कवन अभागा गाँजा बोवलसि हो/पियवा बउरा गइलें. कवन पापी घोर के पियवलसि हो/पियवा बउरा गइलें. ना ना, हम आजु फगुआ गावे नइखीं आइल. ई त बस फागुन के महीना हा पिछला हफ्ता देश के हालात पर बेरबेर ई फगुआ याद आवत रहल से सोचनी कि काहे ना आजु बउराइल आ बाउरे पर चरचा कर लीं.

बाउर माने खराब, गलत आ बउरा माने पागल भइल, मतिहीन भइल, बुद्धि भुलाइल. बाउर कवनो जरूरी नइखे कि बउरा के बाउर बनल होखे. ऊ त सुभावे से बाउर हो सकेला. आ बउराइल जाला कवनो कारण से, कवनो नशा से, कवनो बेमारी से. बाकिर सोचे वाली बात बा कि हमरा ऊ फगुअवा काहे याद आवत रहल. अतना त रउरो जानते बानी कि ओह लाइन का पीछे जरूर कवनो कहानी बा तबे आजु फगुआ से शुरूआत कइले बानी. काहे कि फागुन के महीना होखला का बावजूद मौसम के मनमिजाज आ शहर के हवा अतना बउराइल बा कि फगुनहट कब बहल, बहल कि ना से पते नइखे चलत. बस इहे मान के संतोष कर लेबे क बा कि फागुन क महीना ह त फगुनहटो बहते होखी, अलग बात कि ओह बेरा आदमी अपना घर में पड़ल होखे. काहे कि केहू ना केहू त ई फगुनहट लगबे कइल रहे जे सरकार सोचे लागल कि सोरह साल के लइकी के सेक्स सकारे लायक मान लिहल जाव. सोरह साल के लइकी शादी ना कर सके, गाभिन भइला प एबार्शन ना करवा सके, वोट ना डाल सके बाकिर सेक्स करवा सकेले. ओह दिन टीवी पर बहस सुनत रहनी त एगो नेतइन के कहना रहल कि रउरा सभे जान बूझ के मुद्दा अझुरावत बानी. सेक्स आ शादी अलहदा मुद्दा ह. सेक्स उमिर के जरूरत होले जबकि शादी जिम्मेदारी. सोचनी कि केहू ना केहू उनुका के एह ला टोकी बाकिर केहू ना टोकल. से हमरे एह जरूरत आ जिम्मेदारी के बहस आगे बढ़ावे के पड़त बा. ओह नेतइन से पूछे चाहत रहुवे कि चुनाव लड़ल त नेता नेतइन लोग के जरुरत होले जबकि वोट डालल जनता के जिम्मेदारी. फेर वोट में काहे उलटा बा कि अठारह साल के आदमी औरत वोट दे सकेले बाकिर चुनाव लड़े के उमिर पचीस साल होखे के चाही. एहीजा त जिम्मेदारी वाला उमिर कम बा आ जरूरत वाला उमिर बेसी. सेक्से का तर्ज पर सरकार काहे नइखे कर देत कि सोरह साल में चुनाव लड़ सकीलें बाकिर वोट डाले खातिर कम से कम पचीस साल के होखल जरूरी बा. आखिर वोट डालल जिम्मेदारी के काम होला. हँ कि ना?

खैर गनीमत अतने बा कि आजु जब बतकुच्चन करे चलल बानी त सगरी नियम कानून बदल के संसद में विधेयक पेश भइल बा. अलग बाति बा कि तबले दोसर केहू दोसरा कवनो मुद्दा के गाँजा पी लिहले बा आ सरकार फेरू बउरा गइल बिया. बाकिर चलत बेरा हम इहे गावत जाएब कि सदा आनंद रहे एही द्वारे मोहन खेले होरी हो, एक ओर खेले कुँअर कन्हाई एक ओर राधा गोरी हो! काहे कि अगिला बेर जब भेंट होई तब ले फगुआ बीत चुकल रही आ …

Advertisements