– देवकान्त पाण्डेय

DevkantPandey
उत्‍तर प्रदेश के मऊ जिला के मुहम्‍मदाबाद गोहना तहसील में मऊ शहर से करीब 28 कि.मी. दूर आजमगढ़-मुहम्‍मदाबाद गोहना-घोसी रोड पर स्थित देवलास मऊ जिला के प्रमुख पर्यटक स्‍थलन में गिनल जाला. देवल ऋषि के तपोस्थली के रूप में प्रसिद्ध ए स्‍थान के आपन कुछ विशेषता बा जउना के चलते एकर खास महत्‍व बा.

सूर्य मंदिर (देव बालार्क) आ छठ पर लगे वाला मेला बा इहां के मुख्‍य पहचान

SuryaMandirDewlas
इहॉं मौजूद सूर्य मंदिर (देव बालार्क), मंदिर के पास स्थित तलाब (देवताल) आ हर वर्ष छठ के अवसर पर इहॉं लगे वाला मेला, जवन देवलास मेला के नाम से प्रसिद्ध बा, ए स्‍थान के प्रमुख पहचान बा. सबके पता बा कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि के दिने भारत में सूर्य उपासना के महापर्व छठ बहुत धूम-धाम से मनावल जाला. ओही अनुसार “देवल बाबा के मंदिर” के नाम से विख्यात देवलास स्थित ए सूर्य मंदिर पर भी सूर्योपासना के इ महापर्व बहुत आदर, श्रद्धा आ उत्‍साह के साथ मनावल जाला आ ए अवसर पर इहॉं करीब सप्‍ताह भर चले वाला एगो बहुत बडि़यार मेला भी लगेला. इ मेला पूर्वी उत्‍तर प्रदेश में लगे वाला मेलन में से एक बा आ बहुत नामी बा. मेला में आस-पास के जिला-जवार से त लोग अइबे करेला, प्रदेश के दूर-दूर के इलाका के लोग भी इ मेला घूमे आ मेला में व्‍यापार करे खातिर आवेला. ए मेला के ठेठ पारम्‍परिक रूप आजो मौजूद बा आ मेला में तमाम तरह के पारम्‍परिक समान जइसे चउकी, सील-लोढा, बक्‍सा, कम्‍बल आ खेती-बारी के समान जइसे कि फरुहा, कुदार, खुर्पी, हँसुवा, हर, जुवाठ आदि के दुकान लगेले आ इ कुल समान खूब बिकाला. ए कुल के अलावा झूला, सर्कस, थियेटर आ अन्‍य सांस्‍कृतिक कार्यक्रम के आयोजन भी मेला में होला.
बहुत प्राचीन आ पौराणिक बा सूर्य मंदिर अउरी मेला

सूर्य कुंड, राजभर मंदिर व सूर्य मंदिर, देवलास

सूर्य कुंड, राजभर मंदिर व सूर्य मंदिर, देवलास


इ मेला कबसे लगे शुरू भइल एकर कउनो दस्तावेजी प्रमाण के जानकारी त ना बा लेकिन लगेला कि एकर शुरूआत कई सौ साल पहिले भइल होई . अंग्रेज आई. सी. एस. अधिकारी डी. एल. ड्रेक – ब्रोकमैन द्वारा संपादित-संकलित आ सन 1911 में प्रकाशित आज़मगढ़ के गजेटियर में भी ए मेला के उल्‍लेख बा. गजेटियर के पृष्‍ट 65 पर लिखल बा “The only other fair which deserves mention is the Deolas fair in pargana Muhhamadabad, which is also known as the Lalri Chhath and is held on the sixth of the light half of Kartik. Deolas is famous in the district for its lake and temple of sun ; and at the fair, to which considerable numbers resort from the neighbouring parganas, a thriving business is done by the shopkeepers.” ए उल्‍लेख से स्पष्‍ट बा कि देवलास स्थित सूर्य मंदिर (देव बालार्क), तलाब (देवताल) आ देवलास मेला, इ तीनों के इतिहास बहुत पुराना बा. इ सूर्य मंदिर उड़ीसा के कोणार्क, काशी के लोलार्क आ देश में विद्यमान कुछ अन्‍य गिनल-चुनल सूर्य मंदिरन में से एक बा. ए मंदिर में भगवान सूर्य के बाल स्वरूप बालार्क  क दर्शन होला. श्री विजयेन्द्र कुमार माथुर अपने पुस्‍तक ऐतिहासिक स्थानावली में लिखले हवें कि “देवलास का प्राचीन नाम देवलार्क हुआ करता था, जिसका अर्थ ‘सूर्य मन्दिर’ है”.

