लोकजीवन के ‘बढ़नी’ आ ‘बढ़ावन’

– डा॰ अशोक द्विवेदी

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‘लोक’ के बतिये निराली बा, आदर-निरादर, उपेक्षा-तिरस्कार सब के व्यक्त करे क ‘टोन’ आ तरीका अलगा बा. हम काल्हु अपना एगो मित्र किहाँ गइल रहलीं, उहाँ दुइये दिन पहिले उनकर माई उनका गाँव आरा (बिहार) से आइल रहुवी. पलग्गी आ हाल चाल का बाद अनासो हमरा मुँह से निकल गउवे कि बिहार में चुनाव बा, उहाँ के का हाल बा? बस ऊ चटाक से बोलुवी, ‘अरे बढनी बहारऽ ए चुनाव के. कूल्ह गोडा एक्के थइली क चट्टा बट्टा बाड़े सऽ! एकदम रंगल सियार. ’

‘एगो कहऽता कि इहवाँ सड़क बनवाइब तले दोसरका आके बोलत बा कि ‘झूठ बोलत बा ऊ.’ अरे बबुआ पूछऽ जनि, किसिम-किसिम के बेंग बटुराइल बाडे सऽ, दिन-रात बकर-बकर क के पागल कर देले बाड़न सऽ.’

घर आवते मन उनका ‘बढनी बहरला’ पर अँटकल रहे. सोचे लगुवीं बहुत पहिले एगो लोकप्रिय रेडियो नाटक में लोहा सिंह क मेहरारू बात-बात में दिकिया के कहसु ‘‘मार बढनी रे.’ त उनका टोन में कबो उपहास कबो उपेक्षा त कबो तिरस्कार लउके. ई ‘बढनी’ ह का? झारे-बहारे वाला झाडुवे नु हऽ. ना दरसल कूडा कचरा, अहँकार-इरिखा, खराब नजर, रोग-बलाय आ अन्हार पोसेवालन के बहारे-बहरियावे वाला काम ‘बढनिये’ करेला. बुझला एही से धनतेरस का दिने सब समान किनला का बाद बढ़नियो (झाडुओ) किनाला. जम द्वितीया का अन्हार रात में जम दीया दुआरी का बहरी बरला का बादे दीवाली भा दीया-दियारी आवेला. ई परब अँजोर का अगवानी क परब हऽ. मय कूड़ा-कचरा आ गंदगी साफ कइला का बाद साफ सुथरा घर-दलान में लोग ‘दीपोत्सव’ मनावेला आ एह में ‘बढनी’ अगुवा नियर मुख्य भूमिका निभावेला.

लोक का सँगे शास्त्रो खड़ा हो जाला, ई कहत कि, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’! माने तूँ अन्हार से अँजोर का ओर पयान करऽ बाकि एकरा पहिले घर का भीतर (आ मनवों का भीतर) के अलाय-बलाय, बुराई, मइल आ अन्हार बहरिया द! लोकजीवन में त ई ‘बढ़नी’ रोजे आपन काम करेला. ई हर घरनी (गृहिणी) के नित प्रति के सँघाती हऽ; घर का आब आ आबरू के रखवार हऽ आ बुराई से लड़े खातिर ओकर खास हथियारो हऽ. हर घर में होत फजीर, झलफलाहे सुरूज नरायन का अँजोर देबे वाली किरिन आवे का पहिले घरनी का हाथ में ई बढ़निये आवेला. घरनी एकरे बले घर झार-बोहार के चिक्कन क देले. ओने घर के मलिकार भा अगुवा घर का बहरा क सहन आ दुआर झारे-बहारे लागेला. तब ई बढ़नी ‘खरहर’ बन जाला. खर (कूड़ा कचरा) के हरे वाला ‘खरहरा’! गाँव में ई नित्य क क्रिया हऽ. खर माने कड़ा (अवरोध) भा ‘अहं’ के हटावलो जरूरी हऽ. बढनी आ खरहर दूनों प्रतीक रूप में सहज मुनष्य के विनयी मित्र हउवें स. ऊ लोक के जगावे आ क्रियाशील करे वाला उपकरण हवें सऽ. लोक का क्रियाशीलता के दिशा देवे खातिर शास्त्र लगले अगिलो लाइन दोहरावेला, ‘‘असतो मा सद् गमय!’’. झूठ से साँच का ओर पयान करऽ. साँच ऊ जथारथ ह, जवना के सामना आ साक्षात्कार जीवन के सुगम आ अरथवान बनाई.

