पश्चिमी वैश्वीकरण बनाम भारतीय विश्व कुटुम्बवाद

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’

JaiKantSighJai
पश्चिम के दू शब्द “वैश्वीकरण” आ “भूमंडलीकरण” बहुते लोकलुभावन आ मनभावन बा. एकरा बाहरी रुप,रंग आ सम्मोहक ढंग पर के नइखे रीझल. एकरा साम, दाम, काम, चाम आ भेद-विच्छेद से के नइखे घावाहिल भइल. निपट अनाड़ी से लेके अगड़धत पंडित पुजारी तक सभे एकरे पीछे व्यस्त, मस्त आ पस्त बा.

बुद्धिभोगी लोग त एकर विचार के प्रचारक ना बल्कि उद्धारक वाला खास लिबास में एकरा अचूक औजार मंच, माला, माइक, मनी, मीडिया आ मैनेजमेंट के जरिये दिन-रात घँस रहल बाड़े कि पश्चिमी वैश्वीकरण भा भूमंडलीकरण भारत के अति प्राचीन “वसुधैव कुटुम्बकम्” आ विश्व कुटुम्बवाद के आधुनिक रूप ह. एह विज्ञापनी विचार-प्रचार खातिर ओह लोग का पश्चिम का देशन से तरह-तरह के पुरस्कार आ उपहार मिलेला. अतने ना भारतीय जनसमुदायो ओह लोग के आधुनिक चिन्तक, विचारक, बुद्धिजीवी, समाज तारक-सुधारक कह कह के ऊंच
आसन देला.

भारतीय जनता एह वैश्वीकरण का संजाल, जंजाल आ मायाजाल में ओइसहीं लपटाइल-लटपटाइल आ लोभाइल- मोहाइल बिआ जइसे जानकी सोना के मिरगा बनल मायावी मारीच पर मोहाइल रहली. मायापति रामो ओकरा पर मोहा के बने-बने छिछिअइले आ का कुल्ह भइल से सभे जानऽता.

“भूमंडलीकरण” शब्द बेहारिक रुप में भूमंडीकरण के वाचक बा. ई बाज़ारीकरण वैश्विक छद्म संबोधन ह. ई अपना संगे उदारीकरण के मोहक शब्दजाल बीन के आ विज्ञापनी बाजारू हर हथकंडा अपना के अमेरिका आ यूरोप जइसन पूंजीवादी देशन के ऊ सांघातिक जघन्य रुपपाश बुनेला कि एकरा में फँस के कवनो देश, समाज, भाषा, संस्कृति वगैरह अपने आप के ओकरा हजुरा ओछ, तुच्छ आ हीन मान के अपने आप से घिनाये-दूराये लागेलें. एकर उद्देश्य बा अपना सुख, सुविधा, समृद्धि आ सुरक्षा खातिर दुनिया के नक्शा से आर्थिक रूप से गरीब छोट-बड़ देशन के निशान-पहचान कइल. जैविक रासायनिक आ परमाणुओ बम से ज्यादे विनाशकारी हथियारन से लैस कवनो आतंकवादी संगठन भा देवे से खतरनाक मोहिनी रूपवाली उदारीकरण भा भूमंडीकरण के सबसे मजबूत माध्यम बा इलेक्ट्रानिकी के विश्वजाल आ सूचना-संचार.

