– पाण्डेय हरिराम

आजु दीपावली ह, अन्हार के दूर भगावे के तेहवार. एह तेहवार के भारतीय लोकजीवन में बहुते आध्यात्मिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक महत्व ह. दीपावली के रात में दिया जला के हमनी का अन्हरिया पर उजियार के जीत के जश्न मनाइले. अन्हरिया असत्य, अन्याय भा नकारात्मक पक्ष के सूचक ह, ओहिजे उजियार सत्य, न्याय आ सकारात्मक पक्ष के. समाज में फइलल बुराइयन पर अच्छाई के विजयो के प्रतीक ह दीवाली. ई पर्व सुख आ समृद्धिओ के प्रतीक ह. एह पर्व के व्यक्तिगतो जीवन में बहुते महत्व बा. एह दिन हमनी का दिया जरा के अन्याय, असत्य अउर अन्हार के भगवला का साथे मन के मनिलतो के अपना से दूर भगाइलें. उजाला हमनी के भीतर सत्य, न्याय अउर निमना गुण के समावेश करेला.

एहिजा एगो बाति उठत बा कि अन्हार यदि प्रकाश के ना रहला से होला, त छाया अन्हार आ उजियार का बीच के एगो अइसन स्थिति ह जवन होइये के ना होले आ ना होईये के होले. एहिजा एगो दर्शन बा. अन्हार के मतलब एगो करिया आकार जवन अन्हरिया के समुद्र हवे. आंख बंद करते सभतर अन्हारे अन्हार हो जाल. ओकर कवनो रूप-रंग ना होखे बाकिर छाया अइसन ना होले. छाया के मतलब होला कि प्रकाश त बा, लेकिन ओकरा राह में कवनो बाधा आ गइल बा. ओह बाधा के पृष्ठभूमि में प्रकाश मौजूद रहेला. ओकर किरण ओह बाधा के ना भेद पवला से एने ओने छितरा जाला. ओह बाधा के बिम्बे छाया ह. एह छाया के पहिचानल बहुते कठिन बा. ई त बतावल जा सकेला कि ई पेड़ के छाया ह कि कवनो दोसरा चीज के. बाकिर ई बतावल बहुते कठिन होला कि ई कवना तरह के वृक्ष भा वस्तु के छाया ह. जबले ओह वस्तु के आदमी पहिले ना देखले होखे. छाया विश्रामस्थल त हो सकेले लेकिन ओहिजा ऊ स्पष्टता ना हो सके, काहे कि रोशनी नइखे. जहाँ प्रकाश नइखे ओहिजा स्पष्टतो ना होखे. बिना ज्ञान के चलल अंधमार्ग पर चलल ह. एहसे ज्ञान प्राप्ति के ब्रह्म अउर मोक्ष के मार्ग बतावल गइल बा. प्रकाश का बिना कुछउ सम्भव नइखे. प्रकाश के अवरोधे छाया के निर्माण करेला लेकिन व्यक्ति के पृष्ठभूमि में प्रकाश के उपस्थिति छाया के निर्माण ना करे बलुक परछाई बनावेले. परछाई में छाया त बा, लेकिन ऊ ‘पर’ अर्थात दोसरा के बा. भला स्वयं ओकरे छाया के दोसरा के छाया कइसे कहल जा सकेला ?

हमनी जवन कुछ करत बानी, कहत बानी, ऊ सब दोसरे के त ह, सिवाय एह शरीर के. त बात स्पष्ट बा कि एह शरीर से जवनो कुछ होत बा ऊ आपन छाया ना होके परछाईये त ह. साथ ही एहिजा जवना प्रकाश के बात कहल गइल बा, ऊ प्रकाश स्व-बोध के प्रकाश ह, ई स्व के जाने के ह, स्व के पावे के ह. आ जब आदमी अपना निजता के पा लेला त ओकरा में समूल परिवर्तन हो जाला काहे कि ऊ दुनिया का सोझा मौलिक व्यक्तित्व का रूप में सामने आवेला. एहिसे ऊ विद्रोही मान लिहल जाला. दोसरा के अन्धानुकरण ना करके व्यक्ति के आपन स्वतंत्र आ मौलिक अस्तित्व निर्माण करे के चाहीं. अइसनाक व्यक्तित्व दोसरा खातिर छाया बनेले. छाया कल्याणकारी होले, लेकिन परछाई कवनो रूप में कल्याणकारी ना होखे. प्रकाश बने के प्रयास करे के चाहीं, अगर प्रकाश ना बन सकीं त छाये बन सकीलें, लेकिन परछाई ना बने के चाहीं. ओकरा में ना त सुख बा ना ही आनन्द. प्रकाश के राह के हर बाधा गिरा के हमनी के प्रकाशमय बन जाये के चाहीं. तबहियें हमनी का प्रकाशपुंज होके ज्योतिर्मय हो सकीले.

ऋषि लोग एहिसे बहुते साफ स्पष्ट शब्दन में प्रार्थना कइल कि – ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’. एह साधारण लागे वाला शब्दन में बहुते गंभीर भाव छिपल बा. एहमें भौतिक अन्हार से प्रकाश का ओर ले जाये के प्रार्थना त बड़ले बा, साथे इहो भाव ओहमें समाइल बा कि हमनी के अविद्यान्धकार से छोड़ा के विद्यारूपी सूर्य के प्राप्त करावल जाव. हमनी के पुरनिया वैदिक ऋषि लोग हर तरह के सामाजिक समस्यन के तीन श्रेणियन में बँटले बा – अज्ञान, अन्याय अउर अभाव. चाहे कवनो देश होखे, कइसनो समाज होखे, सभतर ई समस्या रहबे करी. एह तीनो समस्यनो में अज्ञान के समस्या सबले बड़ होला काहे कि ई कहल अनुचित बेजाँय ना होखी कि बाकी दुनु समस्या – अन्याय अउर अभाव के समस्या – अज्ञाने का चलते जनम लेली सँ.

त चलीं, अन्हार से अँजोर का राह पर आगा बढ़ल जाव.

(26 अक्टूबर 2011)


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी.

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