भोजपुरी भाषी के मातृभाषाई के अस्मिताबोध – 3

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’

JaiKantSinghJai

वैदिककाल होखे भा पौराणिककाल, ऐतिहासिक काल होखे भा आधुनिक काल, भोजपुरी भाषी जनसमुदाय राष्ट्र अउर राष्ट्र के भाषा-संस्कृति, सम्मान-स्वाभिमान आ उत्थान-पहचान खातिर कवनो तरह के बलिदान देवे खातिर हर घरी हर छन तत्पर रहल बा. आजादी के लड़ाई के दरम्यान भोजपुरी समाज देश के एकता आ हिन्दी के सउँसे के सशक्त सम्पर्क भाषा बनावे खातिर अपना भोजपुरी भाषा आ क्षेत्र के बिकास खातिर चल रहल जनपदीय आंदोलन के रोक दिहल.

ओही घरी डॅा० ग्रियर्सन घोषित कर चुकल रहले कि भोजपुरी हिन्दी से अलग भाषा ह. ऊ अपना ऐतिहासिक ग्रन्थ ‘लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया’ सहित अपना कई शोधपरक निबंध में एह बात के जिक्र कइले बाड़ें. बाकिर तबके भोजपुरी भाषी हिन्दी के विद्वानलोग का लागल कि ई अँगरेज सब हमनी का एकता के भाषा के आधार पर खंडित करेके साजिश रच रहल बाड़ें. तब ई बात साँचो हो सकत रहे. बाकिर बाद के भाषावैज्ञानिक अध्ययन- अनुसंधान के आधार पर डॅा० ग्रियर्सन के बात सत्य साबित भइल.

आज भोजपुरी के संवैधानिक अधिकार, सरकारी स्तर पर मातृभाषा घोषित करे के माँग, भोजपुरी भाषी प्रांतन खातिर भोजपुरी के द्वितीय राजभाषा बनावे के बात, केन्द्रीय आ राज्य स्तरीय लोक सेवा आयोग सहित तमाम जन सेवा से संबंधित परीक्षा के विषय बनावे के मुद्दा पर, न्यायालय, विधेयक, कानून, अध्यादेश, राज्यादेश आदि के लेके जब-जब अभियान तेज होला, तब-तब सरकार में शामिल नौकरशाह, मैकाले के मानसपुत्र आ भोजपुरी माई के कपूत तथाकथित हिन्दी के झंडा बरदार हिमायती विद्वान लोग का तराए भगवान लाग जाला. ओह लोग के लागेला कि अँगरेजी-हिन्दी भाषा के जरिए जवन रोजी-रोज़गार पर ओह लोग के अधिकार बा, समय-समाज आ देश-दुनिया में जवन रुतबा आ दबदबा बा, ऊ समाप्त हो जाई.

तब त भोजपुरियो पढ़ के दबल-कुचल, दलित-पिछड़ल हमनी के बरोबर बइठे लगिहें स आ ई बात सहियो बा कि भारत में जब तक हिन्दी के साथ-साथ प्रांतीय/ क्षेत्रीय जनभाषा मतलब लोकभाषा के रोजी-रोजगार सहित राजकाज के भाषा ना बनावल जाई, तबले इहाँ लोकतंत्र के नाम पर लूटतंत्र आ गिरोहतंत्र बनल रही, अउर 98% भारतीय भाषा भाषी पर 2%मैकाले का मानसपुत्र के शासन आ रोब दाब चलत रही.

भोजपुरी के अधिकार आ संवैधानिक मान्यता के जब जब सवाल उठेला तब तब ई हिन्दी के हिमायती लोग चिल्लाए लागेला कि भोजपुरी के ई मान्यता मिल जाई त हिन्दी के बहुत लमहर क्षति होई. एकर बिकास रुक जाई काहे कि हिन्दी के नाम पर बतावल गइल क्षेत्र आ आबादी में कमी आ जाई; जइसे हिन्दी के प्राण भोजपुरिए में बसल होखे.

ऊ लोग इहो बात अधिकार सहित कहेला भोजपुरी त हिन्दी के एगो बोली हिअ. जबकि हिन्दी बोलियन से बनल देश के सम्पर्क भाषा हिअ. एकर अस्तित्व भोजपुरी जइसन भारत के कई बोलियन के बिकास पर टिकल बा. भोजपुरी आदि भारतीय बोली भा भाषा हिन्दी से बहुत पुरान भाषा हई स. एह बोलियन के मरते हिन्दियो मर जाई.

