भोजपुरी पंचायत पत्रिका के दिसम्बर 14 वाला अंक

Bhoj-Panchayat-Dec14बावन पेज के पत्रिका, चार पेज विज्ञापन के, चार पेज संपादकीय सामग्री, बाँचल चउवालीस पेज. तरह तरह के तेरह गो संपादक बाकिर प्रूफ आ भाषा के गलतियन के भरमार का बीच भोजपुरी पंचायत पत्रिका के दिसम्बर 14 वाला अंक में भोजपुरी में मिलल लोकभाषा (भोजपुरी?) में कार्यकारी संपादक प्रभाकर पाण्डेय के लिखल निबन्ध ‘गुरु के?’, साहित्य संपादक केशव मोहन पाण्डेय के लिखल लोकभाषा कहानी (भोजपुरी कह देतीं त पता ना लोग का कहीत?) ‘कठकरेज’, हमार लिखल बतकुच्चन के एगो कड़ी, आ भाजपा सांसद मनोज तिवारी से बिपिन बहार के लिहल साक्षात्कार छोड़ भोजपुरी में कुछ अउर लउकल त छपरा से एगो पाठक के चिट्ठी. बाकी सब कुछ हिन्दी में बा.

जब जब भोजपुरी पंचायत के अंक मिलेला त शुरू से आखिर ले चातक का तरह देख जानी कि कहवाँ बा स्वाति बून्द. कुछ बून्द मिल जाला बाकिर पियास ना बुताव आ सोचे लागेनी कि का भोजपुरी के भविष्य इहे बा? हिन्दी में पत्रिका, हिन्दी में कार्यक्रम, हिन्दी में विज्ञप्ति, हिन्दी के साहित्यकार. भोजपुरी से बस अतने नाता कि जनम वाला गाँव भा जिला भोजपुरिया इलाका के रहुवे. तीन बरीस से निकलत पत्रिका बाकिर एगो विज्ञापन अइसन ना जवना से कुछ दाम मिलत होखो. कइसे चली एह तरह? करीब एक युग से भोजपुरी के वेबसाइट चलावत अतना ज्ञान त होईए गइल बा कि भोजपुरी में काम करब त कुछ भेंटाए के नइखे. बाकिर हिन्दीओ में क के का भेंटात बा? कुछ भेंटात रहीत त भोजपुरी पत्रिकन के जनमते जम्हुआ ना छूइत. सूरदास के मानी त एक बेर भगवान कृष्णो कह दिहले रहले कि ‘यह ले अपनी लकुटि कमरिया, यह ले अपनी सोटी / तेरी बहुत चराई गईया खाकर बासी रोटी!’

बाकिर का हमेशा निजी सुख लाभे के चिन्ता से देश समाज बन पावेला? अइसने रहे त मेवाड़ के राजा राणा प्रताप कवना सुख ला घास के रोटी खिअवले अपना लड़िका के? बाद में उनुका भामाशाह भेंटा गइल रहलें बाकिर आजु त भामाशाह लउकते नइखन कतहीं. हालांकि आजु राणा प्रतापो कहाँ लउकत बाड़ें? सभे कवनो ना कवनो गोटी सेट करे का फेर में लागल बा. केहू के भोजपुरी अकादमी के चेयरमैनी चाहीं, केहू के कुछ अउर पद. एही ला चारण भाट लोग बहुते मिल जाई बाकिर लड़ाका ना लउकी. हर साल जतना पदक भोजपुरी का नाम पर दिहल जाला ओकरा अधवो किताब छप जाईत भोजपुरी में त भोजपुरी के कुछ भला हो जाईत.

रउरा सभे कहब कहब कि पंचायत पत्रिका का बहाने हम आपन दुखड़ा काहे गावे लगनी त हम त इहे कहब कि हमरा लगे समय नइखे हिन्दी पत्रिका पढ़े के. काहे कि भोजपुरी के जतना नुकसान हिन्दी वाले कइले बाड़न ओतना दोसर केहू नइखे कइले. बस एह फेर में कि लोग का कही? हम अतना सब कुछ एह से कह पाइलें कि हमरा ना त केहू से दाम चाहेला ना नाम. ना पदक ना ओहदा. आपन गँवा लुटा के भोजपुरी के काम में लागल बानी बिना एकर चिन्ता कइले कि लोग का कही. करीब बारह बरीस के एह भोजपुरी यात्रा में अनेके लोग भेंटाइल, आइल गइल बाकिर केहू साथे ना रह पावल. काहे कि एह ढिबरी में तेल ना लउकल केहू के. भा हो सकेला कि हमहीं अकेला रहे का रोग के रोगी हईं, केहू के हित मीत ना बना पवनी.

आखिर में फेरू लवटत बानी भोजपुरी पंचायत पत्रिका ओरि. एगो बेमाँगल सलाह दिहल चाहब. भोजपुरी से मोह बा त कवनो भाषा में लिखीं बाकिर भोजपुरी का सरोकारन पर लिखीं, भोजपुरी पर आ भोजपुरी के चरचा करीं. हिन्दी पत्रिकन के कमी नइखे. भोजपुरी से जुड़ल पत्रिका हिन्दी में होखो हमरा एह बात पर कम विरोध बा, अधिका विरोध एह पर बा कि भोजपुरी सरोकारन के ओतना चरचा नइखे होखत जतना होखे के चाहीं. दोसर ई कि भोजपुरी पंचायत पत्रिका अगर आपन साख बचावल चाहत होखे त प्रूफ आ भाषा पर धेयान दिहला के जरूरत बा.

प्रूफ आ भाषा के गलती हमरो लिखला में भरपूर मिलेला बाकिर हम अकेले बानी. सीधे कंप्यूटर पर लिखिलें, टपटपाए में गलती होखे के भरपूर गुंजाइश रहेला. बाकिर जहाँ तेरह जने संपादक होखसु तहाँ एह तरह के गलती ना होखे के चाहीं. हर संपादक के साख पर खतरा पैदा होला एह तरह के अशुद्धियन से. हमार बात गलत बुझाव, पीड़ा देव त माफ मत करब जाँ, सुधार लेब जा आपन गलती. काहे कि हम गलते लागे खातिर आ पीड़े देबे ला लिखले बानी ई सब.

– ओम प्रकाश सिंह

Comments 2

  • सभेके जानकारी होखेके चाहीं कि ‘भोजपुरी पंचायत’ भोजपुरी मासिक पत्रिका ना, हिन्दी मासिक पत्रिका हउए।

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