राजनीति के कन्फ्यूजियाइल

– शिलीमुख

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बात के बतंगड़ बनावल एघरी अइसन प्रचलन में आ गइल बा कि पूछीं मत. देश के राजनीतिक दल एकरा के आपन प्रमुख अस्त्र बना लेले बाड़ें सऽ.
हर बात में हुज्जत करत ”धोती-कुर्त्ता फार के/ सड़क प निकल जा झार के.“ मीडिया चैनलन के खुरपेंची दिमाग अइसने कुल सीन खोजेला. आखिर
अभिव्यक्ति के आजादी क एगो ठीका ओकरो बा. सीन ‘पाजिटिव’ ले ढेर ‘निगेटिव’ रही त ऊ अउर जोर से चिकरी-चिचियाई. कहे क मतलब ई कि ओकरा के कुछ सनसनी भा चटखारेदार चाही. जवना से ओकरो भाव बढ़ो. लोग दीदा फारि के देखो.

हमन का लोकतंत्र में राजनीति ‘लोक’ के अपना दलगत नजरिया से देखेले. ‘लोकतंत्र’ थाहे आ जाने का बजाय अब राजनीति, ‘लोकमत’ बनावे आ बिगाड़े का दौर में आ गइल बिया. राजनीति ‘लोक’ खातिर कुछ करो भा ना करो ओके भ्रमित (कन्फ्यूज) त कइये दी. ‘सत्य’ के कबो साफ ना होखे दी. ओइसहूँ एघरी ‘असत्यमेव जयते’ क बोलबाला बा.

जनसेवा आ लोकहित का नाँव पर राजनीति के ए बी सी डी शुरू करे वाला छटंकी-छुट भइया भा ‘बास’ टाइप नेता शुरुवे से यदि आपन नीयत आ निष्ठा साफ राखित त देश भा देश का लोगन के कुछ भला होइत, बाकि यदि सबकर भले हो जाई त ओकरा के, के पूछी? ईमानदारी आ निष्ठा हेरत-हेरत अपने हेरा जाए के बा. सवाल ई बा कि ‘परहित’ आ ‘जनसेवा’ काहें? तोहरा लगे कुछ रही तब न देबऽ? ‘सेवा’ खातिर बल-बेंवत औकात आ सामरथ चाही. ई नइखे. तबो लोकहित आ जनसेवा का राहे चलत चल जाईं. ओकरे बले, बल-बेंवत, सामरथ-सत्ता कूल्हि भेंटाइ जाई.

अब त टीभी, सिनेमा मे अक्सरे देखे में आवेला. रेक्सा ठेला वाला होखे भा कुली-मजूर, सब्जी बेचे वाला होखे भा पहलवानी करे वाला. इस्कूल के निकलुवा, चोर-चाई, चरित्र-भ्रष्ट कुछऊ होखे अचके ओकरा ज्ञान हो सकेला आ अचके भाग पलट सकेला. ज्ञान चक्षु खुलते हृदय परिवर्त्तन हो जाई आ ऊ नेता बनि के बड़का मंत्री तक बन जाई. हमरा कबो-कबो बुझाला कि एकदम निखट्टू, नाकारा आ बेकारो आदमी एकरा खातिर ‘फिट’ बा. फिटे ना ‘क्वालिफाइड’ बा. नेता आ मंत्री के ग्लैमर अइसन बा कि अब बड़-बड़ बुद्धिजीवी, माफिया, ठीकेदार आ धन-दउलत वाला रईसो नेतागिरी आ राजनीति में आपन मूड़ी ढुकावल चाहत बा. बलुक आम आदमी ले आपन लहावे का चक्कर में बा.

चिचियाइल, नखड़ा कइल, पोंहड़क पसारल, हेकड़ी देखावल, बात के बतंगड़ बनावल, नीमनों के अझुरावल, थेथरई का हद ले कुतरक कइल आदि-आदि. यदि आ गइल त रउवों राजनीति खातिर सुतंत्र आ ‘क्वालिफाइड’ बानी. बगलोल, डेराभुत, भ्रमित-भकुवाइल ‘वोटर’ क हाल ई बा कि ऊ कबो रउरा फंदा में फँस जाई. जात, धरम, क्षेत्र, गरीबी, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेकारी, अराजकता का चक्कर में चकरात ‘वोटर’ के आपन निजी माया-मोह आ छुद्र सवारथ अलगे घेरले रहेला-बस मोका अइला पर ओकर मति मारे आ भरमावे के कला चाहीं. एह ‘कला’ से संपन्न कलाकार राजनीति में आपन फुटही-रँगही कूल्हि सिक्का चला सकत बा.

एघरी कुछ लोगन के ई ‘वोटर’ समझदार आ चल्हाँक नजर आवे लागल बा. कवनो राजनीतिक दलवाली सरकार से आजिज आके जदि जनता ओके सत्ता से बेदखल क दिहलस त ओके जन जागृति आ जनसमझदारी से जोर दियाता. एह जनता क कवन ठेकान? ऊ त अक्सर अपने गोड़ प टाँगी चलावत रहेले. कब ओकर चेतना-बिजुकि के अचेतन होई कवनो ठेकान नइखे. पढ़ुवा-समझदार ले बहक जाता. एही से, ‘सत्ता’ से बेदखल आ- कुर्सी से उतरल राजनीतिक दल, हारियो गइला प चैन से ना बइठे. राजसुख, रुतबा, कुरुसी के चस्का आ हिरिस ओके उदबेगले रहेले. ऊ सूतत-बइठत, जागत-उँघात सत्ताधारी का नाक में दम करे के बहाना आ उपाइ खोजत रहेला. ओघरी ‘जनसेवा’ आ ‘जनहित’ के मंत्र-जाप ऊ अउरी तेजी से करे लागेला. अनखुन-खुरचाल खोजत, सत्ता पर कुबोल बोलत, पोंहड़क पसारत, बेबात-हल्ला मचावत आखिर ऊ टीबी चैनल आ मीडिया के दामन पकड़ले, जनता के भरमावे-अझुरावे का अनवरत अभियान में जुट जाला.