अइसे हिन्दी मूल रूप से फारसी के शब्द ह. जवना के अर्थ होला हिन्द के. डॅा० भोलानाथ तिवारी के अनुसार ‘हिन्दी’ शब्द के प्रयोग भारतीय मुसलमान लोग खातिर होत रहे आ हिन्दवी शब्द के प्रयोग मध्यदेशीय भाषा खातिर. डॅा० धीरेन्द्र वर्मा, डॅा० जितराम पाठक आदि विद्वान भोजपुरी के बिकास मध्यदेशीय भाषा से मनले बा. मध्य-देशीय हिन्दवी का बिकास के मूल में भोजपुरी भाषा के खाद-पानी पड़ल बा. एह तथ्य के पुष्टि एगो लोक प्रचलित दन्तकथो से हो जाता. ज्ञानचन्द जैन आ डॅा० वहीद मिर्ज़ा के अनुसार भारत में प्रचलित कई भाषा के विद्वान कवि अमीर खुसरो (सन् 1255 ई०-1325 ई०) का दिल्ली के अलावे उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल सहित कई प्रांतन में रहे आ उहाँ के भाषा-संस्कृति के जाने-समझे के अवसर मिलल रहे. उनका ‘गजबतुल कमाल’ महाकाव्य में कई भारतीय मातृभाषा सब के मेल से हिन्दवी अथवा हिन्दी भाषा के बिकसित होखे के चर्चा बा.

बतावल जाला कि अमीर खुसरो के मतारी फारसी भाषा ना जानत रहली आ तब अमीर खुसरो फारसी में शायरी करत रहस. उनका मतारी का उनकर शायरी समझ में ना आवत रहे. एह से ऊ अमीर खुसरो से कहली कि तूँ अइसन भाषा में लिखऽ कि तोहर लिखल हमहूँ समझ सकीं. मतारी के बात अमीर खुसरो के लाग गइल. संजोग से ऊ बिहार के भोजपुर क्षेत्र के प्रवास पर रहस. एक दिन कुछ औरत गीत गावत गंगा नहाए जात रही. अमीर खुसरो का ओह औरतन का गीत के बोल आ लय पसन पड़ गइल. गीत के बोल रहे – ” सुध बुध सब हरि लेलऽ हो सइयाँ अँखिया लड़ाके.” तत्क्षण उनका मुँह से ई बोल निकलल – “छाप तिलक सब छिनी रे मोहि नयना मिला के”. ई गीत उनका मतारी का खूब पसन पड़ल. ओकरा बाद अमीर खुसरो भोजपुर क्षेत्र के एही भाषा में लोक प्रचलित अरबी-फारसी सहित आसपास के आउर भाषा के शब्द आदि के मेल से बनल भाषा के हिन्दवी भा हिन्दी कहले जवना में ऊ रचना करके हिन्दवी भा हिन्दी के पहिल कवि कहइले.

अमीर खुसरो के लिखल मध्यदेशीय हिन्दवी के रचना हू ब हू भोजपुरी के रचना लागेला; जइसे कि – “गोरी सूते सेज पर मुख पर डाले केस / चल खुसरो घर आपने रैन भई चहु देस. . “, चाहे “अन्दर चिलमन बाहर चिलमन बीच करेजा धरके. अमीर खुसरो ई कहे ऊ दू दू अँगुल सरके. . “. चाहे” बाँस ना बल्ली बन्धन घने, कह खुसरो घर कइसे बने.” चाहे “तेली के तेल कहाँर के हंडा, हाथी के सूँड़ नबाब के झंडा. ( जवाहरे खुशरवी, पन्ना – 310, वाहिद मिर्जा, पन्ना 327)

भोजपुरी भाषा के पास लोकसाहित्य, लोकसंस्कृति, लिखित प्राचीन आ आधुनिक साहित्य वगैरह के अकूत भंडार बा. वैदिक भाषा के भाषिक प्रकृति आ प्रवृत्ति से ओतप्रोत स्वरांत रागात्मक-लयात्मक भाषा भोजपुरी हमार मातृभाषा हिअ. ओकरा अभिव्यक्ति क्षमता पर हमरा गुमान बा. एकरा ध्वनि, ध्वनिग्राम, वर्ण, वर्तनी, शब्द निर्माण के क्षमता आ भाव-विचार के प्रसंग-संदर्भ के अनुकूल- अनुरूप वाक्य विन्यास आ वैज्ञानिक देवनागरी लिपि के बोध भइला के बाद केहू एकरा भाषिक रूप- स्वरूप पर मोहा जाई .

