सोचऽतानी कि अगर एके जइसन मतलब वाला कई गो शब्द ना रहीतन स त हमार बतकुच्चन कइसे चलीत. पिछला दिने ट्वीटर पर एगो सवाल मिल गइल. पूछाइल रहे कि कैमरा के हिन्दी का होई. अब फोटो खींचे वाला कैमरा के त आम बोलचाल में हिन्दीओ में कैमरे कहल जाला बाकि सवाल पूछे वाला एकरा बदले कवनो हिंदी के शब्द सुनल चाहत रहलें जइसन कि कुछ शुद्ध हिंदीवादी रेलगाड़ी के लौहपंथगामिननी कहल चाहेलें. याद आवत बा एगो अइसने हिंदी प्राध्यापक प्रलयंकर जी के जे अपना शुद्ध हिंदी से विद्यार्थियन का दिमाग पर प्रलये ले आ देत रहलें. एक बेर जब साइकिल के चक्का टेढ़ हो गइल रहे त चहुँपल रहले मिस्त्री का लगे आ कहलन कि, हे द्विचक्र अभियन्ता, मेरे द्विचक्री वाहन का अगला चक्र वक्र हो गया है इसे सुचक्र करने का पारिश्रमिक कितना लोगे?” ऊ बेचारा मिस्त्री प्रोफेसर साहब से अतने कह पवलसि कि, “महाराज, हमरा अंगरेजी ना आवे. हिंदीए में बताईं.”

खैर, चलीं लवटल जाव कैमरा पर. अब एकरा ला तरह के तरह के शब्द सामने आइल. केहू कहल चित्रखींचक यंत्र, त केहू कहल चित्रपट यंत्र, त केहू सीधे चित्रयंत्रिका. हमहू सोचनी कि काहे ना हमहू आपन बतकुचनी बुद्धि के इस्तेमाल कर घालीं से हमहूं एगो शब्द बता दिहनी छविग्राही. बाकिर कुछ लोग एकरा के चित्रग्राही कहल चाहल. हम सोचे लगनी कि चित्र आ छवि में का फरक होला, होखबो करे कि ना? फोटो ला छायाचित्र, चित्र, छवि, प्रतिविम्ब जइसन कई तरह के शब्द मन में घूमड़ल. बाकिर पता ना काहे हमरा फोटो ला सबले सटीक शब्द लागल छवि. अलग बात बा कि कई जगहा छवि के मतलब सिनेमो से लिहल जाला आ सिनेमाघर खातिर छविगृह शब्द के इस्तेमाल होला. चित्रगृह नइखीं सुनले बाकिर सिनेमा के परदा ला चित्रपट जरूर सुने के मिलेला छविपट केहू ना कहे. चलचित्र सुनले बानी चलछवि नइखीं सुनले. हालांकि चित्र के इस्तेमाल पेंटिंग भा रेखाचित्र खातिर कइल बेसी सटीक लागेला हमरा. शब्दचित्र ला शब्दविम्ब के इस्तेमालो नइखीं सुनले हालांकि शब्दविम्ब में कवनो गलती नइखे बूझात हमरा.

ले दे के हम अबहीं ले अझूराइल बानीं कि कैमरा खातिर कवन शब्द सही आ सहज इस्तेमाल जोग हो सकेला. काहे कि शब्दन के प्रकृति होला कि ओकरा से कवनो अर्थ निकले. अगर अर्थ नइखे निकलत त ऊ शब्द ना होके आवाजे भर रहि जाई. ओही तरह यंत्र भा साधन में दिमाग अझूरा के रहि जाता. यंत्र कवनो काम करे वाला साधन के कहल जा सकेला बाकिर गहिरा सोचीं त यंत्र कवनो काम निर्देश भा संचालन का हिसाब से करेला जबकि साधन बस साधन भर रहेला कुछ करे ना. यंत्र में कई तरह के साधन हो सकेला. जइसे कि चाराकाटे वाला साधन खातिर यंत्र कहल जा सकेला बाकिर ओकर हैंडल, गँड़ासा, चक्का वगैरह अलग अलग साधन होलें. हालांकि लिखत लिखत अब हम अउरी अझूरा गइल बानी.