लोकाचार में मामूली समझल जाए वाला हर चीजन के आपन महता बा. साइत एही से गृह प्रवेश में घर वालन का पइसे का पहिलहीं ‘बढ़नी’ (झाडू) के पइसार हो जाला, ईहे ना नवका घर में पुरनका घर के झडुइया गइल शुभ मानल जाला. लोक आ शास्त्र दूनों के जवन भावभूमि बनत बा ओमें भौतिक घर आ भौतिक देह दूनो का भीतर क गंदगी आ मइल बिकार निस दिन बहरियावे क अभ्यास आ साधना बा. एही से एकरा प्रतीक बढ़नी भा झाडू के प्रासंगिकता आजुओ बनल बा. भोजपुरी लोक के गृहस्थ-संस्कृति, सँवारे वाली कृषि-संस्कृति हऽ, जेमे च्यूँटी, चिरई, फेड़-रूख सबके न्याय आ सम्मान बा. देबे वाला का प्रति कृतज्ञता बा. कुआँ, पोखरा, नदी, बन, पहाड़ सबका प्रति सरधा आ विनय एह लोक का संस्कार में समाइल बा. ई संस्कारे हमनी का परिवार के प्रेरना-सोत हऽ आ ‘परिवार’ हमनी का समाज के सबल इकाई.

गंगा, सरजू, सोन का पाट में फइलल खेतिहर-संस्कृति दरसल ‘‘परिवार’’ का नेइं पर बनल गृहस्थ संस्कृति हऽ. परिवार बना के रहे खातिर पुरूष स्त्री क गँठजोरा क के बिवाह संस्कार से बान्हल आ मर्यादित कइला का पाछा सृष्टिकारी कर्म के गति देबे क भावना रहे. घर के कल्पना बे घरनी संभवो ना रहे, एही से जेकर बियाह ना होय भा जे अकेल रहे ओके बाँड़ (वांण) आ बंड कहल जाव, सिरजन आ मानवी विकास खातिर पोथी पुराण आ रामायण-महाभारत जुग के लोकजीवन में एह परिवार-संस्कृति का दिसाई आस्था आ विश्वासे लउकेला, हमन का भोजपुरी क्षेत्र में अब तऽ कृषि-संस्कृति क मय पाया धीरे धीरे थसके-भिहिलाए लागल बा. नया जुग के नया बयार आ मशीनी प्रभाव संवेदना आ आस्था प टिकल तंत्रे के ढाहे में लागल बा. खेत जोते, बिदहे, दँवरी करे, रहट-मोट वाला सिंचाई करे भा तेल आ रस निकाले खातिर पेराई करे वाला बैलन के जगहा टेक्टर, थ्रेसर, क्राशर ले लिहले सऽ. साँच पूछीं त बैल त हमन के संग साथ देबे आ गाड़ी घींचे वाला हमने के भाई रहले स. ऊ महादेव के नन्दी गृहस्थ जीवन क धुरी बन के परिवार क गाड़ी घींचे खातिर बैल बन के सँगे रहसु, महादेव हमन का धारना आ विश्वास में भोला आ औढरदानी रहलन बाकि ऊ अपना परिवार का कारने लोकदेव बनलन.

गनेश आ गउरी शुभ, शान्ति आ सुख समृद्धि के वाहक बन के हमन का गृहस्थ-लोक में समाइल रहे लोग. एही से नन्दियो महराज बैल रूप में हमन क सहायक आ संरक्षक बन गइलन. उनहीं का चलते उनकर गऊ माता गृहस्थ क माता हो गइली. लडिकन के अपना दूध से युवा बनावसु त बृद्धन के पोसन क के अरदुवाइ बनवले राखसु. पहिले बैल गृहस्थ का पुरूषारथ, शक्ति आ सामरथ क पहिचान रहले सऽ आ गाय ओकरा धन में गिनल जासु. गऊ रूप में ऊ धरती का ऊपर दूसर माता रहली. एहीसे उनकर गोबर होखे भा मूत, कुल्हि पवित्र मनात रहे, एतना पवित्र कि बरिजल जगहो प उनकर गोबर मूत छिरिक के पवित्र क लियाव. घर दुआर त लिपइबे करे, गृहस्थ का हर पहिल क्रिया आ अनुष्ठान में गाइ क गोबरे कामे आवे आ सुखाइयो गइला पर पवित्र ईंधन बने खातिर गोइंठा आ चिपरी बन जाय.

