भोजपुरी भाषी के मातृभाषाई के अस्मिताबोध – 4

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’

JaiKantSinghJai

भाषिक, सांस्कृतिक आ बौद्धिक गुलामी एतना ना मेहीं (बारीक) चीज ह कि एकरा गुलाम का पतो ना चले कि ऊ एह सबके कब से गुलाम बा. ई गुलामी ओकरा उपलब्धि जइसन महसूस होला. ओकरा आगे भाषिक अस्मिताबोध के बात कइनी कि ऊ तपाक से बोली – भाषिक अस्मिताबोध कवन चीज ह, जवना खातिर एतना हो-हल्ला कइल जाता. भाषा त अभिव्यक्ति के एगो माध्यम भर ह. जदि अँगरेजी आज अँगरेजी अभिव्यक्ति के सम्भ्रांत आ रोजगारपरक ग्यान – बिग्यान के वैश्विक भाषा बिआ त देश का आउर पिछड़ल भाषा के बदले एकरा के अपनावे में का हर्जा बा. आधुनिक बिकास के दौर में जब बिना अँगरेजी के काम चलेवाला नइखे तब काहे ना देश सब छोट-बड़ भाषा आ हिन्दी के बदले अँगरेजी के अपनावे आ शिक्षा-शासन के मुख्य भाषा घोषित क के अपना देश के बिकसित बनावल जाए. एह सब मामला में आदमी का भावना में बहे के बजाय दिमाग से काम लेवे के चाहीं. पेट अँगरेजी से भरी त मातृभाषा आ राष्ट्रभाषा के लेके केहू चाटी ?

यूरो-अमेरिकी बाजारवाद रोजगार आ आधुनिक धनकुबेर बनावे के लोभ-लालच देखा-देखा के अइसने शर्मनिरपेक्ष निजी सुख-सुविधाभोगी बुद्धिभोगी सोच वालन के समय-समाज के आदर्श रूप में पेश करके सउँसे दुनिया पर छा जाए के मनसूबा पलले बा. ऊ अपना हित के सामाने ना, बल्कि भाषा, विश्वभाषा, रोजगार- व्यापार के भाषा तक के बेंच रहल बा. जवना के सहज शिकार गाँव आ छोट-छोट शहरन से आवेवाला आमजन परिवार हो रहल बा. एक त सामान्य परिवार के बच्चा सभ एह भाषाई बाधा के चलते वर्तमान बिकास के दौर में पिछड़त जा रहल बा. दोसरे एह असंतुलित दौरे में शामिल होखे का खेयाल से अँगरेजी सीखे खातिर समय, श्रम आ सम्पत्ति सब झोंक रहल बा आ एहू जरिए धूर्त धनाढ्य पूंजीपति वर्ग अँगरेजी इस्कूल आ कोचिंग संस्था रूपी आपन उद्योग बिकसित कर लेते बा अउर कम से कम समय में अपना भाषा के माध्यम से जवन प्रतिभा, क्षमता, मानसिक श्रम सब सीधे- सीधे अपना उपयोगी पाठ्यक्रम, विषय आ ग्यान-बिग्यान के अध्ययन- अनुसंधान में लाग के बहुते कम समय में उपलब्धि हासिल कर सकेलें उनकर अधिका समय श्रम, साधन त पहिले अँगरेजी सीखे में बर्बाद हो जाता आ ई अँगरेजी सोना के मिरगा जइसन गाँव का प्रतिभाशाली राम के भटका रहल बिआ.

सम्पन्न अँगरेजिदा अभिजन लोग एकरो जरिए आम जनता के लूट रहल बाड़ें. ओही अभिजन लोग के लठइती करत आजादी मिलला का बाद के हर सरकार सैद्धांतिक रूप से देश के तमाम स्थानीय मातृभाषा आ राष्ट्रभाषा हिन्दी का बिकास करत बेवहार में समस्त राजकाज, दफ्तर, परीक्षा, लोकसेवा आयोग, अस्पताल, न्यायालय, कर विभाग, बैंक वगैरह खातिर अँगरेजी के बेवहार करेलें ताकि शासन-प्रशासन के ठसक-दबाव, रोब-रुतबा आम जनता पर बनल रहे. तंत्र आ जनता के बीच दूरी बनल रहे. अँगरेजिये अइसन भाषा बिआ जवना के आर-ढाल के सहारे देशी भाषा जानेवाली जनता के नौकर, नौकर ना होके नौकरशाह बन गइल बाड़न.

