Ashutosh Kumar Singh

– आशुतोष कुमार सिंह

आदमी के सुभाव बुझल बहुते कठिन बा. एकरा के जेतना गहराई से बुझे के प्रयास करीले, ओही अनुपात में अउरी अनबुझाह होत चलि जाले. बाकिर पिछला (30 सितम्बर 2010) के आंखि का सोझा एगो अइसन घटना घटल कि एह मानवीय स्वभाव के समुझे के एगो अउर अवसर मिल गइल. दुपहरिया से लेके रात 8 बजे ले अयोध्या मामला के रिपोर्ट देखे खातिर टीवी सेट प नजर चिपकवला के बाद, दिल्ली के सुरत-ए-हाल देखे के विचार मन में आइल.

मयूर विहार फेज 2 से बदरपुर (जहवां हमार भइया रहेनी) जाए खातिर रुट संख्या 534 के बस से महारानी बाग पहुंचनी. इहे रात के 9 बजत होई. सड़क प चहल-पहल ओइसन ना रहे, जइसन अमूमन होखेला. एगो विरान… सुस्ताइल सड़क. जवना बस में बइठल रहनी बमुश्किल 10-12 गो लोग रहल होइहें. रास्ता में दुकान खुलल लउकत रहली जा, बाकिर खरीददार नदारद रहन. कारण त रउआ लोग बुझिए गइल होखब, 60 साल पुरान अयोध्या मसला प फैसला के दिन जे रहे. हालांकि ओह समय तक फैसला आ चुकल रहे. ना केहू हारल रहे अउर ना केहू के जीत भइल रहे. तबो कवनो अनहोनी के अनेसा लोगन के अपना-अपना घरन में कैद होखे प मजबूर क देले रहे. दिल्ली के सड़कन प जवन लोग नजर आवत रहे उनका मन में भय के कहीं कवनो भाव ना रहे. भारत के नागरिकन के परिपक्वता झलकत रहे. ठीक ओइसहीं जइसे कि एनडीटीवी प पंकज पचौरी, रवीश कुमार अउर कमाल खान के रिपोर्टन में झलकत रहे.

खैर, हमरा आश्रम मोड़ से बदरपुर खातिर बस पकड़े के रहे एह से हम 534 न॰ के बस से महारानिए बाग उतर गइनी. ओहिजा से आश्रम मोड़ महज 200 मीटर के दूरी प बा. हम पैदले जात रहनी. अचानक एगो बाइक दुर्घटना ग्रस्त हो गइल. ओकरा जद में एगो साइकिल सवारो आ गइल. बाइक प दू गो युवक रहन, एगो के सिर में चोट लागल, ऊ बेहोश हो गइल. दूसरका के कम चोट लागल रहे, ऊ उठल अउर सीधे गाली देत साइकिल सवार के ओरि लपकल. तब ले हम अउर कुछ अउर राहगिर ओहिजा पहुंच चुकल रहनी. बाइक सवार के डांट के ओकरा के आपन दोसर साथी के अस्पताल ले जाए के सलाह देहनी जा. एही बीच हम स्टैंड में खड़ा दिल्ली पुलिस के एगो सिपाही के बोला के ले अइनी. ऊ आके पीसीआर(पुलिस कंट्रोल रुम) के फोन कइलस. एही बीचे बेहोश पड़ल दूसरका बाइक सवार के होश आ गइल. ऊ दूनों जाए के जिद करे लगलन स. पुलिस वाला ओकनी के जिद के कारण ओकनी के जाए देलस. 12-13 मिनट बितल होई कि पीसीआर वैन आ गइल, बाकिर ओकरा बैरने लौटे के पड़ल. हम साइकिल वाला से पूछनी, भैइया रउआ ठीक बानी नू… ऊ जवाब देलस- हं, अउर बिना देर कइले एगो सवाल दगलस – “रउआ सब ओह दूनों के जाए काहे देनी ह, हम ओकनी से कुछ पइसा लेतीं !! ई सुनके हम चकरा गइनी.

ऊपर के दूनों घटना हमरा के ई सोचे प मजबूर क देलस कि आजु आदमी के रुपिया केतना मजबूर क देले बा. तनी सोचीं, जवना हाल में साइकिल सवार (अबहीं कुछे क्षण पहिले ऊ मौत के चंगुल से निकलल रहे) रहे, ओह हाल में अगर ओकरा आपन सही सलामत बच जाए जेतना खुशी ना रहे, ओह से कहीं जादा निराशा ओह दूनों के छोड़ल जाए से रहे. ऊ मौत के चंगुलो में कुछ रुपिया के चाह राखत बा. ई सोचे वाला बात बा कि ऊ कवना तंगहाली से गुजरत होई ? ई कवनो इंसान के तंगहाली के चरमे नू बा कि, जहवां ऊ आपन मौत के सदमो में रुपिया के चाह रखे के साहस जुटा पावत बा. दोसर ओर तनी धेयान दीहीं पहिलका घटना प जब एगो दोस्त आपन चोट खाइल दोस्त के चिंता छोड़के एगो साइकिल वाला के मारे खातिर (जवना में ओकर दबंगई के झलक लउकत बा ) लपकत बा. ओह युवक (उमिर 20-22) के व्यवहार के हमनी के आपन मध्यवर्गीय समाज के व्यवहार के (प्रतिकात्मक) रूप से देख सकीले जा. जवन कि आपन गलतियन के माने खातिर तइयार नइखे. निम्न मध्यम वर्ग से मध्यम वर्ग के श्रेणी में पहुंचल अइसन लोग समाज में आपन कुंठा देखावे के कवनो मौका नइखन छोड़े के चाहत. शायद इहे कुंठा ओह युवक के एगो असहाय साइकिल सवार प हाथ उठावे खातिर प्रेरित करत रहे.

मानवीय व्यवहार के एह रंग के देखके हम खुद सदमा में बानी, जहवां प आदमी खातिर रुपिया साध्य हो गइल बा. शायद एही तरह के कवनो अनुभव के बाद वेस्ट के राजनीतिक विचारक मैकियावेली के मानव स्वभाव के बारे में ई कटु सांच कहे खातिर मजबूर होखे के पड़ल होई कि, ‘मानव आपन बाप के मौत के जिम्मेदार आदमी के त माफ क सकेला, बाकिर आर्थिक नोकसान पहुंचावे वाला के ऊ हरगिज माफ नइखे क सकत.’

खैर, अयोध्या प फैसला अइला के बाद के दिल्ली के देखे निकलल रहनी, जवन कि देख लेहनी, जी भर के… अउर ई त कहिए सकत बानी कि मंदिर-मस्जिद के मसला प दिल्ली वालन के दिल प अब राज़ त नइखहीं कइल जा सकत. हालांकि, ई मामला कबहूं सबसे बड़ न्यायालय में आ सकेला. अउर अंतिम फैसला में अबहीं बहुत देर लाग सकेला. बाकिर एगो बात त तय हो गइल बा कि भारत के हिंदू-मुसलमान मंदिर-मस्जिद के नाम प लड़े खातिर एकदम तइयार नइखन.


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