फैसला का बाद के भारत

– पाण्डेय हरिराम

अबसे कुछ बीसेक साल पहिले अयोध्या के विवादित ढाँचा गिरा दिहल गइल रहे. ओह घरी कुछ ज्ञान गुमानी लोग, एहमें दुनु संप्रदाय के लोग शामिल रहे, चिचिया चिचिया के कहले रहुवे कि भारत के सामाजिक इतिहास बदलि गइल. कहे के माने कि ढाँचा गिरावे के पहिले के भारत आ गिरवला के बाद के भारत. इतिहास दू कालखण्ड में विभाजित हो गइल. अब हम कह सकीलें कि इतिहास के दू गो अउरी कालखण्ड बन गइल. पहिलका फैसला से पहिले के भारत आ दूसरका फैसला के बाद के भारत. पहिलका भारत में सनसनी रहे, एगो सहमल भाव रहे, एगो डेराइल चुप्पी पसरल रहे. फैसला का बाद के भारत में कुछ अउर ना त एगो आश्वासन त बा.

हालांकि ई फैसला स्थायी त नइखे काहे कि ई विवाद के मुद्दा रहले ना रहे कि रामलला केने रहले, सीता के रसोई केने रहे, आ मस्जिद कवना ओर रहे. बलुक मसला त ई रहे कि ओह भूखण्ड के मालिक के हऽ ? अदालत का फैसला के आधार आस्था बनावल गइल बा. हिन्दूत्व के पैरोकारन खातिर ई एगो बहुते बड़हन सफलता बा. एहसे उनका आन्दोलन पर न्याय के मुहर लाग गइल. तबो एक नजर देखला पर साफ हो जात बा कि न्यायाधीश निश्चिन्त ना रहले, उनको मन में संशय जरुरे रहे.

मसलहत अमेज होते हैं सियासत के कदम
तू नहीं समझेगा सियासत, तू अभी नादान है.

जहाँ तकले राजनीतिक पार्टियन पर एह निर्णय के सवाल ना त ऊ अभी पता ना चली. काहे कि सामाजिक व्यवस्था में भइल बदलाव का बाद एह मसला में नब्बे वाला गरमाहट त रहल ना. अतना जरुर हो गइल कि एह फैसला का बाद भारत के अस्तित्व, कानून, आ संविधान के साख जइसन सवाल सामने आ गइले. आजु हमनी के देश के सामाजिक ढाँचा पहिले से बेसी मजबूत हो गइल बा. लोग का मन में पहिले वाला आक्रोश नइखे. वइसे कुछ विश्लेषकन के राय बा कि एहसे दुनु सम्प्रदायन के कट्टरपंथियन के बल मिली बाकिर मौजूदा सामाजिक ढाँचा देखत अइसन सोचल गलत होखी कि कुछ ताकत फेर १९९२ वाला माहौल पैदा करे के कोशिश करीहन सँ. कट्टरपंथियन के ई मालूम बा कि गोहार बिटोरे के ओह लोग के क्षमता कमजोर पड़ गइल बा. इहे कारन बा कि फैसला का बाद ऊ ताकत कवनो आक्रामक तेवर ना अपनवले सँ. आजु का समाज में एगो समुझदारी बन गइल बा. एहिजा समाज से मतलब हिन्दू आ मुसलमान दुनु से बा. एही चलते फैसला का बाद कुछ हलकन में उपजल निराशा का बावजूद आक्रमकता नइखे झलकत, समाज में उदारता रच बस चुकल बा आ सभ लोग अमन शान्ति चाहत बा. लोग के अपना देश पर भरोसा बढ़ल बा.

ये सच है कि पाँवो ने बहुत कष्ट उठाये
पर ये पाँव किसी तरह राह पर तो आये.

ई साँच बा कि गोड़ के बहुत कष्ट भइल बा
बाकिर ई गोड़ कसहू सही राह पर त आइल


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी. अँजोरिया के नीति हमेशा से रहल बा कि दोसरा भाषा में लिखल सामग्री के भोजपुरी अनुवाद समय समय पर पाठकन के परोसल जाव आ ओहि नीति का तहत इहो लेख दिहल जा रहल बा.अनुवाद के अशुद्धि खातिर अँजोरिये जिम्मेवार होखी.