ना अँवटब, ना पवढ़ब, ना दही जमाएब. दूधवे उठा के पी जाएब, एके ओरहन रही. बात सही बा. रोज रोज के तकरार, ओरहन, तंज से तंग आ के कवनो चाकर, कवनो सरकार, कवनो भतार एह तरह के फैसला कर सकेला. अब एह पर चँउके के कवनो जरूरत नइखे कि भतार शब्द के प्रयोग काहे भइल. भतार ना त फूहड़ शब्द ह ना अश्लील. ना एकर कवनो गलत मतलबे निकलेला. पति पर पतियाइल ना जा सके भोजपुरी में. पतियाइल के मतलब होला केहु के भरोसा में लिहल भा केहु पर भरोसा कइल. पति ला भोजपुरी में सबले सही सटीक शब्द भतारे हो सकेला, हालांकि आम बोलचाल में पति खातिर मरद आ आदमीओ के इस्तेमाल होखल करेला. फलनिया के मरद, फलनिया के आदमी. बाकिर मरद आ आदमी सकल पुरुष वर्ग खातिर इस्तेमाल हो सकेला. जबकि भतार बस एके तरह के आदमी के कहल जाला. पच भतरी सत भतरी द्रौपदीओ के मामिला में ई बात सही रही. जइसे एक आदमी के कई गो मेहरारू हो सकेला ओही तरह एक औरत के कई गो भतार. बात एहिजा कानूनी भा गैरकानुनी के नइखे होखत. पुरुष प्रधान समाज में बहुपत्नी प्रथा के सही मान लिहल गइल बाकिर औरतन खातिर पतिव्रता के शर्त पर बेसी जोर डाल दिहल गइल.

खैर बात होखत रहुवे भतार के. भतार शब्द संस्कृत के भर्तार से बनल बा. भर्तार मतलब स्वामी, मालिक, पति होला. आ एगो व्यावहारिक मतलब जे भरे, माँग भरे, पेट भरे, गहना के संदूक भरे, जरूरत भा चाह भरे पुरावे. पता ना काहे त पति मे त जोड़ते ओकरा के पतित मान लिहल जाला. कहीं अइसन त ना कि पति त पतित होखबे करेला. कहाँ अपना जिनिगी के मालिक रहुए कि शादी करते, मेहरी ले अवते पतित हो गइल अपना गद्दी से. भर्तार से भृत्य बन गइल. आ मेहरी का बारे में ई मत सोचीं कि ई फारसी शब्द ह जवन मेहर से बनल. काहे कि अव्वल त इहे पता नइखे कि मेहर से मेहरी बनल कि मेहरी से मेहर. मेहर संस्कृतो के शब्द ह जवना के मतलब होला दया, कृपा, मेहरी दाई भा दासीओ के कहल जाला आ मेहरारूओ के. सोचीं कि मेहरी रउरा पर दया करत बिया कि रउरा ओकरा पर.

भरता के तुक करता से मिलेला आ भर्ता के कर्ता से. भरता चोखो के कहल जाला. उबाल के, उसीन के, मसल के बना दिहल चोखा. अब एह लिट्टी चोखा वाला चोखा आ रंग चोखा वाला चोखा में बहुते फरक होला. रंग वाला चोखा चक्षु से उपजल, जवन चक्षु के नीमन लागो तवन चोखा, रंग वाला चोखा आ जवन जीभ के नीक लागो तवन लिट्टी वाला चोखा. चोख धारदारो के कहल जाला, छुरी बहुते चोख बा चोख संस्कृत के चोक्ष से उपजल जवना के मतलब होला शुद्ध, धारदार, तेज, बिना मिलावट के. अब देखीं कि बात बहकि के कहाँ से कहाँ चलि आइल. चोखा कुछऊ होखे पोढ़ ना होखे के चाहीं. पोढ़ मतलब होला गाढ़, कठोर. पोढ़ हालांकि प्रौढ़ से बनल जवना के उमिरदराज लोग खातिर इस्तेमाल होखेला. बाकिर प्रौढ़ के मतलब होला गाढ़, कठोर, गंभीर, आ शायद अनुभवीओ. आदमी जस जस बढ़त जाला जिनिगी के अनुभव ओकरा के पोढ़ बनावत जाला जइसे कि दूध जस जस अँवटात जाला तस तस गाढ़ कठोर होत जाला. चलीं आजु अतने पर बस कइल जाव काहे कि दूध देर ले अँउटल जाई त पहिले त ऊ खोआ बनी बाकिर फेर जर के राखो हो सकेला. त आज के आँच एहिजे बन्द कइल जाव, गैसो त बहुत महँग हो गइल बा.

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