तनी हट-हटा के ….

– प्रगत द्विवेदी

Paati72
बचपन से आजु ले पिताजी के भोजपुरी-भोजपुरी रटत देखत अइलीं. ऊ आजु ले ना थकलन, बाकिर हमनी का जरूर घबड़ा गइली जा. भोजपुरी के पहिचान, ओकरा प्रसार आ विकास के बात-बखान सुनत हम बलिया से आके दिल्ली रहे लगनी बाकि आजु ले हमके ई ना बुझाइल कि कवि, साहित्यकार आ समीक्सक लोग एगो ‘खास गोलाई’ (फिक्स सर्किल) में काहें घूमेला? ई साँच बा कि भोजपुरी अपना खास मौलिकता आ सहजता का कारण बोले-बतियावे में आपन विशेष पहिचान बनवले बिया, ऊ मजबूतो भइल बिया. बाकि गौर करीं त पता चली कि आज का स्थिति आ माहौल में भोजपुरी एगो ‘अजबे दशा’ में पहुँचल जात बिया. एह ‘अजबे दशा’ भा ‘अजबे स्थिति’ का बारे में जेतने भोजपुरिजा लोगन से पूछल-जानल जाव, ऊ ओतना तरह के बिचार आ तर्क देत भेंटा जाई. कुछ लोग इतिहास, कुछ वर्तमान, कुछ भविष्यो का बारे में आपन राय देत नजर आई लोग. एह तरह से कवनो एगो सामूहिक कोशिश खातिर राह ना बनि पाई. आज हमहूँ त एकरा बारे में एगो वैचारिक-पोटली बन्हले एह पन्ना के सियाही से रँग रहल बानी. त काहे ना हमनी का सब केहू तनी हट-हटा के सोचल-समझल आ चलल जाव?

भोजपुरी का नाँव पर खाली कुछ गावे-बजावे वाला, संस्था चलावे वाला आ सहित्यकार लोगन का क्रियाशीलता से काम ना चली. लगभग पचहत्तर पर्सेंट भोजपुरिया लइका, प्रोफेशनल क्लास, नोकरी-पेशा वाला युवा वर्ग के त ई पते नइखे कि भोजपुरी में कुछ लिखलो-पढ़ल जाता आ अपना एह भाषा के पढ़े-पढ़ावे वाला साहित्यो बा. ढेर लोग त आजुओ इहे बूझत बा कि भोजपुरी एगो बोली हऽ आ ओकरा के यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश में बोलल जाला. राह में केहू भोजपुरी बोलत-बतियावत मिल जाव त इहे समझी कि ई अपने ओर के हउवन, चलऽ अपनापन मिली, मनसायन रही भा कम से कम राह में सुविस्ता रही, बस! आज एकरा से आगा बढ़ि के बूझे-बूझावे खातिर कुछ पहल कइला क जरूरत बा. पहिला पहल साहित्यिक लोग करे त नीक होई. कई बेर से बलिया-गाजीपुर-बनारस आवत-जात सबकर बात-व्यवहार समझत हमार निजी समझ इहे कहत बा कि जबले बोलले-बतियवले लेखा, भोजपुरी लिखला-पढ़ला के गति तेज ना होई त आपन पहिचान, आ बड़प्पन देखवला से कुछ नइखे होखे-जाए के. साहित्यिक, समाजसेवी आ बुद्धिजीवी भोजपुरिहा लोगन के बोलले-बतियवला नियर आपन लिखलो-पढ़ला के युवा वर्ग मे रचावे बसवे खातिर पूरा जोर लगावे के पड़ी.
PragatDwivedi

युवा वर्ग पर कई किसिम के बोझ बा. पढ़ाई, कैरियर, जाॅब, प्रोफेशन, स्टेटस, भरन-पोसन, प्रतिस्पर्धा में बनल रहल आ सबका संँग-सँग भोजपुरियो संस्कृति में बनल रहल. स्कूल कालेज सभा समारोह आ सोसाइटी फंक्शन में भोजपुरी भासा के लोप त होते बा, संचार साधन जइसे इन्टरनेट ह्वाट्सएप. फेसबुक. ट्विटर आदि में भोजपुरी कन्टेन्ट के कमी लउकत बा. भा कहीं कि विषयवस्तुओ त बाटे बाकिर प्रसार बढ़ावे में भारी कमी बा. एही तरह जवन आज लिखल-पढ़ल आ गुनल जाता ओकरा के ‘आडियो-वोडियो’ प्रारूप मे अधिका से अधिका बढ़वला के जरूरत बा.

