भोजपुरी भाषी के मातृभाषाई अस्मिताबोध – 1

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’

JaiKantSinghJai

‘अस्मिताबोध’ ओह सग्यानी-स्वाभिमान का होला, जेकरा दिल-दिमाग आ मन-मिजाज में अपना आ अपना पुरखन का उपलब्धियन के लेके मान-गुमान के भाव होखे. एकरा खातिर देश-काल-परिस्थिति के अनुकूल-अनुरूप देशज संस्कार-संस्कृति से ओह मनई के नाभि-नाल संबंध आ सरोकार के दरकार होला. ई सभका ला सहज-सुलभ ना हो सके. ई खाली किताबी ग्यान से ना उमगे. ई त अपना परिष्कृत परम्परा के जीवन्तता से जीअला से पोढ़ाला. ई अस्तित्वबोध से बहुत आगे के चीज ह. एकर सम्बन्ध जीवन आ जीवन्तता से होला आ अस्तित्व अउर जीवन में फरक होला. उत्पत्ति से बिनास तक जड़, जानवर आ मनुष्य के बनल रहल अस्तित्व में रहल होला. जानवर जनम लेके मरन तक अस्तित्व में होला. जीवन ओकरे पास होला अथवा जीवन ओकरे के कहल जाला जे अपना जनम आ मरन के बीच कुछ अइसन उपलब्धि हासिल कर लेता, जवन ओकरा आ ओकरा आगे वाली पीढ़ी ला उपयोगिए ना, बल्कि जीवन खातिर अनिवार्य होले. एकरे ‘के जिनगी का बाद के जिनगी’ कहल जाला आ अबहीं ले आदमिए ई जिनगी जीअत आइल बा, जड़ आ जानवर ना. जे ओह तमाम उपलब्धियन के मान-सम्मान आ गरिमामय पहचान देत स्वाभिमान के जिनगी जीएला, ओकरे मन-मानस में अस्मिताबोध पैदा होते. ई ना त अस्तित्व में मौजूद जड़-जानवर से जुड़ल चीज ह अउर ना ओह नीरस-संवेदनहीन मनई का समझ के बिषय, जेकरा ला सब धान बाइसे पसेरी होला चाहे जेकरा मुड़ला माथ पर पानी ठहरबे ना करे, टघर जाए.

हमरा दिल-दिमाग में अपना पुरखा लोग के अरजल बिकासमान भाषा, समाज, संस्कार, संस्कृति, जीवन-दर्शन आ प्रगतिशील ग्यान-परम्परा खातिर अछोर-अथोड़ मान-सम्मान के भाव भरल बा. हमरा खातिर भोजपुरी मात्र भाषा ना, मातृभाषा हिअ. हमरा के जनम देवेवाली माई के बोली हिअ. हमरा खातिर माइए हिअ. हमरा लोक जीवन में सात माई के महिमा गावल बा. ई सातो माई हमरा पालन-पोषण करेला लोग. हम एक एक करके रउओ सभे अपना सातो मतारी से मिलावे के चाहत बानी – जनम देवे वाली माई, बोली बनके कंठ में विराजे वाली माई (माई भाषा) मतलब माई के दिहल भाषा चाहे जीवन में जेकरा जरिए आदमी दुनिया के आउर भाषा अरज लेला – एह से अरजल सब भाषा के जननीभाषा, मतारी के गोदी आवते आ आँखि खोलते जेकर दरसन भइल, ऊ प्रकृति माई, मतारी के गोदी से उतरके जेकरा गोदी में गोड़ धराइल से धरती माई, माई द्वारा कुछ दिन दूध पिआके छोड़ देला के बाद जीवन भर मतारिए जइसन दूध देवे वाली गऊ माई, जल रूप में जीवन देवेवाली नदी माई, आहार बनके क्षुधा तृप्त करेवाली अन्नपूर्णा माई.

एह सातो मतारी में बोली भा बानी भा भाषा रूपी माई के महिमा अपार बा. ई समस्त लोक-परलोक खातिर ध्वनि भा शब्द रूप में आपन विस्तार बढ़वले बाड़ी. मनुष्य का भाव-बिचार के लौकिक भा अलौकिक रूप में अभिव्यक्त करे खातिर ई बानी माता बीज, पौध, फूल आ फल जइसन क्रम से परा, पश्यन्ति आ मध्यमा के बाद बैखरी के अवस्था में आके मनुष्य के व्यक्त वाक् में प्राप्त होली. इनकरा बैखरी अवस्था के पावते आपन भाव बिचार के व्यक्त करे खातिर मनुष्य के भीतर बैखरा नधा जाला. ओकरे बदौलत मनुष्य व्यक्ति कहाए के पंक्ति में खड़ा हो पावेला.

