Prabhakar Pandey

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया”

ओह दिन माई घर का पिछुवाड़े बइठि के मउसी से बार झरवावत रहे. तवले कहिं बाबूजी आ गइने अउर माई से पूछने की का हो अबहिन तइयार ना भइलू का? केतना टाइम लगावतारू? माई कहलसि, “बस हो गइल, रउआँ चलिं हम आवतानी.” खैर हम समझि ना पवनी की कहाँ जाए के बाति हो ता. हम लगनी सोंचे की बिहाने-बिहाने बाबूजी माई के लिया के कहाँ जाए के तइयारी करताने. अरे ई का? तवलेकहिं हमरा बुझाइल की मउसी त सुसुक-सुसुक के रोवतिया. हम तनी उदास हो गइनी. काहें कि हमरा लागल कि मउसी के रोवल कवनो शुभ संकेत त नहिए बा. हम बहुत कोशिश कइनी कि मउसी से ओकरी रोवे के कारन पूछीं. पर आखिर कवनेगाँ?. हमार आवाज के सुनी. अबहिन? हम एही उधेड़बुन में रहनी तवलेकहीं माई मउसी से कहलसि की ते काँहे रोवे लगले? ए पर मउसी सुसुक-सुसुक के कहल सुरु कइलसि, “दीदी, तें पढ़ले-लिखले क बादो एतना गलत काम करे जा तारे! अरे लइकिनी त लछ्मी के रूप होले. अगर संसार में लइकिनी ना रहेंकुलि त संसारे ना चली. अउर ते बारे की बबुनिया के हत्या करवावे जा तारे. ऊ बबुनिया जवन अबहिन ए दुनिया में कदमों नइखे रखले. खैर ओकरा का मालूम बा कि आज के मनई एतना कठजीव बा कि ओकरा आगे कंसवो फेल बा.”

खैर हमहुँ अभिमन्यु क तरे पेटवे में रहि के माई की साथे होखे वाली बाति बड़ी धेयान से सुनी अउर कंस, रावन, राम, कृष्ण सभका बारे में सुनले रहनीं. मउसी के बाति सुनि के हमरा रोवाई ना हँसी आ गइल. हम मन ही मन सोंचनी की माई अउर बाबूजी बराबर पूजा-पाठ करत रहेला लोग अउर कृष्ण के बड़ाई आ कंस के कोसत रहेला लोग. ई ए लोगन के कवन रूप ह? बड़ाई कर ता लोग कृष्ण के अउर चल ता लोग कंस का राह पर. हे भगवान! तोहार माया अपरम्पार बा. ना ना तोहार ना ए मानव समाज के माया अपरम्पार बा.

खैर हो सकेला की हम गलत सोंचत होखीं. हो सकेला कि माई अउर बाबूजी एगो समाजिक आदमी ह लोग. समाज, देश का बारे में बहुत सोंचेला लोग ए कारण से जनसंख्या वृद्धि से परेशान हो के इ कदम उठावे जात होखे लोग. आजु आपन देश जनसंख्या का हिसाब से चीन क बाद दूसरा नंबर पर बा. तवले हमरा इयाद आइल कि आजु से लगभग एक महीना पहिले एकदिन बाबूजी माई से कहत रहने की लइका रही तब त ठीक बा पर लइकिनी रही त कुछ सोंचे के परी. त का बाबूजी अउर माई के बबुनी ना बाबू चाहीं? हमार बाबूजी त इंटर कालेज में मास्टर हउअन पर इनकर ई सोंच? इनकरा ई काहें ना बुझाता कि अगर एहींगा लइकिनी कुलि के हत्या होत रहल त एकदिन समाज के संतुलन बिगड़ि जाई अउर एगो एइसन समय आई की धरती पर से मानव जाति के अस्तित्वे मिट जाई. अरे भाई जब माइए ना रही त लइका कहाँ से आई.

