हुकहुकी चलत बा. केकर? अब का कहल जाव कि केकर. ओने सरबजीत के त एने सरकार के. कब साँस रुक जाई केहु नइखे जानत. आ साँच कहीं त साँस त कब के रुक गइल बा. बस वेंटिलेटर के सहारे साँस चलत बा. केहु के वेंटिलेटर मशीन से, त केहु के बाहर से मिलल समर्थन से. ना त जियत बा आदमी ना मरे दिहल जात बा.

हुकहुकी चलल तब कहल जाला जब कवनो जीव के मरे के समय के लक्षण लउके लागे. डाक्टरो तब दवा का जगहा दुआ करे के बात करे लागेलें. पहिले जब वेंटिलेटर के सुविधा ना रहत रहे त साँस रुकला का कुछ देर बाद मौत हो जात रहुवे. अब वेंटिलेटर का सहारे साँस अनन्त काल ले चलावल जा सकेला. बाकिर ओहसे का आदमी के जियत मान लिहल जाव? ना. एक समय अइसन आवेला जब ब्रेन डेथ के बात उठे लागेला. ब्रेन डेथ के मतलब कि अब ओह आदमी के जिए के कवनो संभावना नइखे बाचल. सरकारो के लागत बा ब्रेनडेथ वाला हाल हो गइल बा.

बाकिर ब्रेन डेथ का बादो कवनो हुटहुटी नइखे लउकत कवनो तरफ, बस हुटुकत बा लोग. सवाल बा कि अब एह हुटुकी के फायदा का? अब का ओढ़ावेलऽ चदरिया हो चलन का बेरिया? जब समय रहल तब त ना कुछ कइलऽ अब जब महाप्रयाण के समय आ गइल बा तब कवना बात के हुटुकल ? सरकार त अपने जाल में अस अझुराइल बिया कि ओकरा से निकले के राह नइखे लउकत. बाकिर राजनीति में घुसला से पहिले चलीं तनी हुटुकल का बारे में हुटुक लिहल जाव. हुकहुकी के मतलब त साफ होइए गइल होखी. आखिरी समय जीव में जवन लक्षण लउकेला ओकरे के हुकहुकी कहल जाला. तब साँस कबो चलत बुझाला त कबो लागेला कि रुक गइल बा. एही में एगो उलटा साँस के हालत होला. उलटा साँस में साँस साँस लेबे के मकसद ना पूरावे. बस हो जाले.

हुकहुकी का बाद हुटहुटी के जिक्र भइल. हुटहुटी माने घबराहट. बुझाव ना कि का करीं आ ओही हुदबुद में हुटुकी आ जाले. हुटुकी माने हिचकी. हिचकी में साँस लेबे के कोशिश त होला बाकिर हवा भीतर ना जा पाए बीचे में कहीं अटक जाले. लागेला कि गरदन का नीचे बढ़ते नइखे. हिचकी छोड़ावे के कई तरह के तरीका आम लोग में प्रचलित बा. बाकिर सब ले पक्का तरीका होला कि नाक में दू बूंद बरफ के पानी डाल दीं. अगर हिचकी का पीछे कवनो बड़हन बीमारी नइखे त हिचकी बंद हो जाई. वइसे अचके में कुछ अइसन कह दिहल जवना से हिचकी लेबे वाला आदमी सकपका जाव, उहो काम कर देला. अब एही सब से मिलत जुलत शब्द होला हुड़काह. हुड़काह ऊ जे छेड़छाड़ करे, हड़कावे. हालांकि हुड़ुक भा हुड़ुका एक तरह के बाजा होला जवना के नाच वगैरह में बजावत अबहियों देखल जा सकेला. हुड़ुक के बात निकलल त हुड्ड कइसे छूट जाव. हुड्ड माने गँवार, जंगली, उदण्ड. अब अलग बात बा कि समाज के बहुते हुड्ड जन प्रतिनिधि बने लागल बाड़ें. आ जहाँ हुड्डन के गिनिती बढ़ जाव त ओह हुड़काहन से सरकार के हुकहुकी चले भा ना समाज में हुटहुटी त होखहीं के चाहीं.

अब एहसे पहिले कि केहु हमरा के हड़कावल शुरु कर देव, हमरा के चले दीं सभे. फेर भेंट होखी.

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