– पाण्डेय हरिराम

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहले बाड़न कि भ्रष्टाचार एगो चुनौती बा आ हमनी के एकर सामना पूरा ताकत से करे के होई. कहलें कि सरकार के उम्मीद बा कि लोकपाल विधेयक संसद के मानसून सत्र में पेश कर दिहल जाई. इहो कहलन कि मौजूदा हालात में लोग के बर्दाश्त करे के ताकत कम हो गइल बा, लोग तत्काल आ एगो अइसन कार्रवाई चाहत बाड़े जवना से दोसरा के सबक मिले. सब ठीक बा. प्रधानमंत्री जी लोकपाल बिल के समर्थन में आपन राय बता दिहले, सोनियो जी अण्णा हजारे के चिट्ठी लिख के आपन समर्थन भेज दिहली. देश के जनतो कमोबेश ओह बिल के साथ बिया भा अइसे कहीं कि सभे चाहत बा कि भ्रष्टाचार मेटावे खातिर कवनो ठोस ठोस व्यवस्था होखो. बाकिर अगर सरसोए में भूत हो जाव त का होखी.

अण्णा हजारे जवना टीम के विधेयक के मसौदा बनावे खातिर चुनले, दुनिया के ऊ टीमे ईमानदार नइके लउकत. ओह टीम के दू गो सबले पोढ़ आ कानून के जानकार सदस्य शांतिभूषण अउर प्रशांत भूषण रोज-रोज नया स्कैंडल्स में फंसत दिखाई पड़त बाड़े. अब ऊ सही बाड़े कि गलत, एकर फैसला समय करी, लेकिन फिलहाल लांछन त लागिये गइल. जन लोकपाल बिल ड्राफ्ट करे खातिर बनल समिति के सह अध्यक्ष शांति भूषण के पाक-साफ होखे पर उठत सवाल अउर गहिरा गइल बा. ऊ चउतरफा घेरात जात बाड़े आ समिति से उनुका इस्तीफा के मांग उठे लागल बा. शांति भूषण पर इलाहाबाद में करोड़ों के प्लॉट के खरीद में स्टांप ड्यूटी चोरी के आरोप बा आ एह मामिला में उनुका के नोटिसो जारी भइल बा. हालांकि अबही ले प्रशांत भूषण एह आरोपन से इनकार करत आइल बाड़े कि ऊ स्टांप ड्यूटी के चोरी कइले बाड़न बाकिर स्टांप ड्यूटी चोरी का आरोप में जारी भइल नोटिस के कॉपी मीडिया में आ गइला का बाद इनकर मुश्किल बढ़ सकेला. चरित्र हनन अभियान का तहत जवना तरह से कांग्रेस के कुछ हलका से शान्ति भूषण के सम्पत्ति संबंधी बयान आवत बा ऊ निराधार नइखे. एही बयानन का वजह से कमिटी के गैर सरकारी सदस्यन भा अण्णा-टोली के ऊ पहलकदमी बा जवना का तहत ऊ लोग पहिला मीटिंग में जाये से पहिलही अपना संपत्ति के घोषणा कर दिहल. कांग्रेस के कवनो सदस्य अबले अपना सम्पत्ति के घोषणा ना त कइले बा ना अइसन घोषणा करे के ओहलोगन के कवनो विचार बा. बेचारा करबो करीहें त कइसे ? अण्णा सम्पत्ति घोषणा रूपी ट्रंप कार्ड अतना जल्दी चल दिहलन कि ओह लोग के हिसाब-किताब लगावे के मौके ना मिलल. कइसे बतावे लोग कि कतना दौलत सफेदका बा आ कतना करियका. कतना भारत में बा आ कतना के रखवाली स्विस बैंक करत बा. लोग सोचत बा कि आ गइल लोकपाल बिल आ अब हो गइल भ्रष्टाचार दूर. लेकिन का ई संभव बा ?

पैनल में शामिल सिविल सोसायटी के पाँचो सदस्यनो पर विचार होखे के चाहीं. एह तरह के पैनल समाज के सगरी वर्ग के प्रतिनिधित्व ना कर सके. अइसन काहे बा कि भ्रष्टाचार का खिलाफ लड़ाई लड़त भारत में एकहू अइसन आदिवासी कानूनविद्, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता भा विद्वान ना मिलल जे पैनल में आपन सेवा दे सके ? जबकि इहे ऊ वर्ग बा जवना के जमीन, जंगल आ आजीविका छीन लिहल गइल बा. पैनल में कवनो मेहरारुवो नइखे. अब पुरुष बहुल सवर्ण मध्यवर्ग दोसरा योग्य नागरिकन के अनदेखी करत देश के आवाज बन सकेला का ? साल 1952 से हर वयस्क भारतीय के वोट देबे के अधिकार बा. आजु भारत में लगभग 30 लाख निर्वाचित जनप्रतिनिधि बाड़े जवना में से एक-तिहाई मेहरारू बाड़ी सँ. ई चिंता के बाति बा कि मध्यवर्ग के बहुतेरे लोग राजनीति में तब कम दिलचस्पी ले रहल बाड़े, जब देश में राजनीतिक प्रक्रिया संभ्रांत वर्ग का दायरे से बाहर निकलत बा आ निचलको तबका से नया नेता उभरत बाड़े. आजु मध्यवर्ग आ कस्बा का दायरा के बाहरो निचला स्तर पर एगो नया जमीन तइयार हो रहल बा.

अइसना में हमनी का सोझा एह संस्थानन के सशक्त बनावे के चुनौती बा. अबही ले ई साफ नइखे कि मसौदा लोकपाल विधेयक सगरी सवालन के समाधान कर दी. निश्चिते विचार-विमर्श खातिर एक से बेसी मसौदा पेश कइल जा सकेला. जवन आंदोलन सरकार से पारदर्शिता के मांग करत होखे ऊ अपने पारदर्शिता से बाच ना सके. सामाजिक आंदोलन जनता अउर सरकार के बीच के कड़ी बन सकेला. लोकतंत्र के संचालन सुगठित संस्थान आ साफ तरीके से संभव बा. एह से बिल आ कानून के सियासत छोड़ संस्थावन के सशक्त बनावे का दिशाईं काम होखो आ ओह पर जनता के निगरानी रहो.


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी.

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