खेत से फसल कटाइ के खरिहाना आवे ओकरा पहिलहीं गोबर से धरती लिपाव, दँवरी हो गइला प अन्न का राशि पर इहे गोबर ‘बढ़ावन’ बन के रखाव. ‘बढ़ावन’ राखे का बेरा ना कवनो पंडित के ना पोथिये पतरा के जरूरत पड़े. बढ़ावन (वृद्धिकर्ता) खाली एगो टोटका ना रहले, सरधा विश्वास से बनल बिघिनहर्ता गनेसजी रहले. महादेव पारबती पुत्र गनेसजी ‘बढ़ावन’ बनके जहाँ बइठि जायँ, विघिन बाधा आ उपदरो के का मजाल, जे गृहस्थ का उपराजन के कवनो क्षति पहुँचे? लरिकाई में आ फेर बड़ो भइला पर हमहन के ना बुझाव, दरसल लोक व्यवहार आ ओकरा आचार बिचार क रहस्य समुझले पर बुझाला.

गोबर क गनेस आ गोबरे के गउरी. अच्छत-जल दूबि चढ़ते मूर्तिमान हो जाला लोग, लोक विश्वास के ई दृढ़ता आजु ले काहें बनल बा? कारन बा कि गृहस्थ लोक के अधिष्ठात्री गौरी ‘परिवार’ का पालन खातिर अनपुरना (अन्नपूर्णा) बन गइली आ पहरा देबे खातिर गणेश जी बढ़ावन बन गइले. कृषि समाज आ खेतिहर संस्कृति उनके अनपुरना माई मनलस त बनवासी आ आश्रमन के रिसि-मुनी लोग उनके शाक पात फल फूल कंद मूल तरकारी क देवी ‘शाकम्भरी’ मान के सरधा देखवलस. हमनी किहाँ चइत का नवरात में मइया हमहन का गृहस्थी के कुशल क्षेम जाने आ मंगल करे आवेली. लोक उनकर अगवानी धधाइ के करेला. कुवार का नवरात में इनका पूजन के अउरियो निहितार्थ बा. अनपुरना रूप हरियर साड़ी वाला उनकर गृहस्थ रूप ह, लाल साड़ी में उनकर पूजा दुर्गा रूप में होला, गौरी पारबती रूप गृहिणी वाला पारिवारिक रूप हऽ. केश बिखेरले करिया कलूठ, जीभि कढ़ले उनकर काली रूप, प्रकृति रूप हऽ. जवन अनेत आ अत्याचार के क्रुद्ध दंड देबे में ना हिचकिचाय. लोक उनका प्रकृति रूप का निरंकुश आ क्रोधी सुभावों क ओइसहीं मनलस. उनके गृहस्थ जीवन में ले आवे वाली इहे गौरा करिया प्रकृति रूप छोड के गोर सुन्दर घरनी बन गइली, उनका बिना जइसे कैलाश सून रहे ओइसहीं काशी. ‘बे धरनी घर भूत क डेरा’ वाला कहाउत बुझला एही से बनल.

खेतिहर संस्कृति के आदिदेव महादेव आ गृहस्थ संस्कृति के आदिदेवी गउरा बन गइली! ई लोग भलहीं शास्त्र आ पोथी पुराण में ‘पुरूष’ आ ‘प्रकृति’ भा शिव आ शक्ति रहे लोग, बाकि ‘लोक’ उनके अपने ढंग से अपना गृहस्थी आ पारिवारिक जीवन में अपनवलस, दूनों का संयोग आ मिलन के अपना गिरहस्ती क अधार मनलस. अजुओ कवनो विशेष अनुष्ठान, पूजा-संस्कार में पहिले गउरी, गनेश आ महादेवे के सुमिरन-कीर्तन होला.

(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका ‘पाती के 78 वां अंक’ से साभार)

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