– पाण्डेय हरिराम

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री लोकलुभावन राजनीति का चकोह में लगातार अझूरात जात बाड़ी. जवना माओवादियन के तरफदारी करिके ऊ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ‘हरमाद वाहिनी’ के ‘जंगल महल’ (वनांचल) में धूल चटावे में कामयाब भइली, आजु ओही माओवादियन के ऊ सख्ती से निपटे के चेतावत बाड़ी.

माकपा के शासनकाल में जंगल महल में अर्द्धसैनिक बल अउर स्थानीय पुलिस के संयुक्त कार्रवाई के विरोध करे वाली ममता बनर्जी का गोहार पर राज्य के नामी गिरामी लेखक-कलाकार रैली निकलले रहले, जवना से तब के सरकार कार्रवाई रोके खातिर मजबूर हो गइल रहुवे. तृणमूल कांग्रेस अउर माओवादियन का आपसी रिश्ता का बारे में माकपाइयन के लगावल आरोपन के ममता ई कहत खारिज कर दिहले रही कि ‘दुनु संगठन बस बढ़िया दोस्त हउवें.’ ममता के सत्ता में अइला का बाद कारवाई रोक दिहल गइल रहे आ लागल कि युद्धविराम हो गइल. जानकारन के मानना बा कि ई माओवादियन के युद्धनीति रहल. ओकरा अपना के पुनर्गठित करे खातिर जंगल महल से सुरक्षा बल के कार्रवाई रुकल जरूरी रहुवे. फिलहाल बात बिगड़ल जब माओवादियन का हाथे दू-तीन लोग के हत्या हो गइल. एहमें झारखंड के जनमुक्ति मोरचा के रवींद्रनाथ बोस के हत्या से मामिला अउरी बिगड़ गइल. कहल जा ता कि रवींद्रनाथ बोस तृणमूल कांग्रेस में शामिल होखे वाला रहले आ उनुका के माओवादियन के दबावे कचरे के रणनीति बनावे के जिम्मेदारी दिहल जाये वाला रहुवे.

पश्चिमे बंगाल ना, कई राज्यन में राजनीतिक दल अपना फायदा खातिर माओवादियन के इस्तेमाल कइले. इहाँ ले कि तृणमूल से निपटे खातिर कबो माकपो माओवादियन के मदद लिहले रहुवे. एकरा बाद तृणमूल नंदीग्राम, सिंगूर अउर कईगो दोसरो जगहा पर माकपाइयन के सफाया खातिर माओवादियन के इस्तेमाल कइलसि. अब हालात बदल गइल बा. माओवादी तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता अउर नेतालोगन के निशाना बनवला का साथही विकास के काम रोके लगले. दुनु फरीक हालांकि ‘हथियार’ डाले आ ‘हथियार जमा करे’ जइसन शब्दन के बढ़िया से समुझेलें, काहेकि दुनु तरफ के बयान एकदम साफ बा. बीचबचाव करे जे लोग सामने आइल रहे, उन्हनी के भूमिका लेके जन साधारण में बड़हन संशय बा. एहिजा के कुछ बुद्धिजीवी माओवादियन का पक्ष में बयान देत लउकत बाड़े, जेहसे हालात अउरी अझूराइल जात बा. अतने ना कुछ सम्मानित बुद्धिजीवी-लेखक, कवि, कलाकार, नाट्यकर्मी आ फिल्मकर्मी ममता के विरोध में बयान देके माओवादियनके नैतिक समर्थन करत बाड़े. हालांकि इन्हनी के मालूम बा कि अइसन कइला से हालात अउरी अझूरइबे करी. कुछ बुद्धिजीवियन के कहना बा कि सरकार के माओवादियन से शांति बहाली पर बात करे के पहल करे के चाहीं. माओवादियन के ई खूबे मालूम बा कि जंगल महल आ ओहिजा के बाशिंदन के विकास हो गइल आ ऊ लोकतांत्रिक धारा में शामिल हो गइलें त माओवादी आंदोलन बेअसर हो जाई. एही चलते ऊ ओहिजा विकास के काम नइखन होखे देत.

अब सवाल उठत बा कि का ममता माओवादी आतंक के खतम करे में सफल हो पइहें ? भा, ऊ ओतने सहजता से राज चला पइहें जवना सहजता से ऊ भीड़ बिटोर लेली ? शायद ना कर पइहें, काहे कि एह विद्रोह में अनेके कारकन के बहुते घुरपेंच संबंध बा. ई बस वइसने नइखे कि कुछ हथियारबंद विद्रोही लोग भा संगठन सरकार का खिलाफ लामबंद हो के मोरचा खोलले बाड़े. एकर सबले बड़ घुरपेंच तृणमूल कांग्रेस से माओवादियन के संबंधो बा. पार्टी के नेता रहल कबीर सुमन अपना जीवनी “निशानेर नाम तापसी मल्लिक” किशनजी आ दोसरो माओवादियन के समर्पित कइले बाड़न. ओह किताब में तृणमूल कार्यालय में ममता आ माओवादी नेता राजा सारखेल के मीटिंग के विस्तार से ब्योरा बा. बात राजनीतिज्ञन अउर माओवादी-नक्सलियन में मेलेजोल ले सीमित रहीत त गनीमत रहुवे. एहिजा त माओवादी नेता आ खनिज व्यापार करे वाला धन्नासेठन में सांठगांठ बा. अइसना में आम आदमीए तकलीफ में रहेला, जवन आजुकाल्हु पश्चिम बंगाल में साफ देखल जात बा.

पश्चिम बंगाल देश के अइसन राज्य ह, जहवाँ राजस्व आय आ साधन सीमिते बा, जबकि खरचा बेहिसाब. एहीसे करजा लेके राजकाज चलावल जात रहल बा. एह चलते अब ई प्रदेश कर्जा में सबले बेसी डूब गइल बा. जवन नेता जेतने लोकप्रिय होला, ऊ ओतने बेसी जनआकांक्षा से घेराइल होला. ममतो बनर्जी का साथहू इहे हो रहल बा.

अइसन लागत बा कि सत्ता में अइला का बाद अधिकतर मामिला में कामयाबी हासिल करे वाली ममता खातिर माओवाद के समस्या गरदन में फँसल हड्डी हो गइल बा. अकुतइला में हो सकेला कि ऊ कुछ कड़ा कदम उठा लेसु, बाकिर ई उनुका खातिर बहुते खतरनाक बन जाई. माओवादी हलका से जवन बात उड़त फिरत आवत बा आ सुरक्षा एजेंसियनो के जवन आकलन बा, ओकरा मुताबिक सीमा पार से माओवादियन के बड़हन पैमाना पर हथियार मिलत बा. इहे ना, नशा वाला सामान का तस्करी आ जबरन वसूलीओ से ऊ बड़हन मात्रा में धन बिटोरत बाड़ें. ई तइयारी खतरनाक दिशाईं संकेत करत बा.


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार के संपादक हईं.

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