आजु लोग हाथ-पैर धो के हमनीजान का पीछे परल बा. बार-बार चेकअप करावल जाता कि लइकिनी ह की लइका अउर ई पता चलते की लइकिनी ह, माई-बाप नर-पिचाश हो जाता अउर हमनीजान के हत्या कइला का बादे चैन के साँस लेता. माई-बाप के ई कृत्य देखि के भगवानो रोवत होइहें कि हम आदमी बना के केतना बड़हन पाप कइले बानी.

ए में विग्यानो के दोस देहल ठीक नइखे. अरे भाई पहिले लोग हमनीजान के पैदा भइले क बाद मारत रहल ह अउर अब विग्यान की किरिपा से पेटवे में पहिलहीं हमनीजान के पहिचान के मारि दे ता. एकदिन हमरा इयाद बा की बाबूजी माई के लिंगानुपात का बारे में बतावत रहने. बाबूजी कहत रहने कि एक हजार आदमी पर केतना मेहरारू बानीकुलि एही के लिंगानुपात कहल जाला. 1901 में अपनी देश भारत में 1000 आदमियन पर मेहरारू कुलि के संख्या 972 रहे जवन 2001 में एतना घटल की 933 हो गइल. अब एही से अंदाजा लगावल जा सकेला कि हमनी के हत्या के रफ्तार का बा! आदमी कहे खातिर जेतने सभ्य (अपनी भाषा में) होत जा ता ओतने नर-पिचाश. आज आदमी विवेक से काम लेहल बंद क देले बा. अरे भाई ओकरी लगे देश, समाज अउर प्रकृति का बारे में सोंचे के समय कहाँ बा? आज त ऊ भावहीन हो गइल बा. पत्थरदिल हो गइल बा आजु के आदमी.

आजु एही के देन बा की कुछ लोग हमनीजान के खरीद-फरोख्त कर ता. केतने जाने लइका कुआँरे रहि जा ता लोग. आजु चारु ओर महिलन के समान अधिकार देबे के चरचा जोर पर बा पर होता कुछ ना. काँहे कि जबले आदमिन के सोंच ना बदली, जबले माई-बाप अपनी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर ना उठी तवलेक ए तरह के जघन्य पाप समाज में होत रही अउर एकर दुष्परिणाम त समाज के भोगहीं के परी. आज अगर यूनीसेफ के सुनल जाव त अपनी देश भारत में रोजो सात हजार कन्यन के बलि चढ़ा देहल जा ता. बाप रे एतना भारी पाप!

आज हर गली-गली में नकली डाक्टरन के भरमार हो गइल बा. ऊ कुल्हि कुछ नइखन करत त खालि एगो अल्ट्रासाउंड के मशीन खरीद के बइठि जा ताने कुलि अउर खूब लुटहाई करताने. हाँ एगो बाति जरुरे बा, भ्रूणहत्या करेवाला दुकानन का बाहर साफ लिखि के लगा देहल जाता की भ्रूण हत्या का उद्देश्य से लिंग जाँच कानूनी अपराध बा, वाह भाई वाह! एही के कहल जाला सामने वाला के बता के डाका डालल. हमरी खेयाल से भारत का अधिकत्तर अस्पतालन में कवनो बहुत जरूरी उपकरण, मशीन आदि होखो चाहें ना पर अल्ट्रासाउंड के सुबिधा जरूर बा. अउर ए मशीनन के भारत में बेंचि के कईगो बिदेशी कंपनियाँ लाल हो गइल बानी कुलि.

हाय रे कथित पढ़ल-लिखल भारतीय समाज. लइका भइले पर मिठाई बँटाता अउर लइकिनी भइले पर रोवाई छुटि जाता. अगर माई लइका दी त कपारे पर बइठावल जाई अउर कहीं हम आ गइनी त माई के लतिआवल जाई. हँसी कि रोईं हमरा खुदे नइखे बुझात. हमरा त बुझाता की अब खाली उहे लइकिनी जनम ले पाई जवन कवनो वेश्या माई क गोद से पैदा होई अउर ना त नाजायज.