एह पश्चिमी उदारीकरण भा भूमंडलीकरण भा वैश्वीकरण के मूल में बा पूंजीवादी बेवस्था. पूंजीवादी बेवस्था के आधार बा बाजार. एही बाजार के ध्यान में राख के उदारवादी कहाएवाला यूरोप-अमेरिकी वैश्विक स्तर पर नीति बनावेला. जवना के मूल उद्देश्य होला अपना असीमित सुख-सुविधा-समृद्धि-सुरक्षा खातिर कवनो ना कवनो तरीका से कमजोर, गरीब आ गरजु देश का संसाधनन के दोहन-शोषण. भारतीय विश्व कुटुम्बवाद चाहे वसुधैव कुटुम्बकम् के आर्य जीवनदर्शन के आधार ह परिवार. ओकर अवधारणा सउँसे दुनिया में आत्मीयता के भाव भरे के मानवीय चिंतन से जनमल पारिवारिक संस्कारन से ओतप्रोत बा. एकरा में सचमुच के उदार चरित्र के बेवहारिक लक्षण नजर आवेला. भारतीय विश्व कुटुम्बवाद के अवधारणा जहाँ सउँसे दुनिया के एक परिवार मान के परस्पर संवेदनात्मक सम्पर्क, संवाद, सहमति, सहभाव, सहयोग, सहकार आ समन्वय आधारित वैश्विक परिवार संस्कार का मानवीय मूल्यन के स्थापित करेला उहँवे ई पश्चिमी उदारीकरण भा वैश्वीकरण के अवधारणा दुनिया के बाजार बना के सहयोग-सहकार के बदले असंवेदनशील प्रतिस्पर्धात्मक बाजारू व्यापार में हर एक चीज के दाम (कीमत) तय करेला.

भोजपुरी के एगो लोककथा में प्रसंग आवेला कि “अमूक राक्षस के प्रान सात समुन्दर पार पिजड़ा में बन्द सुग्गा में बसेला.” ओइसहीं एह पश्चिमी वैश्वीकरण भा उदारीकरण के प्रान बाजार में बसेला. बाजार के संरचना में प्रमुख रूप से पाँच तत्व मौजूद होला – उत्पादक, उत्पादन, उपभोक्ता, विज्ञापन आ बिचौलिया (दलाल). बाजार के पाँचो तत्व जेतने सुव्यवस्थित, समन्वित आ सक्रिय रही वैश्वीकरण ओतने पुख्ता आ प्रभावी होई. भारतीय सुसंस्कृत परिवार में जहाँ राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, विवेकानन्द, अरविंद, गाँधी, बिनोबा वगैरह जनम लेवेलें उहँवे आज के एह वैश्विक बाजारवाद के गर्भ से बिल गेट्स, अंबानी, मित्तल, जिंदल वगैरह पैदा होलें. एही बाजारवाद के असर बा कि आज व्यक्ति, समाज, देश आ दुनिया के बीच परस्पर स्नेह-सम्मान-सरधा के जगह स्पर्धा, सहकार के जगह दरार आ भरपाई के जगह खाई पैदा हो रहल बा. एकरा अपनन के ना खाली आपन चिन्ता होला. एह बेवस्था में जे जेतने लोभी, महत्वाकांक्षी, धूर्त, डाही, मक्कार, करनी-कथनी में बेमेल वाला होला ऊ ओतने ऊँच ओहदा आ मान-सम्मान वाला होखेला. बाजारवादी बेवस्था नव साम्राज्यवादियन के अचूक अस्त्र ह. एकरा हिसाब से दुनिये ना दुनिया से परे के हर चीजो बिकाऊ बा आ जदि बिकाऊ नइखे त ओकरो के बिकाऊ बनावल जा सकेला. ओकर जिद्द बा कि हम सउँसे दुनिया के बाजारू आ जोगारू बना के दम ली. आज कुछ निसोख गाँवन में जीवन यापन करत जनसमुदाय के छोड़ के बाकी दुनिया एकरा ‘मोनो कल्चर’ मतलब एकल अपसंस्कृति के प्रभाव में आ गइल बा. जवना में बहुराष्ट्रीय कम्पनियन के दुरात्मा बसेरा. लोभ जगाके लाभ कमाये वाली ई जीवन शैली जरुरत के अनुरूप माल पैदा ना करे बल्कि अपना विज्ञापनी बाजारू बेवस्था के जरिये जनता के जरूरत तय करत माल कीने-बेंचे खातिर मजबूर करेला. ई पइसा के बदौलत ईमान-धरम खरीद के घटिया के बढ़िया, गैरजरूरी के जरूरी, साधारण के असाधारण बता के सज्जनता, सुन्दरता, नग्नता, सफलता वगैरह सबके बेंच रहल बा.

(अबहीं अउर बा.)

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