डॅा० ग्रियर्सन भोजपुरी के बलशाली, कर्मठ आ ईमानदार जाति के भाषा बताके एकरा लोक साहित्य आ भाषिक विशेषता के बखान कइलें बाड़न. प्राचीन काल से अब तक हमार मातृभाषा भोजपुरी अपना मूल भाषिक प्रकृति; जइसे- तद्भवीकरण, मुख्य रूप से ‘ न, र, स’ ध्वनि केन्द्रित शब्द रचना, स्वरांत- स्वराघात आ अपना वैदिक रागात्मक- लयात्मक आदि प्रवृत्ति के बचावत- जोगावत क्षेत्रीय सीमा से प्रांतीय, राष्ट्रीय आ अंतरराष्ट्रीय सीमा तक आपन बिस्तार कर चुकल बिआ. बुद्ध, सिद्ध, नाथ जोगी , संत, साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार, नेता, अभिनेता, प्रणेता, भाषाविद्, शिक्षाविद् के एकरा अभिव्यक्ति क्षमता पर नइखे रीझल . बाकिर घरवे के पूत- सपूत- कपूत दुनेती हो गइल बाड़ें. उनका खातिर ‘घर के मुर्गी दाल बरोबर’ चाहे ‘घर के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध’

दू सौ साल के गुलामी आ ओह काल खंड में लागू कइल अँगरेजन के शिक्षा आ भाषा नीति के कुछ फायदा एह देश के जरुर मिलल बा त नुकसानो कम नइखे भइल. भाषा , शिक्षा आ संस्कृति के स्तर पर आजुओ देश गुलाम बा. अब त वैश्विक उदारीकरण के चलते देश के सामने पहचान आ अस्तित्व के संकट खड़ा हो रहल बा. देश के बहुभाषी सांस्कृतिक बनावट- बुनावट खतरा में पड़ गइल बा. आज विकास के मतलब सिर्फ तात्कालिक आर्थिक विकास बा. अइसन माहौल बनावे के बाजारु साजिश चल रहल बा, जवना में बौद्धिक, वैचारिक, नैतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक- सांस्कृतिक सम्पन्नता भा बिकास के कवनो मोल नइखे रह जाए. आज के आर्थिक विकास उच्छृंखलता के हर सीमा लांघत भाषा, भेस-भुसा, भोजन, भाव भंगिमा, रिश्ता -नाता, आस्था -मान्यता, सोच- संवेदना, व्यापार – बाजार सब के अपना गिरफ्त में लेवे खातिर एगो भाषा, एगो सत्ता भा एक ध्रवीय समाज बनावे के उतजोग में लागल बा. जवना मातृभाषा, बोली भा भाषा के विविधता, अपना लोककला, लोक साहित्य आ लोक संस्कृतियन के जरिए मनुष्य के मुल्यबोध आ आत्म संघर्ष के जिन्दा राखेलें स, मानव समाज के तमाम आपाधापी, कुंठा, हताशा- निराशा से बचावे खातिर ओकरा प्रतिरोधक क्षमता में प्राण डालेली स, ओही सबके रोजी रोजगार आ आधुनिक बिकास में बाधक बताके भाषिक, सांस्कृतिक आ बौद्धिक गुलामी लादे के साजिश हो रहल बा. एह तरह से मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा के समाप्त कइल मनुष्य का प्रतिरोध के समाप्त कइल बा .