इहे लोग हिन्दी के राजकाज के बेवहारिक भाषा बने में बाधक बनत रहल बा. इहेलोग गाँव वाला भारत के कंगाल बना के शहर सिटी वाला इंडिया बना के सब सुख -सुविधा लूट रहल बा. अइसने लोग मोट पगार ( पैकेज ) के लोभ-लाभ खातिर देश के पइसा से काबिलियत हासिल करके माई-बाप, मातृभूमि आ मातृभाषा के अँगूठा देखा देता. गाँव के कुल्ह रस टान के शहर से महानगर आ महानगर से बिदेस पहुँचेवाला अइसने नकमहरामन का अपना गाँव, घर, परिवार-पड़ोस से घीन बरे लागेला. अइसन लोग का ई ना सुझे कि मातृभाषा भा राष्ट्रभाषा उहाँ के जनता के अस्मिता आ जातीय बोध के अलावे ओह समाज का जीवनबोध के परिचायको होले.एकर उपेक्षा उहाँ का जनता आ उनका संस्कृति के अपमान ह.

हर समाज, देश आ प्रभुतासम्पन्न राष्ट्र में मुख्य रूप से दू तरह का भाषा समाज के स्थिति होले – उच्च भाषा भाषी समाज आ हीन भाषा भाषी समाज. उहाँ का समाज, देश आ प्रभुतासम्पन्न राष्ट्र के आपन स्थानीय मातृभाषा आ सउँसे देश भा राष्ट्र के राष्ट्रीय भाषा भाषी समाज के सम्मानित उच्च भाषा भाषी मानल जाला आ दोसरा समाज, देश भा राष्ट्र के भाषा के अपनावे आ अर्जित करेवाला समाज, देश आ राष्ट्र के हीन भाषा भाषी के कोटि में गिनल जाला. भाषा, संस्कृति, शिक्षा, इतिहासबोध के स्तर पर मानसिक रूप से गुलाम भारतीयन खातिर इहाँ के स्थिति उल्टे बा. काहेकि सन् 2001 का जनगणना के मुताबिक 125 करोड़ आबादी का एह भारतवर्ष में तमाम सरकारी, अर्धसरकारी आ गैरसरकारी मतलब धनाढ्य पूंजीपतियन के अँगरेजी मेडियम इस्कूल रूपी माफिया अपसंस्कृति केन्द्रित तमाम सक्रियता के बावजूद एह देश के प्रथम भाषा के रूप में अँगरेजी के प्रयोग करेवाला आ देश के तमाम स्तर का सविधन के उपभोग ठसक से जीयेवाला मात्र 226499 लोग बाकी सब जनता के जाति, भाषा, वर्ग, वर्ण, लिंग, क्षेत्र वगैरह के आधार पर भेद डालके आ कमजोर क के अपने आपके उच्च आ श्रेष्ठ सिद्ध करे में सफल हो रहल बाड़ें.

अइसन हालत में अपना-अपना मातृभाषा, देश के समर्थ सम्पर्क राष्ट्रभाषा हिन्दी आ राष्ट्रलिपि देवनागरी के भाषाई अस्मिताबोध के साथ ओह सबके आपन हक दिलावे खातिर निर्णायक आंदोलन के जमीन तइयार करेके होई. काहेकि प्रतिद्वंद्वी रक्तबीज असुरो से भयानक बा. अइसन स्थिति में सेक्सन, लैटिन, ग्रीक, वेल्श, स्काटिश, आयरिश, स्पेनिश, फ्रेंच, लेबर समुदाय वगैरह के भाषा सब के समुच्चय भाषा के रूप में बिकसित भइल भाषा अँगरेजी से जुझे आ जीते खातिर अपना हिन्दी भाषा के देश के तमाम स्थानीय आ प्रांतीय मातृभाषा सब के मेल से राष्ट्र के एगो सर्वे समर्थ सम्पर्क भाषा, पहिल राजभाषा आ सम्मानित राष्ट्रभाषा बनावे के पड़ी. एकरा अनुवाद के भाषा के पहचान से बाहर निकल के अपने आपके मौलिक संस्कार भाव-विचार, ग्यान-बिग्यान आ आधुनिक प्रौद्योगिकी के भाषा साबित करेके होई.

