पान सड़ल काहे, घोड़ा अड़ल काहे, रोटी जरल काहे, लईका बिगड़ल काहे ? एह चारो सवाल के एके जवाब कि, फेरल ना गइल. पान के पत्ता के बारबार पलटत रहे के पड़ेला, ना पलटब त सड़े लागी. घोड़ा के बीच बीच में दउड़ावत रहे के पड़ेला, आदत छूट जाई त बीचे में अड़े लागी, रोटी के बीच बीच में तावा पर पलटत रहे के पड़ेला, ना त जर जाई आ लईका के हमेशा रगड़त रहे के पड़ेला ना त ऊ बिगड़ जाई.

ई त रहल पुरान कहावत जवन अचानक तब याद आ गइल जब यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश तमिलनाडु के मुख्यमंत्री से भेंट करे गइलन.उनकर मकसद रहल कि जयललिता से तिसरका मोर्चा बनावे का बारे में राय मशविरा कइल जाव. अब एहिजा सोचे के बात बा कि अखिलेश तीसरा मोर्चा के फेर में गइल रहलन कि फिराक में? फेर में आदमी तब पड़ेला जव कवनो बात ओकरा मन माफिक ना हो के उलटा हो जाव आ आदमी के फेर में, परेशानी में, डाल देव. फिराक में तब रहेला आदमी जब ऊ कुछ करे के, पावे का चाह में होखे. त अखिलेश फेर में नइखन पड़ल अबहीं, अबहीं ऊ फिराक में बाड़न कि कवना तरह एगो तिसरका मोर्चा बना लिहल जाव. हालांकि फेर त कुछ ना कुछ के बा जरूर. ना त तिसरका के फिराक में रहला के का जरूरत रहुवे. अब एहिजा सोचे के बात ई बा कि आखिर जब उनकर राजनीतिक गोल पहिलका मोर्चा का संगे जुड़ल बा त तिसरका के फिराक में काहे बाड़े. बाकिर राजनीति फेर आ फिराक के खेल हो गइल बा.

सरकार जब फेर में पड़ेले त ऊ एह फिराक में आ जाले कि कइसे कवनो विरोधी नेता के फेरा में डाल के आपन काम बना लिहल जाव. आ विपक्ष त हमेंशा एह फिराक में रहबे करेला कि सरकार भा मंत्री कवनो गलती करसु आ ऊहे लोग फेरा डाल देव. हिंदू शादी में फेरा के बहुते महत्व होला आ कनिया दुलहा एगो ना सात गो फेरा लगावेला अगिनदेव के साखी राखत. साखी माने कि गवाही. बाकिर साखी जइसन एगो शब्द अउर होला जवना के साख कहल जाला. जवना आदमी के साख खतम हो जाव ओकरा साखी के कवनो मतलब ना रह जाव. हालांकि गवाही साखी खातिर ओकरो के बोलावे के कायदा रहल बा जेकरा पर कवनो अछरंग लगावल गइल होखे. बाकिर कुछ संस्था अइसनो हो गइल बाड़ी स जवन दोषी के बिना ओकरा के जवाब के मौका दिहले दोषी ठहरा देले आ जेकरा सफाई देबे के चाहीं ओकरा के साफ बचा ले जाले ई कहि के कि फलनवा के साखी के कवनो जरूरत नइखे. फेरू अब बाकी लोग जवन चाहे कहे बाकिर सेवक अपना मालिक के फेर में ना पड़े देव. मालिक मलिकाइनो के जिम्मेदारी होला कि अपना सेवक बराहिल मैनेजर के कबो कवनो फेर में ना पड़े देव आ जब ओकरा पर आफत आवत लागो त ओकरा सोझा ढाल बनि के खड़ा हो जाव. अब एह फेर में जनता के कतना फेरा घूमे के पड़ी एहसे का मतलब.

हमहूं देखीं ना फेर का फेरा में कहाँ से कहाँ चलि अइनी. अब चलत बानी अगिला हफ्ता खातिर मुद्दा खोजे का फिराक में.

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