भोजपुरी आ राजस्थानी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करे के चरचा ढेर दिन से चल रहल बा. भोजपुरी त वइसन टुअर हिय जेकर कवनो माई बाप नइखे. कवनो राज्य नइखे जे भोजपुरी के लड़ाई लड़ि सको. संजोग से राजस्थानी के लड़ाई लड़े खातिर राजस्थान सरकार मौजूद बिया. एह पर सोचल जा सकेला कि राजस्थानी के आठवीं अनुसुची में शामिल करावल आसान होखी. बाकिर राजस्थानो में अपने में विवाद चल रहल बा. राजस्थान के एगो बड़हन इलाका में राजस्थानी ना बोलल जाव आ ऊ लोग सरकार के एह फैसला के विरोध कर रहल बा जवना में राजस्थानी के राजस्थान राज्य में सरकारी भाषा के रुप में मान्यता दिहल गइल बा.

सरकार के एह फैसला से उदयपुर जयपुर आ पश्चिमी राजस्थान के लोग त सहमत बा बाकिर सांसद सीसराम ओला आ भरतपुर से सांसद रतन सिंह सरकार के एह फैसला का खिलाफ झंडा उठा के खड़ा हो गइल बाड़े. ओह लोग के कहना बा कि एह फैसला के भरपूर विरोध कइल जाई. काहे कि एह फैसला से शेखावती, बागड़ी, मेवाती, मेवारी, बृज आ दोसर भाषा के नुकसान होखी. कहल त इहाँ तक जा रहल बा कि जवना भाषा के राज्य के अधिकांश नागरिक ना जानस ना बोलस ओह भाषा के राजस्थानी कइसे कह दिहल जाई.

भाषा विवाद के एह हालात में एगो बढ़िया खबर बंगाल से आइल बा जहाँ हिन्दी के अल्पसंख्यक भाषा के मान्यता दे दिहल गइल बा. अपना अल्पसंख्यक राजनीति का चलते वाम मोर्चा सरकार उर्दू के त अल्पसंख्यक भाषा के मान्यता आ सुविधा दे दिहले रहल बाकिर गैर बंगाला भाषी अल्पसंख्यकन के अनदेखी कर दिहलसि. ममता बनर्जी के ई फैसला स्वागत योग्य बा जवना में हिन्दी, गोरखा, नेपाली, गुरुमुखी वगैरह के अल्पसंख्यक भाषा के मान्यता दे के भाषायी अल्पसंख्यकन के हित के ध्यान राखल गइल बा.

जहाँ तक बात रहल भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल करावे के त एह मामिला में लफ्फाजी आ राजनीति बेसी हो रहल बा काम के बात कम. रह रह के कुछ दिन पर भोजपुरी के मान्यता के सवाल अलग अलग मंच पर उठावल जरुर जा रहल बा बाकिर कवनो संस्था योजना बना के भोजपुरी के विकास खातिर कुछ करत होखे से नइखे लउकत. भोजपुरी में संस्था आ समाजन के कमी नइखे बाकिर अधिकतर के मकसद प्रचारोन्मुखी बा. भोजपुरी भाषा आ संस्कृति के प्रचार प्रसार का दिशा में कवनो खास काम नइखे होत. कहल जात बा कि एक बार भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करा लिहल गइल त भोजपुरी में पढ़ाई लिखाई आ सरकारी काम काज होखे लागी. पढ़ाई लिखाई इ आजुवो भोजपुरी में हो रहल बा. रहल बात काम काज के त ऊ त समहर तरीका से हिन्दीओ में नइखे हो पावत.

अँजोरिया का माध्यम से हर बार सवाल उठाइले कि जवना भाषा के आपन एगो अखबार तक ना होखे आजु का जमाना में ओह भाषा के राजनीतिक शक्ति अतना ना बन सके कि नेता लोग ओह पर ध्यान दे सकस. भोजपुरी के कवनो पत्र पत्रिको एह हालत में नइखे कि ऊ विदेश त छोड़ीं, देश के हर हिस्सा में पसरल भोजपुरियन तक चहुँपत होखे. अब कहल इहो जा सकेला कि आजु का जमाना में हिन्दी पत्रकारिता आ प्रकाशनो के कमोबेस अइसने हालत बा. लोग किताब पढ़े के आदत छोड़ले जात बा. बाकिर हिन्दी में नेट प्रकाशन के कवनो कमी नइखे. हजारो लाखो का संख्या में लोग ओह साइटन पर जाला. पूरा दुनिया में करोड़ो भोजपुरिया रोजे नेट पर आवत जात होखीहें बाकिर भोजपुरी से पाँचो सेकण्ड के लगाव रहीत त हालत दोसर रहीत. दोसरा साइटन का बारे में त हम ना बता सकीं बाकिर अँजोरिया दुनिया भर में पसरला का बावजूद एहिजा मूश्किल से रोजाना एक हजार पाठक का लगभग चहुँपेले.

भोजपुरी के हालत में बहुत सुधार होखे के उम्मीद तबले ना कइल जा सके जबले एहिजा नौ गो कन्नौजिया तेरह गो चूल्हा वाला हालत में बदलाव ना आई. भोजपुरियन में सबले बड़का कमी एका के बा. हमनी के ताकत दोसरा के टाँग खिंचाई में बेसी जाया होले दोसरा के बढ़ावा देबे में कम. अधिकतर सक्रिय लोग के रुचि एह बात में बेसी होला कि ओहलोग के खबर छप जाव, फोटो छप जाव. कुछ प्रचार मिल जाव. उहे लोग अगर मिल बइठ के एगो समावेशी संगठन बना लिहते जवना में हर भोजपुरिया ना त बेसी से बेसी भोजपुरियन के हित सधे त ऊ सबले बड़हन बात होखीत. आ तब मिले वाला प्रचार खातिर प्रयास करे के जरुरत ना पड़ीत.

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