एह महान उपलब्धि के हासिल करे खातिर हिन्दी के आ हिन्दी का हिमायती लोग के अपना के उदार बनावे के पड़ी. देश के तमाम मातृभाषा सब के वाजिब हक देवे के पड़ी. एकरा सउँसे देश के भाषा बने के पड़ी. उत्तर भारत का तमाम मातृभाषा सबसे जीवनरस लेके उत्तर भारत के हिन्दीपट्टी घोषित करेके जानलेवा हठ त्यागे के पड़ी, ना त सरकार जइसे उत्तर भारत के हिन्दीपट्टी बताके आ हिन्दी के उत्तर भारत के मातृभाषा घोषित करके राजभाषा आ राष्ट्रभाषा घोषित करी, ओइसहीं दक्खिन, पूरब आ पच्छिम में एकर बिरोध शुरु हो जाई आ उत्तर भारत के मातृभाषाई अस्मिताबोध वाला जनसमुदायो अपना मातृभाषा के के मान- सम्मान, उत्थान- पहचान आ हक- हकूक खातिर आंदोलन के मजबूर हो जइहन.

भाषा के मुद्दा बहुते संवेदनशील होला. भाषा के आधार पर एही देश में कइगो प्रांत बन-बँट चुकल बा. इतिहास गवाह बा कि एक मजहब के माने-जीये वाला लोग मातृभाषा के अपमान आ हक ना मिले के लेके दू देश में बँट चुकल बा. बंगलादेशी मुसलमान अपना मातृभाषा बंगला के लेके पाकिस्तान से अलग हो चुकल बाड़ें . कवनो जिन्दा व्यक्ति, समाज आ जनसमुदाय खातिर मातृभाषा आ ओकर राष्ट्रभाषा केतना संवेदनशील मुद्दा होला, कुछ प्रसंग आ संदर्भ से आउर स्पष्ट हो सकऽता.

प्रसंग अँगरेजी भाषी आ फ्रेंच भाषी जनसमुदाय के भाषाई अस्मिताबोध के बा. सन् 1066 ई० में नारमंड लोग इंग्लैंड पर आधिपत्य जमाके अँगरेजी के हटाके फ्रेंच भाषा के उहाँ के राजभाषा घोषित कर दिहल. फेर फ्रेंच कुलीन वर्ग के भाषा बन गइल आ अँगरेजी निम्न वर्ग के.बाकिर 300 साल बाद लमहर लड़ाई लड़ला के बाद अँगरेजी के दिन बहुरल. सन् 1338 ई० में इंग्लैंड के फ्रांस से जुद्ध शुरु भइल. इंग्लैंड के जनता का मन में फ्रांस आ फ्रेंच भाषा के लेके बहुते आक्रोश रहे. ओह समय के सम्राट एडवर्ड फ्रेंच रहलें त नारमंडे मूल के, बाकिर ऊ अतीत में अँगरेजी भाषा के प्रति भइल अन्याय के लेके नाखुश रहलें. एह से ऊ प्रतिक्रिया बस अँगरेजी के समर्थक हो गइल रहलें. ऊ सन् १३६२ में ब्रिटिश संसद के अँगरेजी में संबोधित कइलें. फेर धीरे-धीरे इंग्लैंड में अँगरेजी भाषा के गरिमा बढ़त गइल. कहे के मतलब कि आमजन बड़लोग का आचरण के अनुकरण करेलें.

इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान डॅा० रघुवीर जब फ्रांस जास त उहाँ के एगो राजवंशीय परिवार मे ठहरस. ऊ राजपरिवार उनका के बहुते मान-आदर देवे. एक बेर ऊ ओही राजपरिवार में ठहरल रहस. ओही बीच उहँवा भारत से उनका नामे एगो चिट्ठी पहुँचल. ऊ चिट्ठी पढ़ते रहस कि ओह परिवार के एगो बच्ची, जवन उनका से हिल मिल गइल रहे. उनका हाथ से झपट के चिट्ठी लेके पढ़े लागल. ऊ चाहिए के मना ना कर सकलें. ओह लइकी का एतने जाने के उत्सुकता रहे कि भारत के भाषा कइसन होले आ कइसे लिखाले. बाकिर भारत से डॅा० रघुवीर के नाम गइल चिट्ठी त अँगरेजी में लिखल रहे. ऊ लइकी चिट्ठी डॅा० साहेब के ओर बढ़ाके उदास मने अन्दर चल गइल. डॅा० साहेब आपन चिट्ठी बाँचे लगलें.