शुरू से अँगरेज आ अमेरिकन व्यापारी कौम ह अउर संस्कार आ व्यापार में छतीस के रिश्ता जग- जाहिर बा. व्यापारी के भाषा मतलब बाजार के भाषा अर्थात् बाजारू भाषा. ऊ भाषा विकसित आ दबंग देश के छद्म ग्यान – बिग्यान के भाषा, आधुनिक आर्थिक विकास के माध्यम भाषा, प्रौद्योगिकी के भाषा, मोबाइल, इन्टरनेट, कम्प्यूटर वगैरह के भाषा, शोध- अनुसंधान के भाषा के आर में साम्राज्यवादी वर्चस्व कायम करेके घातक हथियार भर होले. ऊ भाषा अपना बाजारू वर्चस्व खातिर जरूरत के हिसाब से आदमीयत के अर्जित तमाम संस्कारन, मूल्य- आचार – बिचारन के दकियानूसी बताके कवनो स्तर तक नग्नता परोसे से परहेज ना करे. सबसे पहिले ऊ भाषा नग्नता के जाल में नवही जमात के फँसावेले, फेर रोजी- रोजगार , उद्योग -व्यापार – बेवसाय के जरिए नवही जमात का दिल -दिमाग में निजी देशी भाषा -संस्कृति आ जीवन- शैली सबकुछ तुच्छ, त्याज्य पिछड़ल प्रतीत होखे लागेला. अँगरेज अपना भाषा आ शिक्षा- नीति के जरिए इहे करत रहलें. अँगरेजी आ अँगरेजियत आजुओ गरीब भा विकासशील देशन के व्यापार आ बाजार पर हावी होखे खातिर हर हथकंडा अपना रहल बा . इंग्लिस्तान आ अमेरिका त व्यापारियन के बाजारू देश ह. बहुत पहिले इंग्लैंड के बारे में नेपोलियन के कहनाम रहे- “इंग्लैंड इज ए नेशन आफ शॅापकीपर्स. ”

एह से दुनिया के पूंजीवादी विकसित देश भूमंडलीकरण के नाम पर भूमंडीकरण का नीयत से दुनिया के विकासशील भा अर्धविकसित देशन के प्राकृतिक आ मानवीय संसाधन सहित ओकरा बाजार पर कब्जा खातिर एक भाषा अँगरेजी, एगो सत्ता आ एक ध्रुवीय समाज बनावे के फिराक में लागल बाड़ें. जदि समय रहते ना चेतल गइल त आपन भाषा, समाज, संस्कृति, सम्प्रभुता सबकुछ समाप्त हो जाई. एह सब के बचावे खातिर जरूरी बा अपना- अपना मातृभाषा, देश के सम्पर्क भाषा, राजभाषा आ राष्ट्रभाषा के प्राचीन आ आधुनिक ग्यान-बिग्यान, शोध-अनुसंधान, प्रौद्योगिकी तकनीकी शिक्षा, शासन- प्रशासन, विधि-विधेयक, नियम-कानून सबके भाषा बनावे के पड़ी. अँगरेजी सहित कवनो विदेशी भाषा के अध्ययन-अनुसंधान आ विदेश सेवा के अलावे हर तरह के निजी, गैर सरकारी, अर्धसरकारी भा सरकारी नोकरी-पेशा, रोजी-रोजगार आ शासन -प्रशासन के माध्यम भाषा बने से रोके के होई. एकरा खातिर एक-एक भारतीय जनता के भीतर अपना -अपना मातृभाषा सहित देश के सर्वथा समर्थ सम्पर्क भाषा हिन्दी के प्रति कूट -कूट के सम्मानजनक स्वाभिमानी भाषिक अस्मिताबोध पैदा करे के होई. हमसब के भीतर अपना मातृभाषा भोजपुरी आ देश के सम्पर्क भाषा हिन्दी के प्रति ओइसने गौरवपूर्ण अस्मिताबोध पैदा होखे के चाहीं, जइसे हिब्रु, फ्रेंच, चीनी, रूसी, इंग्लिश, स्पेनीश आदि भाषा भाषी के भीतर होला. अपना इहाँ के लोग अभिनय भा नकल करेके आदि होला. उदाहरण आ दृष्टांत के सुनके ओइसन बने के प्रयास करेला, एह से अब हम कुछ दुनिया के आउर भाषा भाषीलोग का अस्मिताबोध के उदाहरण प्रस्तुत करके आपन भावना अभिव्यक्त करेके प्रयास करेब, ताकि जेकरा भीतर जरको सा आग के लवलेश होखे, ऊ लहोक- धधोक बनके अपना मातृभाषा, देश स्तरीय सम्पर्क भाषा /राजभाषा /राष्ट्रभाषा सहित अपना समाज -संस्कृति- शिक्षा, ग्यान -परम्परा आ मानवीय मूल्यन के रक्षे ना बल्कि एह सबके परिष्कार- संस्कार आ युगानुकूल सुधार -बिस्तार कर सके.
(बाकी आगे आई.)

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