ए माई, ए बाबूजी, ए काका, ए भइया! हमके मति मारS जा हो. हमहुँ के जिए द जा. हमहीं से मानव समाज के अस्तित्व बा, जइहा हमार समूल नाश हो जाई ओहि दिने मानव समाजो ए धरती से मिट जाई. समधी-समधिन, सार-बहनोई, जीजा-साली, बेटा-पतोहु, दुलहा-दुलहिन जइसन शब्द खाली शब्दकोसे में रहि जइहेंसन अउर पढ़ावत समय मास्ससाहब कइहें की कुछ समय पहिले ए लोगन के अस्तित्व रहे पर आज ई लुप्त हो गइल बाटे लोग. रउआँ काहें नइखीं सोंचत की सीता, सावित्री, अपाला, घोषा, लक्ष्मीबाई, कल्पना चावला, सायना नेहवाल इ सब लइकिनिए ह अउर हो सकेला की रउरी गरभ में पल रहल कवनो लइकिनी ए ही में से एगो होखे.

रचनाकार के निहोरा-

भारत जहाँ औरत के देवी के संज्ञा देहल जाला, नवरात्रि में कुमारी कन्यावन के माँ दुर्गा के रूप मानि के आदर सहित खिआवल-पिआवल जाला. उहे भारत जहाँ एगो अकेले लक्ष्मीबाई अंगरेजन के दाँत खट्टा क देहलसि, उहे भारत जहाँ के पीटी उषा, सायना नेहवाल के कीर्ति के लोहा दुनिया मानल. आजु हमनी जान के का हो गइल बा. एगो महान धार्मिक देश जवना का धर्म-ग्रंथन में नारी के महत्ता हर तरह से प्रतिपादित बा ओही देश में नारी के साथ एइसन व्यवहार? आखिर काँहे. ग्रंथन में पिता-ऋण से पहिले माता-ऋण के बात बतावल जाला. हम त इहे कहबि की लइकिनीओ कुल्हि के उचित शिक्षा दीं, संस्कार दीं. कहल गइल बा की ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ति तत्र देवता’. त ए बात के समझीं अउर कन्या के सनमान दीं. शिवाजी के शिवाजी बनवले में माई जीजाबाईए के हाथ रहल. डा. राधाकृष्णनन जी कहले रहने कि अगर मातालोग अच्छा रही त देश अपना आपे अच्छा हो जाई. महिला वर्ग का प्रति समाज में जागरूकता लाईं अउर का सही बा का गलत ए बात के समझाईं.


प्रभाकर गोपलापुरिया के पहिले प्रकाशित रचना


प्रभाकर पाण्डेय

हिंदी अधिकारी, सी-डैक पुणे

पुणे विश्वविद्यालय परिसर, गणेशखिंड,

पुणे- 411007, भारत

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7 Comments

  1. ओम भईया, हमरा का जानी काहे तीत चीजन से बड़ा प्रेम बा,राउर टोकल तनी तीत जरुर बा पर गरहन करे लायक बा आ हमरा बड़ी नु नीक लागल,हमर गुरुदेव आदरणीय योगराज प्रभाकर जी के एगो बात याद आवत बा , उहा के कहनी की बागी जी positive comments के हमेशा रेगुलर way मे लेवे के चाही पर Negative comments हमेशा सिरियस रूप से लेवे के चाही, हम राउर लिखल बात के ध्यान मे रखि के दसन बार आपन कविता के दोहरवनी हा, शुरू शुरू में त ना बुझाइल ह पर सच मानी दसवा बार पढ़त पढ़त राउर लिखला के आशय नीमन से बुझा गइल ह, यकिन करी भईया हम कविता लिखत समय भी भोजपुरिये में सोचले रहनी, पर कुछ सोच मे गलती हो गइल लागत बा, बहुत बहुत धन्यवाद, राउर मार्गदर्शन खातिर हिया से आभारी बानी, आगे से हम ध्यान देब,