हर दिन के तरह भोजन के समय राजपरिवार के सब सदस्य आ डॅा० साहेब भोजन के मेज पर बइठल. भोजन के बाद ओह बच्ची के मतारी मतलब परिवार के मलकिनी, जे डॅा० साहेब के सबसे जादे आदर देत रही, डॅा० साहेब से बहुते उदास मन से कहली कि डॅा० साहेब, अपने आगे से ठहरे खातिर अलग जगह ढूंढ लेब. फेर ऊ एह स्थिति के कारन स्पष्ट करत बेबाक ढंग से कहली – ‘ देखीं डॅा० साहेब, जवना व्यक्ति, समाज भा देश के आपन मातृभाषा, राष्ट्रभाषा आ राष्ट्रलिपि ना होखे, ओकरा के हमरा फ्रेंच भाषा में असभ्य, बर्बर आ निम्न मान के सम्मान ना दिहल जाला. राउर आ रउरा देश के त कवनो मातृभाषा आ राष्ट्रभाषा हइये नइखे. रउरा सब त अँगरेजी से काम चलावेनी एह से हमरा नजर मे रउआ आ राउर देश भाषिक स्तर पर गुलाम बा. अइसन लोग से हमनी अइसन भाषिक अस्मिताबोध वाला परिवार कवनो सम्बन्ध ना राखे. आउरी सुनीं, हमार मतारी लॅारेन प्रदेश का ड्यूक के कन्या रही. पहिलका विश्व जुद्ध के पहिले ऊ प्रदेश जर्मनी के अधीन रहे. जर्मन सम्राट् उहाँ के फ्रेंच भाषा के शिक्षण के माध्यम भाषा से हटा के जबरदस्ती जर्मन भाषा थोप दिहलस. एक बेर जर्मनी के महारानी लॅारेन प्रदेश के भ्रमण के दौरान ओह इस्कूल में पधरली, जवना में हमार मतारी पढ़त रहली. जर्मनी के राष्ट्रगान, जवन जर्मन भाषा में रहे, गायन प्रतियोगिता में हमार मतारी महारानी के सामने शुद्ध शुद्ध राष्ट्रगान सुना दिहली. सुन के महारानी बहुत खुश होखे मुँहमाँगा इनाम देवे के कहली. कई बार इनाम माँगे खातिर मजबूर कइला पर हमार मतारी महारानी से पूछली कि जवन चीज हम माँगेब ऊ मिली नू? एह पर खीझ के महारानी कहली – ऐ बच्ची, हम महारानी हईं. हमार बात अटल होले. तूँ माँग त सही. एतना सुन के हमार मतारी कहली कि हे राजमाता, आज हमरा के एतने बचन दीं कि हमरा प्रदेश के राजभाषा आ शिक्षा के माध्यम भाषा फ्रेंच होखे. छोट बच्ची के मुँह से एह तरह के अकल्पनीय माँग सुन के महारानी के चेहरा तमतमा गइल बाकिर ऊ बचन हार चुकल रहली. ऊ गुस्सा में कहली कि जुद्ध लड़ के जवन चीज नेपोलियन ना जीत पवलें तवन चीज ई छोट बच्ची अपना विवेक से जीत लिहलस. ऊ ओहिजा घोषणा करत कहली कि आज से एह प्रदेश के राजभाषा फ्रेंच होई. बाकिर अब ई प्रदेश बहुत दिन तक जर्मनी के अधीन ना रह पाई. कवनो व्यक्ति, समाज भा देश के गुलाम बनावे के सबसे कारगर हथियार भषे होले.’महारानी के बात साँच भइल. कुछे साल बाद लॅारेन प्रदेश जर्मनी से आजाद हो गइल.’ राजपरिवार का मलकिनी के बात सुनके डॅा० रघुवीर के मन में अपना देश के राष्ट्रभाषा के हिन्दी खातिर पहिला बेर सम्मान के भाव महसूस भइल.