अक्सर हम देखेनी कि जहाँ चार गो समाजसेवी भा बुद्धिजीवी साहित्यकार लोग लउकेला कैसेट आ भोजपुरी सिनेमा वाला छिछिल फूहड़पन के गरियावत लउकेला. भाई जवन बाजार में आई भा परोसल जाई ऊहे न लोग देखी-जानी!. एमे दखल देबे खातिर बुद्धिजीवी, समाजसेवी आ साहित्यिक समझदार लोगन के कूदे आ कुछ पाजिटिव काम करे के पड़ी. अगर आज एह विषय पर एगो बइठकी बोला दिहल जाव त पता चली कि लोग एह टापिक पर अतना बोल दी, आतना ढकच दी कि टापिके बन्न हो जाई. बात कहला ले ढेर कइला के बा, कुछ कइले से रास्ता बनी. हम अपना जवानी के बीसन साल पार करत बानी एही आशा में कि साहित्यकार आ संस्था वाला लोग एह दिसाईं बहुत काम कर रहल बा, पत्र पत्रिका निकाल रहल बा, जरूर आगा कुछ ना कुछ होई. बाकिर साँच इहे बा कि खाली प्रसार विहीन प्रिन्ट मीडिया का बदउलत हमनी का पुरनकी जगहा से तनिकि भर आहा घुसुकल बानी जा, एसे ढेर ना. आजुओ ज्यादातर लोग ओही पुरान ढंग-ढर्रा आ सोच पर काम कर रहल बा, भा सेवा कर रहल बा जवना से उ लक्ष्य नइखे भेंटा पावत, जवन अबले भेंटाइ गइल चाहत रहे.

हमरा कुछ हट-हटा के सोचे के आदत बा आ हट हटा के करे के कोशिश. बाकिर एह कोशिश आ कहला-सुनला में कुछ ना कुछ अइसनो छुवे क, उदबेगे क कोशिश करब जवन दुखइबो करी. बाकिर जब धीरे-धीरे सही होखे लागी, त बदलाव भा हलुक-पातर परिवर्तन का बाद सहज आ अनुकूल लागी. कुछ अइसन लक्ष्य पर काम कइल जरूरी बा जवना से भोजपुरी ओह सब वर्ग से जुड़ जाव…. बड़-छोट, ब्यूरोक्रेट, अफसर, प्राइवेट सेक्टर, मध्यवर्गी समाज, आईटी सेक्टर, फैक्टरी, दुकान, कम्पनी चाहे लाला के दोकान, बूढ़-पुरान, लइका-लइकी, मेहरारू सभे भोजपुरी सुने, देखे पढ़े आ लिखे लागे. एकरा खातिर स्वंयसेवी हर बड़ शहर में वालन्टियर भाव से काम करे के पड़ी. नाम, सम्मान, पद, पुरस्कार के लालच छोड़ि के अपना भाषा खातिर सेवापरक भाव लेके व्यक्तिगत प्रतिबद्धता, कमिटमेंट, का साथ कुछ शुरू करे के पड़ी. हमरा कवनो मान-सम्मान, पदवी-पुरस्कार के लालसा नइखे ना लिखास-छपास के भूखि बा. एगो चिनगारी जरूर बा भितरी, जवन कुछ अच्छा करे के जज्बा-जोश जगावत बा. एह कालम का जरिए, रउरा जइसन कइ लोगन से संबाद आ मिलला क जरूरत पड़ी एह अपेक्षा का साथ एह अंक में बस अतने….!

(भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका ‘पाती’ के सितम्बर-दिसम्बर अंक से साभार)


प्रगत द्विवेदी सांख्यिकी में परास्नातक हउवन | द सरफेसेज आ द प्लाइ रिपोर्टर नांव के दू गो मैगजीन निकालेलन बिजिनेस मीडिया में वास्तु आ वुड प्रोडक्ट का साथ इन्टीरियर डिजाइन प्रोडक्ट के अच्छा जानकारी बा! भोजपुरी से उनकर लगाव सुरुवाते से रहल बा, आजुअो ऊ भोजपुरी बोलला का साथ, भोजपुरी में लिखल पढल करेलन!

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