महाकवि दण्डी अपना काव्यादर्श में ओकरे के खूब फरिआ के कहले बाड़न कि ई सउँसे दुनिया घनघोर कूप अन्हरिया में रहित – जानवर जइसन जिनगी जिहित – जदि भाषा का शब्दात्मक अँजोर के उदय ना होखित – ” इदमन्धतम: कृत्स्नं जायते भुवनत्रयम्. यदि शब्दाहव्यं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते . . “-(काव्यादर्श 1/4 )

हर व्यक्ति के जननीभाषा भा मातृ भाषा के गरिमा गावत भारत के सांस्कृतिक भाषा संस्कृत में साफ-साफ खोल के कहल बा कि जे अपना मातृभाषा के छोड़ के अनकर भाषा अपनावेला अथवा ओकरे उपासना में लाग जाला, ऊ अन्धकार का गँहिरा में गिर जाला. ऊ उहँवा पहुँच जाला, जहँवा सूरज के अँजोतो ना होखे.

हमरा अपना मातृभाषा भोजपुरी के गौरवशाली अतीत आ संघर्षशील वर्तमान पर गुमान बा. एकर सम्बन्ध वैदिक ऋषि विश्वामित्र के जसी जजमान भोजगण, पौराणिक भोज पदधारी राज परिवार आ ऐतिहासिक काल के उज्जयिनी अउर कन्नौजी राजपूत भोजवंशी राजालोग से रहल बा. एही वैदिक भोजगण का कर्मभूमि वेदगर्भ मतलब सिद्धाश्रम बक्सर में विश्वामित्र, याज्ञवलक्य आदि ऋषि लोग वेदन का मंत्रन के दरसन कइल. पूरब से पच्छिम गइल एकरे अठारह भोज राज परिवारन का जस के गौरव गान युधिष्ठिर के राजसुय यज्ञ में भगवान कृष्ण गवले रहले. फेर उज्जयिनी आ कन्नौजी राजपूत राजवंशी के रूप में पच्छिम से पूरब अपना पुरखन के जमीन बक्सर में नयका आ पुरनका भोजपुर बसावे वाला लोग के भाषा भोजपुरी हमार मातृभाषा हई. हमरा एह बात के अस्मिताबोध बा.

अपना मातृभाषा भोजपुरी के लेके हमरा भीतर मान-सम्मान आ स्वाभिमान के भाव एहू से बा, काहेकि एकर मूल वैदिक भाषा में प्रकट भइल बा. कारुषी आ पालि एकरे प्राचीन नाम रूप ह. बारहवीं सदी में कोसली से दूगो भाषा छिनगली स त पच्छमी रूप अवधी आ पूरबी रूप भोजपुरी कहाइल. काशिका, मल्लिका आ बज्जिका एकरे क्षेत्रीय नाम ह. भाषा वैज्ञानिक लोग मनले बा कि हमार मातृभाषा भोजपुरी तद्भव संस्कृति के कम से कम डेढ़ हजार साल पुरान भाषा हिअ.

भोजपुरी के प्राचीन रूप में बौद्ध साहित्य, सिद्ध साहित्य आ नाथ साहित्य सहित लोक साहित्य-संस्कृति के मौजूदी एकरा जीवन्तता के अमर काव्य बा. मध्य काल के संत साहित्य से लेके आधुनिक साहित्य यात्रा तक एकरा बिकास परम्परा के गौरव शाली प्रमाण बा.

हमार भोजपुरी आर्यावर्त (‘आर्य’ मतलब, श्रेष्ठ आ ‘आवर्त’ मतलब, निवास स्थान) के मातृभाषा हिअ, मनुस्मृति, उपनिषद आदि में मूल आर्य भूमि बतावल गइल बा अर्थात् हिमालय आ विन्ध पर्वतमाला अउर गंगा-जमुना के बीच काशी-करुष- मल्ल आ बज्जि क्षेत्र. जवना क्षेत्र में विश्वामित्र, भोजगण, बुद्ध, महावीर, पुष्पमित्र, चन्द्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक,स्कन्दगुप्त, शेरशाह, फतेह बहादुर शाही, मंगल पांडे, बाबू कुँवर सिंह,जयप्रकाश नारायण, डॅा० राजेन्द्र प्रसाद जइसन सपूत लोग जनम लेके भारते के ना, बल्कि सउँसे दुनिया के जीवनदर्शन आ अपना अधिकार खातिर संघर्ष करेके प्रेरणा दिहलें. जवना खातिर प्रसिद्ध नारायण सिंह का लिखेके पड़ल –

‘कन कन में जेकरा क्रांतिबीज,
अइसन भोजपुर ठप्पा हमार
इतिहास कहे पन्ना पसार.’