इंग्लैंड आ फ्रांस के बीच समुद्र से दूरी मात्र एकइस किलोमीटर बा. बाकिर फ्रांस के लोग से कुछुओ अँगरेजी में पूछल जाला त मुँह बिचका के समझला के बावजूद जबाब फ्रेंच भाषा में देवेला. आयरलैंड के जनता का अँगरेजी के जगहा अपना मातृभाषा गैली के अधिका सम्मान देले आ ओकरा के शिक्षा के माध्यम भाषा बनाके ओकरा बिकास खातिर संघर्षरत बिआ. आधुनिक तुर्की के निर्माता कहाये वाला अबुल कमाल पाशा अपना मंत्री से पूछलन कि तुर्की कतना दिन में हमरा देश के राजभाषा बने जोग हो पाई ? एह सवाल के जवाब देत मंत्री कहलें कि जदि खूब तेजी आ ईमानदारी से एकरा बिकास के लेके सामूहिक काम कइल जाए त कम से कम बीस साल लाग सकेला. एह पर अबुल कमाल पाशा कहलें कि समुझऽ कि आज बीस साल बीत गइल आ आज से तुर्की एह देश के राजभाषा आ राष्ट्रभाषा घोषित भइल. आज से देश सब कामकाज तुर्की भाषा में सम्पन्न होई आ जेकरा दिक्कत बा ऊ काम छोड़ के जा सकऽता.

एक बार स्टालिन मास्को में भारतीय राजदूत से प्रमाणपत्र अँगरेजी में लेवे से इन्कार कर देले रहस. तब बुझाइल रहे कि हिन्दी से प्रेम रूस के बा भारत के ना. एक बेर एगो भारतीय भाई विदेशी विद्वान श्री जिजिन से अँगरेजी में कुछ पूछलन, श्री जिजिन ओह सवाल के जबाब हिन्दी में दिहलन. भारतीय होके अँगरेजी में सवाल आ विदेशी होके हिन्दी में जबाब के चलते ऊ भाई साहब कुछ झेंपत आ अचरज भरल निगाह से विदेशी विद्वान के देखत धीरे से पूछलन – रउरा हिन्दी जानत बानी? एह पर श्री जिजिन व्यंग्य के ढंग में कहलें – हँ जानत रहनी, बाकिर दिल्ली जाके भुला गइनी. जिजिन के जबाब ओह भारतीय के मुँह पर जोरदार तमाचा जइसन रहे. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के एगो आलेख में एह प्रसंग के जिक्र बा.

सौ साल पहिले तक स्वीड भाषा बोले वाला फिनलैंड के लोग एक दिन में फिनी भाषा में काम काज करेके निर्णय लिहलस आ ओह लोग का कबो कवनो दिक्कत ना भइल. इजराइल देश के मातृभाषाई आ राजभाषाई अस्मिताबोध के तुलना साइते कवनो देश से कइल जा सकेला. इजराइल देश के जनता, उहाँ के हिब्रु भाषा आ यहूदी धर्म सबकुछ मुसलमानी आक्रमण आ आतंक से नष्टभ्रष्ट आ तितर बितर हो चुकल रहे. बाँचल खोंचल इजराइली यहूदी लोग एने ओने का देशन में आश्रय लेले रहे. ओही में से एक बेन याहूजा के मन में ई भाव बिचार जागल कि अपना धर्म आ संस्कृति के भाषा हिब्रु के जियावे-बनावे के चाहीं. एह सोच के तहत ऊ जवना अवरत से बिआह कइलन, ओकरा से शर्त रखलन कि अपना बच्चा के मात्र हिब्रु सिखावल जाई. सचमुच ऊ दूनो बेकत अपना बच्चा के सबका से अलग राखके केवल हिब्रु भाषा सिखावल लोग. जब ऊ सेयान आ सगेयान भइल त अपने आप दुनिया के आउरो भाषा जानल. फेर उहो हिब्रु भाषा खातिर एगो इस्कूल खोललस. बाकिर बारह बरिस तक कवनो विद्यार्थी हिब्रु भाषा आ हिब्रु के माध्यम से आउर विषय पढ़े ना आइल. बाकिर ऊ परिवार हार ना मानल. धैर्यपूर्वक ऊ परिवार दुनिया के उपहास आ उपेक्षा के झेलत अपना उद्देश्य आ उपलब्धि खातिर उद्यम करत रहल. फेर कुछ विद्यार्थी अइलें स. सबके मुफ्त में पढ़ा के इहे वचन लिआए कि तहनियो मुफ्त में एह भाषा के बिकास खातिर ईमानदार उद्यम करबऽ लोग. समय सरकल, अपना एही हिब्रु भाषा के बदौलत हिब्रु भाषी यहूदी समुदाय संगठित होत गइल आ एक दिन सबल, समृद्ध आ समर्थशाली इजराइल देश दुनिया के मानचित्र पर आपन जोरदार जगह बनवलस. आउर देश के तरह भाषा आ संस्कृति के स्तर पर स्वाधीनत स्वाभिमानी राष्ट्र इजराइल जेतना नोबेल पुरस्कार आ बिकास पवले बा ओतना औपनिवेशिक भाषा अँगरेजी के गुलाम देश कल्पनो ना कर सकस. एकर वजह ई बा कि कवनो बिकास, पुरस्कार भा सम्मान मौलिकता आ सृजनात्मकता के भेंटाला आ ई सब अपने मातृभाषा भा राष्ट्रभाषा में संभव होला. आन से उधार लिहल अनुवादी भाषा में कतई संभव ना हो सके. बिदेशी भाषा रटे का चलते बच्चा आ व्यक्ति के दिमाग भोथर हो जाला. बच्चा के शारीरिक बिकास आन भाषा में मिलल गृहकार्य के मानसिक दबाव के चलते रूक जाला. ऊ कवनो बिषय से सीधे ना जुड़ पावे, फेर एकर असर ओकरा पर आजीवन बनल रहेला. एही से दुनिया के हर भाषा, संस्कृति आ ग्यान- दर्शन के पंडित भइला के बावजूद दुनिया के चिन्तक -विचारक-दार्शनिक अपने भाषा,संस्कृति,शिक्षा-दर्शन के अधिका तरजीह देलन.