प्राचीन अयोध्‍या साम्राज्‍य आ गुप्‍त काल से जुड़ल बा संबंध

विक्रमादित्‍य का चौखटा

विक्रमादित्‍य का चौखटा


इहो मान्‍यता बा कि प्राचीन काल में देवलास अयोध्‍या साम्राज्‍य क पूर्वी द्वार रहल. आज़मगढ़ के गजेटियर के पृष्‍ट 156 पर लिखल बा “ ….in Deolas of pargana Muhammadabad is a tank with rising ground near it, which is said to have formed the eastern gate of Ajodhya, that city, according to the legend, having had four gates all 42 kos distant from itself.” ए स्‍थान के भगवान राम के साथ जोड़ के भी देखल जाला. ए बारे में दू गो बात कहल जाला. एगो त इ कि भगवान राम वनगमन के समय ए स्‍थान पर रात्रि विश्राम खातिर रुकल रहलन आ इहां सूर्य के उपासना कइला के बाद सूर्य मंदिर के निर्माण क आधारशिला रखलन आ बाद में गुप्‍त कालीन शासक विक्रमादित्‍य के द्वारा इहां सूर्य मंदिर के निर्माण करावल गइल. इ मत व्‍यक्‍त करे वाला लोग रामचरित मानस के पंक्ति “बालक वृद्ध बिहाई गृह, लगे लोग सब साथ ।। तमसा तीर निवासु किय, प्रथम दिवस रघुनाथ”।। क उल्‍लेख करेला आ कहेला कि ओ समय तमसा नदी देवलास के पासे बहत रहे. दूसर मत इ ह कि वन गमन के समय ना बल्कि मुनि विश्वामित्र के साथ ताड़का वध खातिर बक्सर जात समय भगवान राम इहां रात्रि विश्राम कइले रहें आ इहां सूर्य के उपासना कइला के बाद सूर्य मंदिर के निर्माण क आधारशिला रखलें आ बाद में गुप्‍त कालीन शासक विक्रमादित्‍य के द्वारा इहां सूर्य मंदिर के निर्माण करावल गइल. ए तथ्‍य में केतना सच्‍चाई बा इ त अनुसंधान के विषय बा लेकिन एतना जरूर बा कि देवलास के ऐतिहासिकता आ पुरातनता-पौराणिकता के नकारल ना जा सकेला. ए स्‍थान के संबंध इक्ष्‍वाकु वंश के सूर्यवंशी राजा आ बाद में गुप्‍त कालीन शासक महाराजा विक्रमादित्‍य से जरूर जुड़ल बा.

सूर्यकुंड, चौखटा आ इनार (कुंआ) भी बा महत्‍वपूर्ण

यादव जाति का मंदिर, देवलास

यादव जाति का मंदिर, देवलास


मंदिर के बगल में सूर्यकुंड भी बा जेमें छठ के अवसर पर “नहान” सम्‍पन्‍न होला. दूर-दूर से आवे वाला श्रद्धालु ए सूर्य कुंड में स्‍नान क के पुण्‍य लाभ प्राप्‍त करेलें. कहल जाला कि देश में शरद ऋतु में होखे वाला सब “नहान” में यह पहिलका नहान देवलास पर ही होला अर्थात नहान के शुरूआत एहीं से होला. बाकी नहान एकरे बादे आवेलें. सूर्य मंदिर के पीछे, जहॉं कुछ साल पहिले क बनल हनुमान मंदिर विद्यमान बा, उहॉं जमीन में गड़ल एगो पत्‍थर के चौखटा बा, जेपर विभिन्‍न प्रकार के कलाकृति बनल बा. मान्‍यता ह कि गुप्‍तकाल में ए स्‍थान पर सैन्‍य छावनी रहे आ इ चौखटा महाराजा विक्रमादित्‍य से संबंधित बा. बतावल जाला कि जमीन में धँसल ए चौखट के बहरे निकाले खातिर कई बार एकर खुदाई कइला के प्रयास भइल लेकिन दैवीय कारणन से ए काम में सफलता ना मिलल. चौखट के नीचे भारी मात्रा में हीरा-जवाहरात मौजूद भइला के बात भी कहल जाला. सूर्य मंदिर के पासे में एगो बहुत पुरान इनार भी (कुंआ) भी मौजूद बा. ए इनार के भीतर भी हीरा-जवाहरात मौजूद भइला के बात कहल जाला आ ई मान्‍यता ह कि बाकी समय इ इनार भले ही सूखल रहो लेकिन मेला के समय एमें अपने आप पानी आ जाला.

