भोजपुरी आंदोलन के महानायक आ पहिलका गद्यात्मक व्यंग्यकार डॉ. प्रभुनाथ सिंह

  • डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’

हमरा समझ से संस्कृत के देवभाषा एह से कहल गइल कि एकरा में रचल प्राय: हर कविता चाहे श्लोक समस्त सृष्टि खातिर जीवन मंत्र के काम करेला. नमूना के रूप में एगो श्लोक देखीं –
” अमन्त्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलं वनौषधम्.
अयोग्यो पुरुषो नास्ति, योजकस्त्र दुर्लभ:. . “

एह श्लोक के आशय ई बा कि कवनो अक्षर अइसन नइखे जवन जीवन मंत्र ना होखे, कवनो अइसन पवधा नइखे जवन औषधि ना होखे आ केहू अइसन व्यक्ति नइखे जे योग्य ना होखे. इहँवा खाली योजक के अभाव बा. कवन चीज आ कवन आदमी कहँवा ठीक ढ़ंग से काम कर सकेला. हर चीज आ हर व्यक्ति का गुन के पहचान के ओकरा अनुसार ओहिजा लगा देवेवाला ईमानदार जानकार होके त ऊ सफल संयोजक, संचालन, समाज के अगुआ, कुशल राजनेता, मजल साहित्यिक संगठनकर्ता, आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता आ बैद्य सिद्ध हो सक ता. एही सब गुनन के मिलल-जुलल सफल संगठनकर्ता, साहित्यकार, शिक्षक आ राजनेता रहले बाबू डॉ प्रभुनाथ सिंह.

कब कहाँ का कहे के बा, केतना कहे के बा, केकरा से कहेके बा, कइसे कहे के बा, का लिखे के बा, कइसे लिखे के बा, केकरा से कवन काम कइसे करवा लेवे के बा आ केतनो घुसकउल विद्यार्थी के मगज में कइसे विद्या के बीज डाल देवे के बा उनका खूब मालूम रहे आ उनका जीवन का सफलता के सबसे बड़ राज इहे रहे. इहे गुन, प्रतिभा आ मेधा उनका के सबका बीचे अजातशत्रु बना के आदरनीय, पूजनीय, वंदनीय आ अनुकरनीय बना दिहल. जवना के परिनाम आज सोझा बा कि उनका दस-एगारह साल गइला के बादो लोग उनका के उनका जनम दिन आ पुण्यतिथि के बड़ी आदर, सम्मान आ सरना से इयाद करेला आ उनका अभाव के महसूस करत उनका बाकी सपना के पूरा करे खातिर संकल्प लेवेला.

आज 30 मार्च ह. उनकर पुण्यतिथि. आजुवे के दिन साल 2009 में नई दिल्ली से मुजफ्फरपुर आवे के क्रम में उत्तर प्रदेश के बस्ती रेलवे स्टेशन के आसपास वैशाली एक्सप्रेस के एसी कोच में उनकर हृदय गति रूक गइल रहे आ भोजपुरी-हिन्दी के साहित्य जगत होखे भा विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री-प्रबंधशास्त्री जगत भा सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जगत, हर ओर हाहाकार मच गइल रहे. केहू का उनका निधन पर विश्वासे ना होता रहे. कुछ लोग बस्ती के ओर गाड़ी दउरावल तो कुछ लोग छपरा धावल. उनका शवयात्रा में अइसन जन सैलाव उमरल कि का कहे के . हर राजनीतिक दल के छोट-बड़ नेता-कार्यकर्ता, हिन्दी- भोजपुरी, संस्कृत, अर्थशास्त्र आदि के शिक्षक-छात्र, बड़ बड़ नौकरशाह, आम से खास तक सभे शवयात्रा आ दाह संस्कार में आखिर वे आंख में आंसू लेले जमल रहल. ओइसहीं उनका गांवे मुबारकपुर में सम्पन्न श्राद्ध संस्कार में भी उसे भीड़ रहे आ आजुओ जब उनकर जब कहीं जनम तिथि भा पुण्यतिथि मनावल जाला तो लोग बेबोलवले उनका विषय में कुछ कहे आ कुछ जाने खातिर जुम जाला. एकरे के केहू कवि कहले बा –
” ज़िन्दगी के बाद जीना जिन्दगी का नाम है.
जिन्दगी वह खाक जिसका मौत ही अंजाम है. . “

डॉ. प्रभुनाथ सिंह जइसन बहुमुखी, बहिर्मुखी, बहुवर्णी आ बहुआयामी अक्खड़, फक्कड़, कथक्कड़, बोलक्कड़ आ घुमक्कड़ व्यक्तित्व के सर्वसुलभ सृजनात्मक सार्थक जीवन यात्रा के एक-एक पक्ष के जाने खातिर तनी धैर्य से एह आलेख के पढ़े आ पचावे के पड़ी. राहुल सांकृत्यायन के बाद एह तरह के हरफनमौला इंसान के मिलल असंभव ना त कठिन जरूर बा.

मेधावी छात्र, प्रभावी शिक्षक, उद्भावी साहित्यकार, यथार्थवादी राजनीतिज्ञ आ सिद्ध संगठनकर्ता के रूप मे सुख्यात एह सादगी, साफगोई, सच्चरित्रता, संवादप्रिय, संवेदनशील, सामाजिक-सांस्कृतिक, संगीतप्रेमी का संयोजन आ कार्य संपादन के शैली छन भर में गैर के आपन आ आपन के आत्मीय बना लेत रहे. समय आ समाज के बीच संघर्ष के अभावपूर्ण धारा के रगड़ से साधारण पत्थर से शालिग्राम बनल प्रभुनाथ बाबू अपना जीवन्त जीवन के रचइता खुद रहलें. उनकर हाजिरजवाबी आ ठहाका के गूंज से मनहूसो मनई में आनंद के तरंग उठ जात रहे. उनका के जानेवाला उनका के अंगरेजी में ‘ इंस्टिट्यूशन बिल्डर ‘ आ ‘प्रेजेन्सस्पिक्स’ कहते रहे. मतलब उनकर जीवन रचनात्मक संगठन, शैक्षिक संस्थान आदि के निर्माण खातिर समर्पित रहे. जहाँ पहुँच जास उनकर उपस्थिति बोलत रहे.
( – क्रम से अउरी आई.)