  2. प्रभाकर भईया बहुत ही मार्मिक लेख लिखले बानी रौवा, हमनी के बच्चन के जब छिक आ जाला त परेशान हो जाइलाजा पर हमके ना बुझाला कैसे लोग आपने खून के खून, अपने हाथ से कर देला, वाह रे ज़माना, फाट जा धरती अइसन कूल मुदैयन के भीतरिया ल , देश के पाप आ अइसन पापी बाप दुनो एक झटका मे ख़तम हो जाव,
    हम एही विषय पर कुछ दिन पहिले एगो भोजपुरी कविता लिखले रहनी जेके हम ईहा लिखल चाहब ……………

    शीर्षक :-माई तनिक बतावS मोहे…

    आज रात के बात,
    पुरी तरह से बावे याद,
    एक छोटी,नन्ही सी, प्यारी गुड़िया,
    करत रहल बहुत ही कातर गुहार,
    माई तनिक बतावS मोहे,
    का हो गईल हमसे कसूर,
    दुनिया मे आवे से पहिले,
    कईल चाहेलू तू अपना से दूर,

    तोहरे खून से सिचिंत बानी,
    तोहरे हई हम त अंश,
    अपने हाथ से अपना के मिटा के,
    कईसे सहबू इ पाप के दंश,
    अपने से ही बनावल गुड़िया,
    कईसे देबू अपने से तूर,
    माई तनिक बतावS मोहे,
    का हो गईल हमसे कसूर,
    दुनिया मे आवे से पहिले,
    कईल चाहेलू तू अपना से दूर,

    लईकी अउर लईका मे अब,
    कहवा कवनो बा अन्तर,
    लईकी लईका दूनो से मिलके,
    चलत प्रगति के पहिया निरन्तर,
    धरती के बात अब छोड़S,
    चाँन्द पर बेटी करत चढाई,
    इन्दिरा,प्रतिभा,मीरा,किरण के देखS,
    दुनिया मे भारत के मान बढाई ,
    माई हो तूहू कोई के बिटिया बाडू,
    कईसे हो गईलू मजबूर,
    तोहरो माई गर इहे सोचती,
    कईसे देख पईतू दुनिया के नूर,
    माई तनिक बतावS मोहे,
    का हो गईल हमसे कसूर,
    दुनिया मे आवे से पहिले,
    कईल चाहेलू तू अपना से दूर,

    बाबूजी के समझाSवs माई,
    ना बेटी रहित त बेटा कहा से आईत,
    माई हमार वादा बा सबसे,
    जनमे त द धरती पर हमके,
    नाम करब देश अउर कुल के,
    सबकर कन्धा ऊँच होई गरब से,
    झटका से खूलल आँख हमार,
    सपना मे हकीकत से भईल साक्षात्कार,
    बिटिया तू त जान हऊ,
    वादा बा ई तोहसे हमार,
    हर हाल मे तोहके जनम देइब,
    चाहे मरे के पड़े हमके बार हजार ,
    चाहे मरे के पड़े हमके बार हजार,
    चाहे मरे के पड़े हमके बार हजार ||

    गनेश जी “बागी”

    1. Author

      बागी जी,
      भोजपुरी में कुछ लिखत घरी हिन्दी में सोचे के आदत छूट जाव त रचना में जान आ जाव. रउरे ना, अधिकतर लोग हिन्दी में सोचे ला आ ओकरे के तूड़ के भोजपुरिया देबेला. भोजपुरी लेखन के ई सबले बड़ कमजोरी बा. बात त हम रउरा कविता पर कर रहल बानी बाकिर दिमाग में बहुते लोग नाचत बा. नवही पीढ़ी में ई समस्या अउरी बढ़ल जात बा काहे कि हमनी का भोजपुरी के ठेठ शब्दन से अपरिचित होखल जात बानी.
      आशा बा कि रउरा लोग हमरा बाति पर ध्यान देब. एक बेर रउरे अपना कविता के फेर से देख लीं त हमार बाति साफ हो जाई. बहुते लाइन सीधे हिन्दी जइसन लागत बा. भोजपुरी हिन्दी के बेटी ना हिय, हद से हद एकरा के हिन्दी के बहिन कहल जा सकेला.
      सादर सप्रेम,
      राउर,
      ओम