एक तरफा संवाद संवाद ना होखे. ऊ संबोधन भा निवेदन भर होला. संवाद में दुनु तरफ से वाद, कहल सुनल, होखल जरूरी होला. हालांकि खबरो खातिर संवाद के इस्तेमाल होला आ एह संवाद आ ओह संवाद में बहुते अंतर देखल जा सकेला. जइसे कि आतंकी खातिर कवन शब्द सही होखी भोजपुरी में, हमरा बुझात नइखे. उत्पाती, बवाली, अनेरिया, खुराफाती वगैरह कई गो शब्द दिमाग में आवत बा बाकिर एहमें से कवनो आतंक का नियरा नइखे चहुँप पावत. अतना दिन से बतकुच्चन करत आवत बानी बाकिर रउरा लोग कुछ कहते नइखीं. आ एही चलते हमहूं शिन्दे का बयान पर कुछ नइखीं बोलत हालांकि बहुते कुछ कहे के मन करत बा.

By Editor

3 thought on “बतकुच्चन – ९६”
  1. शब्दन के खेल में राउर बतकुच्चन बड़ा माहिर बा।
    रउओ कम नहिखी। बाते बात में ढेर बात कहे खातिर हम त इहे कहेब-
    ‘न जरिया, न जर है।
    इसलिए-
    नजरिया नजर है।।’

  2. राउर बतकुच्चन एगो एइसन सकारात्मक चिंतन बा जवने के तुलना तप (तपस्या–अउर उ हो ओ तपस्या से बा जवन ब्रह्म की प्राप्ति खातिर होखो) से कइल जा सकेला। काहेंकि शब्द के ब्रह्म कहल गइल बा..कहल नइखे गइल शब्द यानि ब्रह्म ही। त अगर हम जवने भी तरे बतकुच्चन से जुड़तानी..त हमरा इ हे लागेगा की हम ब्रह्म की चिंतन में लागल बानी।। आभार।।

  3. संपादकजी,
    ए बेरी के राउर बचकुच्चन घाल-मेल हो गइल बा…हम ए से कहतानी की हमरो सर चकरिया गइल बा..बात रउआँ उठवनी कैमरा से अउर नीचे ए ही में शिंदेजी के फोटो खींचे लगनीं…..पर हम त इ कहबि की ए बेरी के बतकूच्चन बहुते मजेदार बा…..अउर एतना अझुरा गइल बा की पते नइखे चलत की कहाँ से सुरु करीं…खैर…
    हमरी खेयाल से कैमरा के कमरे रहे देहल ठीक बा पर अगर हिंदी चहबे करी त राउर विचार एकदम उचित बा…यानि छविग्राही..काहें की एकर सबसे बड़हन कारन इ बा कि छवि के दायरा कम बा चबकि चित्र के बहुत बड़हन…हमरी खेयाल से छवि बी एक तरह के चित्र होला…जइसे कि कलपना में भी चित्र उकेरल जा सकेला पर छवि ना..हँ छवि मन आदि में भी बन सकेला पर एकरा खातिर कवनो आधार होखे के चाहीं…जइसे चित्रकार भगवान आदि के भी चित्र बना देला जवने के उ देखले नइखे..कलपना क के…केहू नेता आदि के पेंटिंग क के चित्र बनावल जा सकेला पर हम इहे कहबि के जवने चीज के कवनो यंत्र आदि की सहायता से चित्र निकालल जाव उ छवि होई..जइसे कैमरा आदि से पर अगर रउआँ केहू महात्मा, जंगल आदि की छवि के ध्यान में रखि के पेंटिंग आदि वनावतानी त उ पेंटिंग चिळ होई न कि छवि…त हम इ हे कहबि की चित्र के दायरा बड़ा बा अउर छवि के छोटा…हँ..इ हो सही बा कि कहीं-कहीं छवि अउर चित्र समानार्थी भी होई पर एगो अर्थ में पर इ दूनू अलग-अलग अर्थ भी दी लोग।।

    फोटो के रउआँ छवि कही सकेनी पर चित्र ना हँ..अगर रउआँ चित्र कहेके बा त ए में रउवां छाया जोड़े के पड़ी यानि छाया-चित्र…त फोटो के पर्यायवाची होई…छवि, छाया-चित्र…सादर..जहाँ ले दिमाग दउड़ल उहाँ ले दउड़वनी…धन्यवाद।

कुछ त कहीं...

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.