साँच पूछीं त जनता के ‘पीर’, परिस्थिति आ जथारथ से वास्ता ना राखे वाला पक्ष-विपक्ष के ई अफलातून हवाई नेता भुइंयाँ उतरबे ना करेलन सऽ. एक-दोसरा पर कींच-कानो फेंकत, हुल्ल-हपाड़ मचावत ई राजनेता जनता क दुख-दर्द दूर करे का बजाय अउर बढ़ा देत बाड़न सऽ. टी.वी खोललीं ना कि रोज एगो हल्ला-बखेड़ा. दुसरा का आँखि के फुल्ली देखला में अपना आँख क माड़ा भोर पर जाता. सूप त सूप, चलनियो ठठा के हँसे लागऽतिया, जवना में बहत्तर छेद बा.

पहिले सूप, चलनी, आखा, झरना, खेती-गृहस्थी आ रसोई के जरूरी सामान मानल जात रहे. सूप, अरकस-बथुवा, खुद्दी, पइया, भूसी लकड़ी, फटकि-फेंकि के भा उचिलाइ के सारतत्त्व (माने नीमन अनाज) अपना लगे राख लेव. एकरा उलट आखा, चलनी भा झरना अपना अनगिनती छोट-बड़ छेदन से अनाज भा ‘सारतत्त्व’ बहरा निकालत नीचे गिरा देव आ थोथा, ठूरी-भूसी-लकड़ी अपना पासे राख लेव. गाँव घर में एही गुन प कहाउत बन गइल. आजु राजनीतिक नेतन के आपुसी कुकुर-झौं-झौं आ बयानबाजी देखि के साफे बुझाई कि सूप पर चलनी हँसऽतिया. आपन कमी, गलती आ पाप ना देखि के, दुसरा में खाली कमी आ नुक्स निकालल राजनीति के स्वस्थ परंपरा बन गइल बा.

हाय-हाय रे मजबूरी… जवना सत्तामद आ सुख-सुविधा का नशा में हम कबो झूमत-अइंठत चलत रहलीं आजु ओही के दोसर छीन लिहलस. छिनिये ना लिहलस ओपर कब्जा क के गेंड़ुली मरले बइठल बा. बात-बात प हंगामा खड़ा करे वाला, कूल्हि दुनियाँ के चोर-बेइमान बतावे वाला सुराजी पाटी के देखीं कि ऊ सत्तानशीन भइलो पर आपन बकवादी सुभाव नइखे छोड़त. ऊ अब अउरी जोर-शोर आ अहंकार से, आपन कमी आ दोस भुलाइ के दुसरा पर तोहमत मढ़े आ झगरा करे में बाझ गइल बा.

राजनीति एक किसिम क खेले हऽ. पहिले समस्या पैदा करऽ, फेर ओपर अँगुरी ध के चिचिया, फेर ओकर समाधान करे क घोषणा करऽ. याने पहिले आग लगावऽ फेरु चिचिया-चिचिया के बुतावऽ. पहिले कूड़ा फइलावऽ फेर जब दस-पनरह दिन में बसना आ बेमारी फइले लागे त कैमरा वाला टीम का सँग ओके बहारे-बटोरे का अभियान क श्रीगणेश करऽ. अब त मीडिया चैनल वाला एह सद्भावना-यात्रा में पहिलहीं से हाजिर रहत बाड़न सऽ. बे राजनीति के रोटी खइले ऊहो कइसे जीहें सऽ. उन्हन क खइलको ना पची.

राजनीति के हाल ई बा कि जब केहू साफ-सफाई के बात करत बा त सवाल, भोग के रोग से मुक्ति खातिर- योग के बात करत बा त सवाल. ‘योग’ आ ‘वियोग’ के झगरा संयोग नइखे….ई राजनीति के बदलत कुरूपता के उद्घाटन हऽ आज हर पार्टी के ईश्वर, अल्ला, गॉड, नेता-नायक अलगा अलगा बा. एही तरे योगो- अलगा-अलगा. बुझला एही से मास्टर मउनी राम, अपना एगो धतिंगड़-खुरपेंची लड़िका के ‘जनसेवा’ क सलाह देत, नवकी ‘सुराज-पार्टी’ में भर्ती करा देले बाड़न. ओइसहूँ उ उनका कहला में ना रहे. एकदम अमान आ मनसरहँग. बहेंतुआ अस घुमला ले नीके भइल कि ओकर हृदय परिवर्त्तन हो गइल आ ऊहो जनसेवा क नइकी उज्जर टोपी पहिन लिहलस. अब ऊ पहिले गली-मुहल्ला फेरु जिला, फेरु जिला, फेरु प्रदेश….आ एक न एक दिन मउनी राम का सँगे सबका के कन्फ्युजिया देई. ओकरा में जन नेता बने क कुल्हि लच्छन बा. राम बचावसु एह देश के!


(भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका पाती के 76 वां अंक से साभार)

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2 Comments on "राजनीति के कन्फ्यूजियाइल"

  1. rash bihari ravi | July 22, 2015 at 10:04 pm | Reply

    bahut badhia lekh

  2. भोजपुरी पत्रकारिता के नेट पर नया आयाम देबे मे भोजपुरिका के आपन मौलिक योगदान हमेशा इयाद कइल जाई ।

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