जवना भाषा में सरहप्पा, शबरप्पा, कुकुरिप्पा, भुसुकप्पा, गोरखनाथ, जालंधरनाथ, चौरंगीनाथ, भरथरि, गोपीचन्द, कबीर, धरमदास, दरिया, धरनी, शिवनारायण, पलटू, भीखम, टेकमन, लछमी सखी जइसन अनगिनत सिद्ध, नाथ जोगी, संत, महात्मा साहित्य सिरजल लोग. जवना भाषा के लोकसाहित्य, लिखित आधुनिक साहित्य में ओकरा संस्कृति, जीवनदर्शन, लोक ग्यान-बिग्यान के सहज-स्वाभाविक दरसन होला.

अपना मातृभाषा भोजपुरी के ताकत के बदौलत हमार पुरखा लोग मारिसस, फिजी, गुआना, नेपाल जइसन कई देशन के बनावे आ बिकास के ऊँचाई पर पहुँचावे में आपन ऐतिहासिक जोगदान दिहल. ई लोग अपना मातृभाषा के ताकत के सहारे हिन्दी आ हिन्दुस्तान के मान-सम्मान-पहचान-उत्थान के डंका सउँसे दुनिया में बजावल. भारत के सम्पर्क भाषा हिन्दी के सिरजावे-सजावे-सम्पन्न बनावे आ देश-बिदेस में पहुँचावे में हमरा मातृभाषा भोजपुरी आ भोजपुरी भाषी हिन्दीसेवियन का अवदान के के नकार सकेला.

हिन्दी के राजभाषा आ राष्ट्रभाषा के अधिकार दिलावे खातिर हमार भोजपुरी अपने हिन्दीसेवी सपूतन आ कपूतन के केतना उपेक्षा आ उपहास सहले बिआ आ सहत बिआ, ई केहू से छुपल बा. आजुओ तथाकथित हिन्दी के हिमायती भा भोजपुरी के सामग्री हिन्दी में हेला के बड़का-बड़का साहित्यिक पुरस्कार पावेवाला अपने नासमझ सपूतन, राजनेतन, कलाकारन, पत्रकारन, बुद्धिजीवियन के विरोध भा उदासीनता के चलते ओह भोजपुरी का अपने देश में संवैधानिक मान्यता नइखे मिल सकल. जवन एकरा बहुत पहिले मिल जाए के चाहत रहे.

अबहीं तक एह बहुभाषी देश के 1651-52 बोली / भाषा में से बाइस भाषा के संवैधानिक मान्यता मिल चुकल बा. शुरु-शुरु में जवना चउदह भाषा के ई अधिकार मिलल, ऊ चउदह भाषा रहल – असमिया, बंगला, उड़िया, हिन्दी, पंजाबी, संस्कृत, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, तमिल. तेलुगु आ उर्दू. सन् 1967 में 21वाँ संविधान संशोधन करके सिन्धी, सन् 1992 में 71वाँ संशोधन से कोंकणी, नेपाली आ मणिपुरी अउर सन् 2003 में 92वाँ संशोधन से डोगरी, बोडो, संथाली आ मैथिली भाषा के संवैधानिक मान्यता दिहल गइल आ संवैधानिक मान्यता पावे के हर मापदंड आ शर्त के पूरा करेवाली हमरा मातृभाषा भोजपुरी के साथ हर राजनीतिक दल, राजनेता, सरकार आ विपक्ष हमेशा आश्वासन के झुनझुना थम्हावत धोखा देत आइल बा.

संवैधानिक मान्यता पा चुकल भाषा सब से क्षेत्र, आबादी, राष्ट्र आ राष्ट्रभाषा हिन्दी के बिकास में अवदान, भाषिक आ साहित्यिक सम्पन्नता के आधार पर हमरा मातृभाषा भोजपुरी के साथ तुलनात्मक अध्ययन-विश्लेषण करीं त एकरा साथ भइल अन्याय के अंदाज लाग सकेला.
(बाकी आगे आई.)

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