  3. एगो अजन्मी बेटी के दरद के अपने जवना तरह प्रस्तुत कईले बानीं, ओकरा बाद कहे खातिर कुछु नईखे बांचत। हिन्दयुग्म पर प्रकाशित अरूण मित्तल जी के लिखल ई कविता एह प्रसंग में ध्यातव्य बा-

    माँ
    कोई शिकायत नहीं है तुमसे मुझे
    कि तुमने मुझे गर्भ में ही मार दिया
    तुम तो मजबूर थी ना
    कितनी कोशिश की तुमने
    लेकिन मुझे बचा नहीं पाई
    पर मुझे कोई शिकायत नहीं है तुमसे
    तुम तो यूं ही उदास हो
    कोई पाप नहीं किया है तुमने
    अरे मुझे जन्म ही तो नहीं लेने दिया न
    मैं करती भी क्या जन्म लेकर
    न तो थाली ही बजती मेरे जन्म पर
    और ना ही बांटी जाती मिठाइयाँ
    माँ
    तुम रो क्यों रही हो
    मैं तो समर्थन ही कर रही हूँ
    तुम्हारे उस निर्णय का
    जब तुमने दुःख के असीम पारावार से निकलकर
    पापा को न केवल सांत्वना दी थी
    बल्कि वादा भी किया था मुझे गर्भ मे ही ख़त्म कर देने का
    माँ
    तुम्हारा क्या कसूर है
    तुम तो मजबूर थी ना
    तुम नहीं विरोध नहीं कर सकती थी
    दादी के आकांक्षा और पापा की आदेशनुमा अनुरोध का
    और ……और …..हाँ
    तुम सहन नहीं कर सकती थी …..
    पड़ोस की औरतों के ताने
    तुमने मुझे जन्म लेने से रोककर
    रोक लिया
    अपनी हर भावी पीड़ा और आंसुओं की संभावना को
    और हाँ माँ मुझे जन्म न देने के जो दावे किए गए थे
    वो सब भी तो ठीक ही थे
    ठीक ही तो कहा था पापा ने
    प्रेमचंद के गोदान का वो अंश
    “चारा खली पर पहला हक बैलों का है
    बचे सो गायों का”
    क्या तुम चाहोगी की तुम्हारी बेटी को निम्नता का अहसास हो
    वो हमारे बेटे की अपेक्षा दबकर जीवन जिए
    उसकी हर इच्छा हमारे लिए गौण हो
    नहीं ना
    तो फिर उसे जन्म मत दो
    और मेरी माँ
    तुम तो सबसे ही आगे निकल गई
    रूह कांप उठती है
    जब याद करती हूँ तुम्हारे वो घटिया मानसिक मंथन से निकले हुए दावे
    इसी तरह समझाया था ना तुम्हें ख़ुद को
    “बेटी तो जन्म से कष्ट है
    हर असहनीय सहन करना पड़ता है
    एक बेटी के लिए
    वो पराया धन हैं फिर भी
    उसे पढ़ना लिखना पड़ेगा
    वो सब उसके लिए किस काम का
    वो बड़ी होगी तो समाज की गन्दी निगाहें उसे जीने नहीं देंगी
    और शादी, दहेज़ की कल्पना से ही कोई भी कांप उठता है
    और कहीं किसी से प्यार कर बैठेगी तो…………
    जीना, मरने से भी दूभर हो जायेगा
    न जाने क्या हो वक्त बहुत ख़राब है
    लड़की अगर हाथ से निकल जाए तो कहीं भी जा सकती है …………….
    वहां भी ……………………
    नहीं नहीं …………… इससे तो अच्छा है मैं उसे जन्म ही ना दूँ ”
    वाह माँ
    कम से कम एक बार इतना तो सोचा होता
    क्या बेटी को पढ़ाने से माँ-बाप कंगाल हो जाते हैं
    क्या इस समाज में कोई नहीं मिलता बिना दहेज़ तुम्हारी बेटी का
    हाथ थामने वाला
    क्या तुम्हे बिल्कुल भी यकीन नहीं था अपनी परवरिश पर
    ज़रा बताओ मुझे
    क्या सभी लड़कियां बन जाती हैं वेश्याएं …………………..
    सच तो ये है माँ कि तुमने खून किया है मेरा
    ख़ुद को बचाने के लिए बलि चढ़ा दिया तुमने मुझे
    सूख गई तुम्हारी ममता और ख़त्म हो गया तुम्हारा वात्सल्य
    चंद घटिया और खोखले दावों के सामने
    अरे किसने दिया तुम्हें
    माँ कहलाने का हक
    इससे तो अच्छा होता की तुम मुझे जन्म देती
    और गला घोंटकर मार देती
    कम से कम इसी बहाने ये अभागिन
    स्पर्श तो पा जाती तुम्हारे हाथों का………………
    पर तुमने तो मुझे एक अवसर भी नहीं दिया
    सुना है माँ … अस्पताल के पीछे जहाँ दफनाया गया था मुझे
    वहां उग आया है एक नन्हा सा पौधा
    कभी फुरसत मिले तो कड़कती बेरहम धूप में
    मुझे अपने आँचल की छाँव देने आ जाना ………
    बस माँ यही कहना था तुमसे …………
    और हाँ अब अपने आँसू पोंछ दो ……..
    भैया के स्कूल से आने को समय हो गया…….