अलग-अलग जाति क अलग-अलग मंदिर : जातीय संगम क अनोखा उदाहरण

गोंड जाति का मंदिर, देवलास

गोंड जाति का मंदिर, देवलास


ChauhanMandir
सूर्य मंदिर, मेला आ ऊपर बतावल गइल अन्‍य तमाम बातिन के अलावा देवलास के एगो अउर विशेषता बा जवन ए स्‍थान के अउर महत्‍वपूर्ण आ विशेष बनावेले. आ उ विशेषता इ बा कि देवलास पर सूर्य मंदिर के अलावा अलग-अलग जाति के अलग-अलग मंदिर विद्यमान बा आ ए मंदिरन में से कुछ त बहुत पुरान हवें आ कुछ के निर्माण पिछले कुछ दशक के दौरन भइल ह. सूर्य मंदिर के बगले में राजभर जाति क मंदिर ह त ओकरे ठीक सामने हरिजन जाति क मंदिर. चौहान, गोंड़, यादव, कुम्‍हार, धोबी, बनिया, लोहार आदि लगभग हर जाति के मंदिर इहां विद्यमान ह. क्षत्रिय समाज के लोग इहां महाराणा प्रताप क स्‍मारक बनवउले बा. अलग-अलग जाति के ए अलग-अलग मंदिरन में संबंधित जाति के आराध्‍य हिंदू देवी-देवतन क मूर्तिे स्‍थापित बा. 1923 में निर्मित गोंड़ जाति के मंदिर में भगवान शिव और गोंड़ जाति के आराध्‍य देव नाथू एवं कालू क प्रतिमाएं स्‍थापित ह. एही तरे हरिजन जाति के मंदिर में संत रविदास, लोहार समाज के मंदिर में भगवान विश्‍वकर्मा, धोबी समाज के मंदिर में ओ जाति के प्रेरणाश्रोत संत गोडसे पारखी, यादव समाज के मंदिर में राधाा-कृष्‍ण त वैश्य समाज के मंदिर में उनके समाज के संत गणिनाथ महाराज क मूर्ति स्‍थापित कइल गइल बा. सूर्य मंदिर क प्रबंधन आ संचालन जहॉं देवकली देवलास गांव (देवलास का पूरा नाम देवकली देवलास) के शाकद्वीपिय ब्राह्मण लोगन के हाथ में बा ओहीं दुसरे जाति के मंदिरन क देख-रेख आ ओमें पूजा-पाठ संबंधित जाति के पुजारी द्वारा होला. देवलास पर कबीरपंथी संतन क एगो मठ आ मंदिरो मौजूद बा. अनेकता में एकता आ जातीय संगम क बेजोड़ उदाहरण प्रस्‍तुत करे वाला इ मंदिर-मठ ए लिए भी महत्‍वपूर्ण हवे कि इ लोगन के बांटेला ना बल्कि जोड़ेला. कउनो भी मंदिर में केहू भी बिना कउनो रोक-टोक के आ जा सकेला. ए मंदिर-मठ के लेके आपस में कउनो मनमुटाव, टकराव, द्वेष चाहे वैर भावो ना बा. श्रद्धालु हर मंदिर में ओही श्रद्धा आ भक्ति के साथ सिर झुकावेला. संभवत: देवलास दुनिया क एकमात्र अइसन स्‍थान होई जहां अलग-अलग जाति के अलग-अलग मंदिर एक ही स्‍थान पर आस-पास में विद्यमान बा. देवलास के प्रति स्‍थानीय लोगन क श्रद्धा आ ए स्‍थान क पावनता एहु बात में देखाई देला कि देवलास बाजार में मांस-मछली-अंडा आदि के एक्‍को दूकान मौजूद ना ह.
संत रविदास मन्दिर