मालवीय जी के नेवता पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पहुँचल महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के नाम पट्टिका पर अँगरेजी के बड़-बड़ अक्षर में लिखल -” वनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी” के नीचे हिन्दी- देवनागरी के छोट-छोट अक्षर में लिखल “बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय” पढ़के हिन्दी के दुर्दशा पर उदास मन से टिप्पणी कइलें कि “हमरा अइसन महसूस भइल ह कि जइसे अँगरेजी महारानी के पाँव तले एकर दासी हिन्दी अपना दयनीयता बस दुबकल बिआ”.

जइसे जर्मनी, जापान, चीज, रूस, हालैंड, पोलैंड वगैरह देश आ देश के जनता अपना मातृभाषा आ राष्ट्रभाषा के अस्मिताबोध आ बिकास के माध्यम से अपना के बिकसित करत आपन शिक्षा, चिकित्सा, सेवा, सुरक्षा, न्यायालय, सचिवालय, सरकार आ शासन-प्रशासन चला सकऽता त आपन भारतवर्ष अपना प्रांतीय मातृभाषा सब आ देश स्तरीय सम्पर्क भाषा हिन्दी के माध्यम से देश के समृद्ध आ शक्तिशाली काहे नइखे बन सकत बल्कि ओही राहे सुगमता से आ मौलिकता से बन सकऽता. अवसर अनुकूल बा. जब दुनिया के देश के नजर भारत के संस्कार – बाजार आ मानवीय मूल्यन का दार्शनिक -बेवहारिक बिस्तार पर बा तब हम हर भारतीय के दुनिया के देश खातिर अपना बाजार के दुआर ओही शर्त पर खोले के चाहीं जदि ऊ देश हमरा से व्यापार – बेवसाय के माध्यम खातिर हमरा मातृभाषा आ राष्ट्रभाषा के बेवहार करी.

हंस पत्रिका के स्वदेशांक (सन् 1932) में आर्य समाज के स्वामी आनन्द मिश्र सरस्वती ठीक कहले बाड़ें कि सही में देशभक्त उहे हो सकऽता जेकरा अपना मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संस्कृति आ साहित्य से प्रेम बा. जेकरा एह सबसे प्यार नइखे, ऊ चाहे कुछ आउर हो सकऽता, बाकिर सही देशभक्त नइखे हो सकत.” ओही से एक बेर व्यंग्य आ क्षोभ के लहजा में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अँगरेजीपरस्त लोग पर तंज कसत कहले रहस – “जदि अँगरेजिये भारतीय एकता के आधार बा त अँगरेजनो सब के वापस भारत बोला ल लोग.”

