातार प्रहार लउकत बार त कांग्रेसिओ पाछा नइखन. कांग्रेस किनारा से हमला बोलल शुरू कर दिहले बिया. युवा कांग्रेस नेता मौसम नूर इंदिरा भवन मुद्दा पर पश्चिम बंगाल सरकार के फैसला के कड़ेर आलोचना कइले बाड़ी. केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस के लगातार विरोध से आजिज आ गइल लागत बिया. इहे कारण बा किर पार्टी का भीतर तृणमूल कांग्रेस के बिना यूपीए गठबंधन चलावे के उपाय खोजल जाये लागल बा. कांग्रेस अइसन सहयोगी के तलाश करत बिया, जो हर तरह के हालात में ओकरा साथे रहे. पार्टी से जुड़ल सूत्र बतावत बाड़े कि उत्तर प्रदेश चुनाव का बाद 22 सांसदन वाली समाजवादी पार्टी के कांग्रेस तृणमूल वाली जगह पर आपन संभावित साथी देखत बिया. कांग्रेस के कुछ रणनीतिकार सलाह दिहले बाड़न कि तृणमूल के बाहर के रास्ता देखावे खातिर कांग्रेस-सपा गठबंधन बना के वामपंथियन का साथे पुरनका रिश्ता में जान फूंकि के 2014 का लोकसभा चुनाव में जाइल बेहतर रास्ता होई. कांग्रेस की हालत खास करिके प्रधानमंत्री के टूटत अहं आ बिखरत मर्यादा देख के लागत बा कि ममता बनर्जी के सहयोग से सरकार बचवला से बड़का शाप कुछ दोसर ना हो सके.

तृणमूल कांग्रेस के नेता त अब खुल्लमखुल्ला कहत बाड़े कि उनुका बंगाल में सरकार चलावे खातिर केहु के जरूरत नइखे आ कांग्रेस हाई कमान अपना कार्यकरतन के ममता पर हमला करे के खुला छूट दे दिहले बिया. लेकिन एहसे बंगाल के कांग्रेसियन के त कुछ बने से रहल. ऊ सिरिफ दिल्ली के जहर एहिजा उगिलत बाड़े. एहसे दुनु के रिश्ता खतम हो सकेला लेकिन तब बंगाल के कांग्रेसी नेता घाटा में रहीहें. ई सियासी दूरंदेशी ना कहल जा सकी. कांग्रेस कके कवनो फैसला लेबे में लगभग तीन महीना के समय लागे वाला बा, उत्तर प्रदेश आ अउरी चार गो राज्यन के चुनाव का बादे कुछ हो पावे के संभावना बा. उत्तर प्रदेश में जवन सबले बढ़िया हो सकेला ऊ बा सपा के सबले बड़का पार्टी का रूप में जीत के आइल. लेकिन ओह हालत में ओकरा सरकार चलावे खातिर कांग्रेसी विधायकन के मदद लेबे के होउ. अगर अइसन होखत बा त दिल्ली ममता से पल्ला झाड़ सकेले आ सपा के अपना साथे ले सकेले. अगर सपा साथे आ जात बिया त 2014 ले ओकर सांसद कांग्रेस के बंधुआ रहीहें.

ई तबहिये हो सकेला जब सपा सबले बड़का पार्टी बन के उभरे. अगर अइसन ना भइल (जेकर उम्मीद बहुते कम बा) तब ममता से गठबंधन ओही समय ले रही जब ले कांग्रेस खातिर मनमोहन सिंह जरूरी बनल रहीहे. दिल्ली दरबार में सरगोशी होखे लागल बा आ सियासत में कानाफूसी के हल्ला में बदले में देर ना लागे. सोशल मीडिया के एह दौर में ई हल्ला आनन फानन में चहुओर पसर जाला आ ओकरा बाद जनमत के रूप धर लेला.


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार के संपादक हईं.

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