– पाण्डेय हरिराम

अबही कुछ दिन पहिले किरण बेदी कहले रही ‘अण्णा इज इंडिया एंड इंडिया इज अण्णा’. उनुकर ई बाति अचानके इमरजंसी के ओह दौर के इयाद दिआ दिहलसि जब एगो महानुभाव कहले रहन ‘इंदिरा इज इंडिया….’ ओकरा बाद का भइल ई सभे जानत बा.अबही एह बाति से फरदवला ई सोचे के बाति बा कि अगर टीम अण्णा के मनचाहा रूप में ई बिल पास ना भइल त आंदोलन के रूप का होई ? बाकी का तरह एह सवाल के जवाब साफ नइखे. बाकिर अण्णा का अगुवाई में शुरू भइल एह आंदोलन से ई बाति जरूर साफ हो गइल कि राजनीतिक पार्टियन से आम आदमी के मोहभंग भइल बा. एह पार्टियन का नेतवन के झूठ वादा से बेर-बेर चोट खइले आम आदमी के भरोसा के एगो नया ठौर अण्णा का रूप में लउकल बा.

अण्णा एह जनता से कवनो वादा नइखन कइले बाकिर जनता उनुका से बेर-बेर वादा करत बिया कि ‘अण्णा हम तुम्हारे साथ हैं.’ आखिर एह भरोसा के कारण का बा ? कवना कारण से अनिश्चित, अनसुलझल अउर अनगढ़ राह पर लोग अण्णा के पीछे भागत चलल जात बा. एह भरोसा के वजह बा हाल के बरीसन में उपजल निराशा अउर नाउम्मीदी. ई नाउम्मीदी काहे ? डॉ. राधाकृष्णन चेतवले रहले कि ‘एगो धनलोलुप आ बिकाऊ शासक वर्ग जनता के सपना के दु:स्वप्न में बदल सकेला जब तकले कि हमनी का सत्ता के माथ से भठियरपन ना मेटा दीं, भाई-भतीजावाद, सत्ता लोलुपता, मुनाफाखोरी अउर काला बाजारी के हर जड़ के ना उखाड़ फेंकी, जवन हमनी के महान देश के नाम खराब कइले बा ..तबले हालात ना सुधरी.’

एही सुधार के उम्मीद जनता के अण्णा से हो गइल बा. आजु अण्णा हजारे ठीक ओही तरह के प्रतीक बन गइल बाड़न जइसे जयप्रकाश नारायण 1974 में बन गइल रहले. अण्णा के खास मांग ओतना खास नइखे जतना कि उनुकर ओह माँगन के उठावल. कवनो बेसी योग्य सरकार रहीत त अण्णा के शुरुआती मांग मान लिहले रहीत, लोकपाल मसौदे के उनुकर ड्राफ्ट लोकसभा में राख दिहले रहीत आ फेर लमहर वैधानिक प्रक्रिया चले दिहले रहीत. एहसे आधिकारिक तौर पर प्रतिक्रिया देबे के जिम्मेदारी सगरी राजनीतिक दल तक पहुंच जाइत, बजाय अकेले तौर पर कांग्रेस संगठन के. एहिजा दू गो बाति बहुते साग बा. एक त ई कि ई मसला आंदोलन के विश्वसनीयता से बेसी सरकार की गिरत छवि अउर साख देखावत बा. अण्णा आंदोलन में लोगन के भरोसा होखे भा ना, सरकार पर उनुका तनिको भरोसा नइखे. हमनी के लोकतंत्र हमनी के एगो अइसन राजनीतिक व्यवस्था दिहले बा जवन लोग में एकरा प्रति संदेह के बढ़वले बा. अइसना में सरकार
का खिलाफ चलावल कवनो आंदोलन आसानी से लोग के दिलो-दिमाग पर छा सकेला. अब अगर अण्णा के ई आंदोलन अपना मकसद से विफल हो गइल तब ? ई सवाल जतना बेचैनी पैदा करत बा ओहसे बड़हन सवाल ई बा कि अगर आंदोलन कामयाब हो गइल आ जनता जतना उम्मीद पोस के बइठल बिया ऊ पूरा होत ना लउकल, तब का होई ?
(24 अगस्त 2011)


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखल करेनी.

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