द्विवेदी जी साफ- साफ कहले बाड़े कि जइसे हमनी कश्मीर के भा भारत के कवनो प्रदेश का एक एक इंच जमीन के रक्षा करिले. थोड़का जमीन के रक्षा में पूरा देश सामूहिक रूप से जुद्ध-रत हो जाला, ओइसहीं अपना देश के कम से कम बोले जाए वाली बोली, भाषा के रक्षा खातिर सउँसे देश के सन्नद्धो भइल देशभक्ति ह.’

चेकोस्लोवाकिया के हिन्दी विद्वान डॅा० आंदोलन स्मेकल के मत से, कवनो व्यक्ति, समाज आ देश के सांस्कृतिक उपलब्धि, चरित्र, मनोभाव आ आत्मा के जाने के होखे त ओकरा भाषा के बारीकी से समुझे के होई. ‘ एह से हम भोजपुरी भाषी सबके अपना भाषा के साहित्य, संगीत, शिक्षा, ग्यान – बिग्यान, दर्शन, चिन्तन, मौलिक बिचार, शोध-आविष्कार, औद्योगिकी-प्रौद्योगिकी आ तमाम आधुनिक तकनीक के माध्यम भाषा बनावे के होई. हमरा रउरा आ हर भोजपुरी भाषी का समुझे के होई कि माता आ भाषा समारोह से बड़का ना बनस, ऊ बड़ बनली अपना सपूतन के किरती, सेवा, समृद्धि आ उनका प्रति सरधा-सम्मान के भाव से. जइसे आपने मतारी चाहे जवना हालत में होखस, आपन मतारी होली. उनके ममता-सनेह आ दुलार-प्यार से बच्चा अघाला-धधाला. चाहे ऊ मतारी कतनो फटेहाली में काहे ना होखे. अनका रानी-महारानी मतारी से केहू मतारी वाला ना बन सके. असली मतारी के ममता ना पा सके, ओइसहीं अनका मातृभाषा में आपन वेदना-संवेदना संतोषजनक ढंग से अभिव्यक्त ना हो सके. जवन मातृभाषा अबोधावस्था मे कंठ आ ओठ के तोतलाहट-तूती, बोली-बकार दिहलस. ग्यान अभाव के दिन में पललस-पोसलस, ओकरे के सगेयान, समृद्ध आ सुशिक्षित भइला पर उपहास कइल अउर उपेक्षित छोड़ल ओइसहीं होई जइसे कवनो बाजारू अवरत के पाके धर्मपत्नी के भा समृद्ध सास के पाके जनम देवेवाली मतारी के उपहास आ उपेक्षा कइल होला.

एक बेर एगो भोजपुरी भाषी आधुनिक शिक्षा सम्पन्न अँगरेजीदा आ खुद के अँगरेजी भाषा के बदौलत समृद्ध बनल सम्भ्रांत सज्जन ठसक के साथ कहलें – भोजपुरी बोलला से पिछड़ापन झलकेला. भोजपुरी पढ़े-लिखे वाला लोग-लइका मूर्ख बा. आखिर भोजपुरी पढ़ेवाला के मिली का ? आज के बाजारवादी बेवस्था में भोजपुरी के मार्केट वैल्यु बा का ?” तब से हम चुप होके उनकर सब बकधून सुनत रहीं. अब बात माथ के ऊपर जाए लागल. हमरा से कड़ेड़े जबाब दिआ गइल कि सुनी ना, जइसे मार्केट वैल्यु बाजारू अवरत होला जनम देवेवाली आ ममता लुटावे वाली मतारी के ना होखे, ठीक ओइसहीं मार्केट वैल्यु बाजारू भाषा के होला माई के भाषा मातृभाषा के ना होखे. हमार मातृभाषा भोजपुरी त साहित्यिक-सांस्कृतिक रूप से एतना ना समृद्ध बा कि भारतीय साहित्य-संस्कृति के लौकिक स्वरूप भोजपुरी भाषा आ लोक साहित्य में स्पष्ट होला, तबे नू आचार्य बलदेव उपाध्याय अपना पुस्तक ” भारतीय साहित्य का अनुशीलन” के निबंध – ‘महाभाष्य और भोजपुरी ‘ के पन्ना 491-492 पर स्पष्ट लिखले बाड़न – “पातञ्जल महाभाष्य व्याख्या मर्म प्रकाशिका. जीव्यात् भोजपुरी भाषा भव्य भावा- नुवर्तिनी ..”

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