मतदाता बनल अन्नदाता करे खुदकुशी

– ‍हरिराम पाण्डेय

भारत गांवन के देश ह. फौज के जवानन के जतना इज्जत होला ओतने गांव में अन्न उपजाए वाला किसानो के इज्जत दीहल जाला. एही चलते लाल बहादुर शास्त्री नारा दिहले रहनी ‘जय जवान , जय किसान!’ इहे ना जवान आ किसान के तुलना करत पेशा से सख्त पुलिस अफसर बाकिर दिल से बहुते कोमल कवि आ गायक मृत्युंजय कुमार सिंह लिखलन :

तोहरो बलम कप्तान सुनs सजनी.
हमरो बलमुआ किसान, हो सजनी.
तोहरो बलमुआ के मथवा पs टोपिया
करेले ऊ खूनवा के दान
त हमरो बलमुआ के माथे रे पगड़िया
करे ले ऊ अनवा के दान, सुन सजनी.

एह मरम छुए वाला गीत में जवन सामाजिक सामंजस्य लउकत बा तवन अब खतम होखत जात बा, भा कहीं त खतम हो चुकल बा. अब सियासत एह अन्नदाता के मतदाता बना दिहलस आ ओकरा से वोट ले के ओकरा से अन्न छीनला का बाद ओकर करजा माफ करा के आपन खुद के जय-घोष करावे वाला नेता लोग का अब कुछ आदमियत देखाई?

किसान के आत्म हत्या हमहन के संवेदना के मौत देखावत बा. सूखा, फाटल, उजड़ल, खेतन के कवनो अनजान कोना में मर जाए वाला ओह किसान के पीड़ा से राष्ट्र अनजाने रह जाला. ओकरा खाली बरतनन में अनाज नइखे. कचराइल डिब्बन में दाना नइखे, फटही कुर्ता में पइसा नइखे. ऊ करी त का ?

देश के राजधानी का बीच में बदलाव ले आवे के दावा करे वाली सरकार के बोलावल सभा में एगो किसान के खुदकुशी के ‘सीन’ चाहे जतना कानूनी आ सियासी पहलु के दरवाजा खोल देव बाकिर एकर सबले बड़हन बात ई बा कि अब ले जवना किसानन के इस्तेमाल सरकार करत आइल बाड़ी सँ ओहनी के ढेर दूर ले चहेटत जाई ई सगरी फाँसी खुदकुशी.

किसानन के आमदनी के सोता राजनेतवन के बनावल नीति सोख लिहलस आ अब किसान अलचार बा. दिल्ली मे जवन आत्महत्या भइल तवन एही मजबूरी के देखावत बा. ऊ जीवन से मुँह फेरे के कोशिश बन गइल. ऊ देखा दिहलसि आ हजारन किसानन के जियते जता गइल कि जेही ओहनी के बटोर के जोड़े के जतन करत बा सभे ओह लोग के तूड़े के फेरा में बा. किसान जुट जइहें त खेतन में पसीना बहा के सोना निकाल दीहें. रैलियन में का करे जइहें ?

दिल्ली में एगो किसान सोझा मरत रहुवे आ दिल्ली के मुख्यमंत्री भाषण देत रहलन. बाद में संसद में मचल शोरशराबो ओह लोग ला मौका बन गइल.

मृत्युंजय अपना धुन में गावेलें –

तोहरो बलमुआ के छाती प के तगमा में
चमकेला देसवा के सान.
त हमरो बलमुआ के गेहूँआ के बलिया में
दमकेला धरती के जान, सुनs सजनी.

बाकिर सुनत के बा? जेकरा सुने के बा ऊ त मौका खोजे का फेर में बा. ओह दिन रात के जेही खबर सुनल ओकरा भरोसा ना भइल कि हर नेता, हर गोल के नेता किसान खुदकुशी काहे करत बाड़े का नाम पर एक दोसरा पर अछरंग लगावे में डूबल बाड़े.

जंतर मंतर पर हजारन का भीड़ का सोझा फेंड़ से लटक के खुदकुशी कर लेबे वाला राजस्थानी किसान गजेंद्र सिंह के मौत अपना पाछे कई सवालो छोड़ गइल. ई सवाल जहाँ एक ओर आम आदमी पार्टी आ ओकरा नेतालोग के रवैया लेके बा त दोसरा तरफ पुलिस प्रशासन आ व्यवस्था संम्हारत लोग आ अगल-बगल मौजूद लोगो के सवालन के घेरा में घेरत बा.

सबले बड़ सवाल त इहे बा कि कि जब गजेंद्र फांसी लगावत रहलन तब केहु उनका के रोकल काहे ना? अइसन कइसे हो गइल कि हजारों लोग का भीड़ का बीच फेंड़ पर चढ़ल एगो मनई खुदकुशी कर लिहलसि आ करीब 15-20 मिनट ले केहु ओह पर धियाने ना दीहल. कहल जाला कि, अपनन के मरला पर जानवरो दुखी हो जाले बाकिर ई सब कवना जाति के जानवर हउवें? जय जवान जय किसान के देश हमेशा याद राखी. जवना राष्ट्र के किसान हताश हो जाई ओहिजा के हरर तरक्की बिखरत परिवारन के कचार के होखी.

(2 मई 2015)


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ के ब्लॉग ह खोज खबर
हरिराम पाण्डेय

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