संत रविदास मन्दिर


लोहार जाति का मन्दिर

लोहार जाति का मन्दिर


संत गणिनाथ मंदिर

संत गणिनाथ मंदिर

कबीरपंथी मठ, देवलास

कबीरपंथी मठ, देवलास

घोर उपेक्षा क शिकार बा इ पर्यटक स्‍थल

महाराणा प्रताप स्‍मारक

महाराणा प्रताप स्‍मारक


देवलास आज आस-पास के लगभग दू दर्जन गांवन खातिर मुख्‍य बाजार आ शिक्षा अउरी आवागमन के प्रमुख केन्‍द्र के रूप में विकसित हो चुकल बा. सैकड़ों के संख्‍या में दुकान, दर्जन भर से भी ज्‍यादा विद्यालय के मौजूदगी, सड़क पर हरदम मोटरगाड़ी के आवाजाही आ भीड़भाड़ देवलास के धीरे-धीरे अपने आप ही विकसित हो गइला के कहानी कहेला. परन्‍तु एतना कुल विशेषता वाला आ एतना प्रसिद्ध इ पौराणिक स्‍थल आज ले घोर उपेक्षा क शिकार ह जबकि सच्‍चाई त इ ह कि अगर इहां के विकास पर ध्‍यान दीहल जाव त देवलास एगो प्रसिद्ध पर्यटन स्‍थल के रूप में विकसित हो सकेला. लेकिन बहुत दु:ख के बात बा कि ए स्‍थान से विकास बहुत देर बा. इहां पहुंचे क मुख्‍य मार्ग मुहम्‍मदाबाद-घोसी रोड ह परन्‍तु अधिकांश समय इ रोड क हालत बदतर ही बनल रहेले. सूर्य मंदिर सहित दूसरे मंदिरन तक पहुंचे खातिर जवन रस्ता बा उहो पूरी तरह से ठीक ना बा. पर्यटक लोगन के रुके खातिर न कउनो धर्मशाला ह न कउनो अउर व्‍यवस्‍था. सूर्य मंदिर प्रबंधन समिति के अध्‍यक्ष आ समाजसेवी विजय शंकर पाण्‍डेय क कहनाम ह कि अगर ए स्‍थान के पर्यटन स्‍थल के रूप में विकसित करे के तरफ ध्‍यान दीहल जाव त देवलास न खाली मऊ जिला क बल्कि प्रदेश के एगो प्रमुख पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो सकेला. लेकिन दुख के बात बा कि ए ओर समुचित ध्‍यान ना दीहल जात ह. हालांकि कुछ साल पहिले जिला पंचायत आ पर्यटन विभाग के ओर से सूर्य मंदिर के पास प्रकाश के व्‍यवस्‍था, एगो शेड आ सूर्यकुंड के किनारे सीढ़ी आ कामचलाऊ बेंच बनउले क काम कइल गइल ह परन्‍तु एतने पर्याप्‍त ना ह. ए पूरे स्‍थान के विकास क योजना तैयार क के ओके पूरी तरह से क्रियान्‍वित कइले क आवश्‍यकता ह.


देवकान्त पाण्डेय
ई मेल: devkant4u@gmail.com
मोबाइल: 8826717401, 9990134555
दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से हिंदी साहित्‍य में एम. ए. श्री देवकान्‍त पाण्‍डेय हिंदी आ भोजपुरी के मंचीय कवि हवें. उत्‍तर प्रदेश के मऊ जिला के मूल निवासी श्री पाण्‍डेय राष्‍ट्रीय स्‍तर के कई प्रतिष्ठित मंच से काव्‍य पाठ क चुकल हवें. इनकर कविता आ विभिन्‍न विषयन पर लिखल लेख कइ गो पत्र–पत्रिका में प्रकाशित भइल बा.

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