  4. संपादकजी,

    पता ना हम सही बानी की गलत पर हमरा बुझाता की भोजपुरिया समाज में कन्या भ्रूँनहत्या त आज एगो आम बात हो गइल बा। हम ए बेरी गाँवें गइल रहनी त देखनी की अस्पतालन पर भ्रून जाँच खातिर तो लोग के जूमूह टूटता। लोग निर्लज्ज हो के सीना तान के कहता के भ्रून जाँच करावे आइल बानी। इ कवन सभ्य समाज ह…हमनीजान त पसु समाज से भी बत्तर हो गइल बानीजाँ।
    आज सरकार कानून त बना देतिया पर ओकर पालन होखता की ना , ए देखे वाला केहू नइखे। सिक्षा के अस्तर जेतने बड़ता ओतने हमनीजाँ हैवान होत चलि जातानि जाँ, हिरदयहीन होत चलि जातानीजाँ।
    हमार त बार-बार खालि भोजपुरिए समाज से ना सबलोग से निहोरा बा की भ्रूनहत्या जइसन महापाप से बचीं, एकर निंदा ग्रंथन में भी कइल बा। पैर से एगो चिउँटी कुचलि जाले त दुख होला अउर रउआँ बानी की जान बुढि के एगो निर्दोस बबुनी के हत्या क देतानी। इ महापाप ह अउर अगर इ रूकल ना त एकदिन मानव समाज के सत्यानास होखले से केहू ना बँचा पाई।
    सादर धन्यवाद। हमार आप सबसे निहोरा बा की लइकिनिन कुल के भी पढ़ा-लिखा के सभ्य,सुसंकृत बनाई।
    भोजपुरिया समाज में जेतना लइकिनी अपनी घर-परिवार, माई-बाप के सेवा करेनीसन ओतना लइका त कबो ना….श्रवनकुमार एगो पैदा होने पर महिला श्रवनकुमार लाखों।
    हम भोजपुरिया माई-बहिनी से भी हाथ जोड़ि के निहोरा करबि की रउआँ भी ए महापाप के भागीं न बनी रउआँ खुदे सोंची की अगर राउर माई-बाप भी इहे सोंचि लेले रहित त का रउआँ अस्तित्व में आइल रहतीं???? सोंची अउर खूब सोंची पर साकारात्मक। जय भोजपुरिया समाज।।

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